जो बचपन नन्हे कदमों से चलता है वही परिपक्व होकर दौडऩे लग जाता है। जीवन के ये छोटे-छोटे सूत्र सिर्फ महत्वपूर्ण ही नहीं हैं, बल्कि बहुत उपयोगी भी हैं। यह ज्ञान का ऐसा सागर है जिसमें गोता लगाने वाले का जीवन ही बदल जाता है। क्योंकि जब हम ज्ञानगंगा में गोता लगाते हैं तो सत्य का साक्षात्कार कर पाते हैं जिससे मन में स्पष्टता आती है और हम अपने अगले कदम की पहचान कर लेते हैं, आगे क्या करना है यह सुनिश्चित कर लेते हैं। अंतर्मन की यात्रा, आत्मा के साक्षात्कार की यात्रा यहीं से आरंभ होती है। शुरू के छोटे कदम अंतत: एक सफल यात्रा में परिवर्तित हो जाते हैं। तब हम दूसरों की कमियां ढूंढऩे के बजाय अपनी सारी शक्ति अपने समग्र विकास पर लगा देते हैं। तब हम आकाश छूने की लालसा छोडक़र आत्मा के साक्षात्कार की यात्रा का महत्व समझ लेते हैं। हम तब भी पढ़ते हैं, आलिम-फाजिल होते हैं पर तब हमारा नजरिया बदल जाता है। तब हमारा ज्ञान हमारे अहंकार का नहीं, बल्कि अहंकार के मर्दन का स्रोत बन जाता है, अहंकार के मर्दन का औजार बन जाता है…
सत्रहवीं शताब्दी के भारतीय उपमहाद्वीप के लोकप्रिय सूफी संत और कवि हजरत सैय्यद अब्दुला शाह कादरी, जिन्हें बाबा बुल्ले शाह जी के नाम से बेहतर जाना जाता है, ने कहा है कि हम अपने चारों ओर देखते हैं और अपनी ही महत्ता में फूले रहते हैं, पर हम अपने अंदर झांकने का प्रयत्न ही नहीं करते, न ही अपनी कमियों-खामियों की तरफ ध्यान देते हैं। लगभग चार शताब्दी पूर्व उनकी मातृभाषा पंजाबी में लिखा गया उनका गीत ‘पढ़-पढ़ आलिम फाजिल होइयों’ अनगिनत गायकों ने गाया है और यह आज की युवा पीढ़ी का भी मनपसंद गीत है, क्योंकि इस गीत में बहुत सरल शब्दों में बहुत गहरा और सार्थक संदेश छुपा है, जो हमेशा-हमेशा प्रासंगिक है, और प्रासंगिक रहेगा। बाबा बुल्ले शाह का यह भजननुमा गीत यूं है .. ‘पढ़-पढ़ आलिम फाजिल होइयों, ते कदे आपणे आप नूं पढ़ेयाइ नईं। जा जा वड़दां एं मंदिर मसीतीं, ते कदे मन आपणे विच्च वडय़ाई नईं। ऐंवे रोज शैतान नाल लड़दैं, कदे नफस आपणे नाल लडय़ाइ नईं। बुल्ले शाह असमानी उड़दियां फडऩैं, जेहड़ा घर बैठा उहनूं फडय़ाइ नईं।’ इसका भावार्थ है कि मनुष्य पढ़ता रहता है ताकि ज्यादा से ज्यादा ज्ञान अर्जित कर सके, पर वह कभी खुद को पढऩे की कोशिश ही नहीं करता, अपने ही मन को नहीं पढ़ता। वह मनुष्य जो भाग-भाग कर मंदिर-मस्जिद में जाता है, वह कभी अपने अंतर्मन की यात्रा नहीं करता। जिन्हें वह बुरा समझता है उनकी बुराइयां करता फिरता है, उन्हें सुधारने की कोशिश करता है, पर खुद अपने अहंकार से ही अनजान है, यह वह लड़ाई है जिसे वह हर बार हार जाता है। मनुष्य आकाश छूने को लालायित है, पर वह उस आत्मा के साक्षात्कार से वंचित है, जो परमात्मा का अंश है और उसके अपने अंदर है।
भक्ति की शुरुआत तब होती है जब मनुष्य इस सूत्र को समझ लेता है कि मैं कुछ नहीं हूं, मेरी कोई इच्छा नहीं है, यानी, मैं कुछ नहीं चाहता, और यह कि इस जगत में रहते हुए, काम करते हुए मैं सिर्फ एक माध्यम हूं, कर्ता नहीं हूं, कर्ता तो खुद परमात्मा ही है। इस सूत्र का लाभ यह है कि हमारा अहंकार गिर जाता है और हमें अपने अहंकार से छुटकारा मिल जाता है। जब हमारे सारे काम परमात्मा के निमित्त होने लगते हैं तो हर काम ही पूजा हो जाता है। तब हम न झूठ बोल सकते हैं, न फरेब कर सकते हैं, न किसी की बुराई कर सकते हैं, न शिकायत कर सकते हैं। तब हमारा पूरा अस्तित्व प्रेममय हो जाता है। तब हम पर यह पूरी तरह से लागू होता है कि हम जो सोचते हैं, वही कहते हैं और करते भी वही हैं। तब हमारे विचारों और हमारी कथनी-करनी में पूर्ण सामंजस्य हो जाता है। इसी बात को वाल्मीकि रामायण में एक अन्य प्रकार से कहा गया है ..