कारवां गुजर गया…

धरती, पानी, हवा और रोशनी जीवनदायी वरदान हैं, भोजन हमें पुष्ट करता है, लकड़ी, पत्थर, लोहा आदि पदार्थ विभिन्न वस्तुओं में ढलकर हमारे सुख और सुविधा का कारण बनते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में हम हर वस्तु के प्रति कृतज्ञता का भाव रखना सीखते हैं। ये सब जड़-चेतन वस्तुएं ही परमात्मा हैं। परमात्मा कहीं और नहीं है। इन सबमें परमात्मा विद्यमान है। यही कारण है कि अध्यात्म की दुनिया में हमें यह सिखाया जाता है कि हम सबसे प्रेम करें, अनायास प्रेम करें, अकारण प्रेम करें। ‘सहज संन्यास मिशन’ के हम सब अनुयायी यही मानते हैं कि प्रेम ही परमात्मा है, निश्छल प्रेम, निस्वार्थ प्रेम, अनायास प्रेम, अकारण प्रेम हो तो हम प्रेममय हो जाते हैं और यही वह स्थिति है जब हम परमात्मा के करीब होते हैं। हम प्रेममय हो जाएं तो किसी से ईष्र्या नहीं कर सकते, घृणा नहीं कर सकते, झूठ नहीं बोल सकते, धोखा नहीं दे सकते। हममें धैर्य, विश्वास का संचार होता है…

कहा जाता है कि किसी शक्तिशाली व्यक्ति को उसकी गलती का अहसास दिलाना कठिन होता है। कारण कई हैं। अक्सर वह शक्तिशाली व्यक्ति इस स्थिति में होता है कि हमें उसके सहयोग, या कई बार कृपा की आवश्यकता होती है। शक्तिशाली व्यक्ति को हमारी कमी, कमजोरी या आवश्यकता का अहसास होता है, इसलिए यह बहुत संभव है कि वह हमारे साथ अहंकारपूर्ण व्यवहार करे। रामचरितमानस में महाकवि तुलसीदास जी ने कहा भी है : ‘समरथ को नहीं दोष गुसाईं’, यानी समर्थ व्यक्ति को उसके कर्मों या स्वभाव की कमियां नहीं बताई जा सकतीं। शक्तिशाली व्यक्ति पर आश्रित कोई भी व्यक्ति आम तौर पर ऐसा दुस्साहस नहीं करता। सच है, आखिर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? पर जब शक्तिशाली व्यक्ति लगातार अपनी मजबूत स्थिति का नाजायज फायदा लेते हुए लोगों को तंग करना शुरू कर देता है, उनका शोषण करना शुरू कर देता है, उनसे अहंकारपूर्ण व्यवहार करते हुए उनका अपमान करना शुरू कर देता है तो ऐसा अवश्य होता है कि मौका मिलते ही लोग उससे किनारा कर लेते हैं, कोई नया विकल्प सामने आते ही उस पर निर्भरता खत्म हो जाती है और वह व्यक्ति या संस्था शक्तिशाली न रहकर अप्रासंगिक हो जाता है, और फिर स्थिति यह हो जाती है कि कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे! दुनिया भर में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है। हमारे अपने देश में ही ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे जो हमें यह सबक देने के लिए काफी हैं कि स्थिति मजबूत होने पर भी एक सीमा से आगे जाकर लोगों को परेशान करने वाला अंतत: खुद बेहाली की स्थिति में पहुंच जाता है।

एक जमाना था जब भारत संचार निगम, यानी बीएसएनएल की तूती बोलती थी। टेलिफोन कनेक्शन के लिए दस-दस साल का इंतजार करना पड़ता था। अपने शहर से किसी दूसरे शहर में कॉल करने के लिए सारा-सारा दिन इंतजार करना पड़ता था। फोन खराब हो जाए तो महीना-महीना सुनवाई नहीं होती थी। एक समय तो ऐसा भी हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का फोन पंद्रह दिन तक खराब रहा। हम सब जानते हैं कि आज बीएसएनएल की स्थिति क्या है। ओला-उबर का आना, ऑनलाइन शॉपिंग की सफलता, प्राइवेट बैंकों का बढ़ता बाजार, सरकारी अस्पताल, सरकारी स्कूल, सरकारी बसें ऐसे ही उदाहरण हैं जब इन संस्थाओं ने जनता की उपेक्षा की तो उनके बेहतर विकल्प आ गए और तुरंत लोकप्रिय भी हो गए। हमारे अपने व्यक्तिगत जीवन में भी इस उदाहरण से सीख ली जा सकती है। यह बहुत संभव है कि कहीं न कहीं हम भी शक्तिशाली हों, कोई दूसरा व्यक्ति हम पर निर्भर हो, कोई दूसरा व्यक्ति कभी हमारे पास याचक बनकर आए, तब यदि हम अहंकार में भर कर अकड़ जाएं तो हो सकता है कि कल को ऐसी स्थिति आ जाए जब हमें उसी व्यक्ति की जरूरत पड़ जाए या वह व्यक्ति ऐसी स्थिति में पहुंच जाए कि हमारा काम बिगाड़ सके। यह हो सकता है कि हमने जिस व्यक्ति का अपमान किया, वह किसी ऐसे सरकारी दफ्तर में चपरासी हो जहां हमने किसी लाइसेंस के लिए आवेदन किया, पर क्या होगा अगर वह चपरासी हमारी फाइल ही गुम कर दे। आंधी आए तो पैरों की धूल भी आंखों में पड़ जाती है। जीवन में यह तो आवश्यक है ही कि हम शक्तिशाली हों तब भी किसी की उपेक्षा न करें, किसी का अपमान न करें, पर अध्यात्म की दुनिया में इससे भी एक कदम आगे बढक़र यह सिखाया जाता है कि हम सबसे प्रेम करें।