‘रामो द्विर्नाभिभाषते’। जब महारानी कैकेयी ने अवध नरेश महाराज दशरथ से अपने दो वर पूरे करने को कहा तो दशरथ शोकमग्न हो गए। उनके विश्वस्त मंत्री सुमंत जी भगवान राम और लक्ष्मण जी को बुला लाए और जब माता कैकेयी ने कहा कि महाराज के शोक का कारण तो तुम हो राम। महाराज तुमसे कुछ कहने का साहस नहीं कर पा रहे हैं। मुझे दो वर देने की प्रतिज्ञा करते समय तो शूरवीर बन रहे थे, पर तुम्हारे कारण शिथिल पड़ गए हैं। वैसे तो पुत्र को पिता की प्रतिज्ञा को आज्ञा के रूप में पालन करना चाहिए, पर पता नहीं कि तुम उनकी प्रतिज्ञा पालन में सहायता करोगे कि नहीं? इसी संशय में राजा शोकनिमग्न हैं। तब भगवान राम ने तनिक खिन्न स्वर में कहा कि ‘राम दो प्रकार से बात नहीं करता है। मैं पिता की आज्ञा के पालन के लिए प्राण भी दे सकता हूं। आप स्पष्ट कहिए।’ यानी, भगवान श्री रामचंद्र जी ने विचार, कथनी और करनी में पूर्ण सामंजस्य का आदर्श स्थापित करते हुए कहा था कि हे माता, हमारे पिता महाराज जो चाहते हैं, कृपया मुझे वह बताइये, मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि उस वचन का मैं पालन करूंगा, और आप विश्वास रखिए कि राम दोहरी अर्थात दो प्रकार की बात नहीं कहता है, कही गई बात से पीछे नहीं हटता है। जीवन है तो उतार-चढ़ाव आते ही हैं। जब किसी संकटकालीन स्थिति में भी हम शांत रहकर सोचते हैं तो हमारे सामने पहला सवाल होता है कि अभी स्थिति क्या है? इस पर हमारी प्रतिक्रिया अगर यह हो कि संकट है तो क्या हुआ, तो हमारा चित्त शांत हो जाता है और हम संकट से घबराने के बजाय समाधान ढूंढऩे की दिशा में उन्मुख हो जाते हैं और इस प्रकार हम अपना अगला कदम सुनिश्चित करते हैं कि अब क्या करें ताकि स्थिति से निपटा जा सके। यह एक छोटी सी शुरुआत है जो जीवन में किसी चामत्कारिक परिणाम का कारण भी बन सकती है। एक छोटा-सा कदम, एक छोटी-सी शुरुआत, कई बार नजरिया बदल देती है, जीवन बदल देती है, हमारी दुनिया बदल देती है। एक छोटा-सा पानी का सोता, एक सुंदर जल-प्रपात बन जाता है।
धीरे-धीरे यह एक वेगवान नदी में परिवर्तित होकर जीवन और ऊर्जा का एक सतत स्रोत बन जाता है। जो बचपन नन्हे कदमों से चलता है वही परिपक्व होकर दौडऩे लग जाता है। जीवन के ये छोटे-छोटे सूत्र सिर्फ महत्वपूर्ण ही नहीं हैं, बल्कि बहुत उपयोगी भी हैं। यह ज्ञान का ऐसा सागर है जिसमें गोता लगाने वाले का जीवन ही बदल जाता है। क्योंकि जब हम ज्ञानगंगा में गोता लगाते हैं तो सत्य का साक्षात्कार कर पाते हैं जिससे मन में स्पष्टता आती है और हम अपने अगले कदम की पहचान कर लेते हैं, आगे क्या करना है यह सुनिश्चित कर लेते हैं। अंतर्मन की यात्रा, आत्मा के साक्षात्कार की यात्रा यहीं से आरंभ होती है। शुरू के छोटे कदम अंतत: एक सफल यात्रा में परिवर्तित हो जाते हैं। तब हम दूसरों की कमियां ढूंढऩे के बजाय अपनी सारी शक्ति अपने समग्र विकास पर लगा देते हैं। तब हम आकाश छूने की लालसा छोडक़र आत्मा के साक्षात्कार की यात्रा का महत्व समझ लेते हैं। हम तब भी पढ़ते हैं, आलिम-फाजिल होते हैं पर तब हमारा नजरिया बदल जाता है। तब हमारा ज्ञान हमारे अहंकार का नहीं, बल्कि अहंकार के मर्दन का स्रोत बन जाता है, अहंकार के मर्दन का औजार बन जाता है। ऐसा हो जाए तो व्यक्ति बुद्ध सरीखा हो सकता है, महावीर सरीखा हो सकता है, नानक सरीखा हो सकता है, ब्रह्म हो सकता है, भगवान हो सकता है।
स्पिरिचुअल हीलर, सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण
गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
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