अनायास प्रेम करें, अकारण प्रेम करें। इसी सत्य को अगर हम दुनियादारी की भाषा में कहें तो ईश्वर मानो बिजली है जो दिखाई तो नहीं देता पर बल्ब, पंखा, मिक्सी, अवन, टीवी, एसी आदि विभिन्न उपकरणों में बिजली को महसूस किया जा सकता है, बिजली की उपस्थिति को समझा जा सकता है। इसी तरह ब्रह्मांड के हर जीव में परमात्मा का नूर देखा जा सकता है। रूप अलग हैं, शक्लें अलग हैं, शरीर अलग हैं, इनसान ही नहीं, जानवर भी और पेड़-पौधे भी परमात्मा के प्रकाश से प्रकाशित हैं। यही नहीं प्रकृति में स्थित हर जड़-चेतन वस्तु में परमात्मा की उपस्थिति होती ही है। विज्ञान कहता है कि इस दुनिया की हर वस्तु अणुओं के जोड़ से बनी है। मिट्टी, पत्थर, लोहा, लकड़ी आदि सभी जड़ या प्राणहीन मानी जाने वाली वस्तुएं भी अणुओं के जोड़ से बनी हैं। हम यह भी जानते हैं कि हर अणु में इलैक्ट्रॉन, प्रोटोन और न्यूट्रोन होता है। ये ऊर्जा के ही रूप हैं। प्रोटोन और न्यूट्रोन अणु के केंद्र में रहते हैं और इनमें धनात्मक ऊर्जा होती है, इलैक्ट्रॉन इनके बाहर रहकर इनके कवच की तरह काम करता है और यह ऋणात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण होता है। इलैक्ट्रॉन हमेशा गतिशील रहता है, मिट्टी में भी, पत्थर में भी, लोहे में भी, लकड़ी में भी।

यह सोचने की बात है कि जिस पदार्थ के अणुओं के भाग लगातार गतिशील हों, वह मृत या जीवनहीन कैसे हो सकता है? धरती, पानी, हवा और रोशनी जीवनदायी वरदान हैं, भोजन हमें पुष्ट करता है, लकड़ी, पत्थर, लोहा आदि पदार्थ विभिन्न वस्तुओं में ढलकर हमारे सुख और सुविधा का कारण बनते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में हम हर वस्तु के प्रति कृतज्ञता का भाव रखना सीखते हैं। ये सब जड़-चेतन वस्तुएं ही परमात्मा हैं। परमात्मा कहीं और नहीं है। इन सबमें परमात्मा विद्यमान है। यही कारण है कि अध्यात्म की दुनिया में हमें यह सिखाया जाता है कि हम सबसे प्रेम करें, अनायास प्रेम करें, अकारण प्रेम करें। ‘सहज संन्यास मिशन’ के हम सब अनुयायी यही मानते हैं कि प्रेम ही परमात्मा है, निश्छल प्रेम, निस्वार्थ प्रेम, अनायास प्रेम, अकारण प्रेम हो तो हम प्रेममय हो जाते हैं और यही वह स्थिति है जब हम परमात्मा के करीब होते हैं। हम प्रेममय हो जाएं तो किसी से ईष्र्या नहीं कर सकते, घृणा नहीं कर सकते, झूठ नहीं बोल सकते, धोखा नहीं दे सकते। इसके साथ-साथ खुद हममें उस धैर्य, विश्वास और आस्था का संचार होता है कि हमें किसी से भय नहीं रह जाता, चिंता नहीं रह जाती, तनाव नहीं रह जाता, अवसाद का कोई कारण नहीं रह जाता और जीवन एकदम सरल हो जाता है। ऐसा हो जाए तो मानो सब कुछ मिल गया और हम चूक गए तो जीवन बीत जाएगा, कारवां गुजर जाएगा और हम सिर्फ गुबार देखते रह जाएंगे, कारवां गुजर जाने के बाद उनके कदमों की थाप के कारण रास्ते पर उड़ती धूल देखते रह जाएंगे। चुनाव हमेशा हमारा ही है।

स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

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