हम अपनी जिम्मेदारियों से मुंह न चुराएं, नि_ले न बैठें, अपना कर्म करते चलें, पूरी तन्मयता से, पूरी श्रद्धा से, तो वह कर्म ही पूजा बन जाता है और उस कर्म का जो भी परिणाम हो उसे स्वीकार करें तो वह पूजा का प्रसाद बन जाता है। भक्त शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में इसे ‘जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए’ कहकर हमें यह समझाया है कि ईश्वर की इच्छा या विधान के प्रति संतोष ही सारे सुखों का मूल है। उनकी यह सीख इतनी लोकप्रिय हुई कि इसे कई भजनों में समाहित कर लिया गया और ‘सीता राम, सीता राम, सीता राम कहिए, जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए’ सरीखे भजन हमारी संस्कृति का स्थाई अंग बन गए। इसके बावजूद हमारी इच्छाएं, आकांक्षाएं और हमारी प्रार्थनाएं इस सीख के विरुद्ध जाती हैं। अपने अज्ञान और लालच में हम भूल ही जाते हैं कि हमारे लिए क्या उचित है, और परमात्मा से शिकायत करने लग जाते हैं, मांग रखने लग जाते हैं…
किसी ने बहुत पते की बात कही है कि शरीर गोचर है, शरीर हमें दिखाई देता है, पर आत्मा अगोचर है, आत्मा दिखाई नहीं देती। प्रकृति में और परमात्मा में भी ऐसा ही संबंध है। परमात्मा हमें दिखाई नहीं देते, पर परमात्मा प्रकृति के रूप में प्रकट हैं, पेड़-पौधे, घास-फूस, जीव-जंतु, चेतन-अचेतन, सब में परमात्मा हैं। परमात्मा इस बाह्य रूप में हमें नजर आते हैं। विश्वास का यही लाभ है कि हम पत्थर में भी भगवान देख पाते हैं। इस सबके बावजूद हमारी आधुनिक शिक्षा-दीक्षा, परिपाटियां और संस्कार ऐसे हैं कि हम परमात्मा पर अविश्वास करते हैं। हमारी सबसे बड़ी गलती यह है कि हमने अध्यात्म के बजाय धर्म चुना है। गलती यह नहीं है कि हमने धर्म को जीवन पद्धति मान लिया है, गलती यह है कि हमने धर्म को जीवनपद्धति बनाने के लिए अध्यात्म को अलविदा कह दिया है, अध्यात्म को तिलांजलि दे दी है। पौधे पर लगा खिला हुआ फूल इतना सुंदर है कि हमें उसमें परमात्मा का नूर नजर आता है, लेकिन वही फूल गिर जाए, सूख जाए, पीला पड़ जाए तो हमारी निगाह में वह कूड़ा हो जाता है। परमात्मा तो जितना सुंदर खिले हुए सुगंधित फूल में है, उतना ही उस फूल की सूखी हुई पंखुडिय़ों में भी है। हम समझते हैं कि नास्तिक होना परमात्मा के विरुद्ध होना है और आस्तिक होकर हम परमात्मा को प्रिय हो जाते हैं। लेकिन हम आस्तिक और नास्तिक के असली भेद को ही नहीं जानते।
हमारे इस संसार की बड़ी समस्या यह है कि आस्तिक माने जाने वाले लोग ही परमात्मा पर सबसे ज्यादा अविश्वास करते हैं। आस्तिकता का अर्थ ईश्वर को मान लेना नहीं है, क्योंकि ईश्वर को बिना माने भी कोई आस्तिक हो सकता है। और ईश्वर को मानते हुए भी लाखों लोग नास्तिक हैं, करोड़ों लोग नास्तिक हैं। जो लोग किसी पूजा स्थल पर जाकर माथा टेकते हैं, भजन गाते हैं, प्रवचन सुनते हैं, लेकिन वहां से बाहर आते ही झूठ, फरेब, ठगी, धोखा, चोरी, क्रोध, ईष्र्या आदि में से कुछ भी करना शुरू कर देते हैं, उनसे बड़ा नास्तिक कोई नहीं, और जो लोग इस ब्रह्मांड के हर जीव से, हर जड़-चेतन से प्यार करते हैं, वे ईश्वर को मानें या न मानें, वे परमात्मा से प्यार करें या न करें, परमात्मा उनसे प्यार करते हैं। इस दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते पर वे जनकल्याण में रत रहते हैं। उनसे बड़ा आस्तिक और कोई नहीं है। अगर हम अपने व्यवहार का निष्पक्ष विवेचन करेंगे तो हम पाएंगे कि हम आस्तिक लोग यह तो मानते हैं कि परमात्मा सर्वशक्तिमान है, परमात्मा की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, लेकिन कहीं न कहीं हमारा व्यवहार यह सिद्ध करता है कि हम परमात्मा के सिस्टम पर, परमात्मा की योजना पर विश्वास नहीं करते और हम खुद को परमात्मा से कहीं ज्यादा बुद्धिमान मानते हैं। जब हम प्रार्थना करते हैं तो परमात्मा के दिए उपहारों के लिए परमात्मा का शुक्रिया अदा करने के बजाय या तो परमात्मा से शिकायत करते हैं, उनके ही सिस्टम के खिलाफ शिकायत करते हैं या अपनी कुछ मांग रखकर परमात्मा के सिस्टम पर अविश्वास जताते हैं। आइए, इसे एक उदाहरण से समझते हैं। घर में मेरी बूढ़ी मां है, पिता जी कई साल पहले भगवान को प्यारे हो गए। मां बूढ़ी हैं, कमजोर हैं, चलना-फिरना मुश्किल से हो पाता है और उस पर तुर्रा यह कि अब वो बीमार हैं। तो हम प्रार्थना करते हैं कि हे भगवान, मेरी मां को स्वस्थ कर दो, उनका बुखार ठीक कर दो। सच हैं, मां बीमार होंगी तो हम चाहेंगे ही कि उनकी सेहत ठीक हो जाए, वे चलने-फिरने के काबिल हो जाएं, अपना ध्यान खुद रखने के काबिल हो जाएं। यहीं हम गलत हो जाते हैं। जब हम यह प्रार्थना करते हैं कि मेरी बूढ़ी मां स्वस्थ हो जाएं तो मानो हम भगवान को यह कहते हैं कि हम आपसे ज्यादा समझदार हैं। आपने गलती कर दी, मेरी माता जी को बुखार देने से पहले कम से कम मुझसे पूछ तो लिया होता, मुझसे सलाह तो की होती। हमारी इस तरह की हर प्रार्थना का अर्थ यही है कि हम परमात्मा के किए को अस्वीकार कर रहे हैं, हम परमात्मा के सिस्टम पर अविश्वास जता रहे हैं।
श्री गुरू ग्रंथ साहिब में संकलित सिख परंपरा के पांचवें गुरु अर्जुन देव जी की बाणी में कहा गया है ‘तेरा भाणा मीठा लागे’, जो ईश्वर की इच्छा के प्रति गहरे विश्वास का प्रतीक है। आसानी से समझ आ जाने वाले बहुत ही सरल शब्दों में यह बहुत गहरी शिक्षा है। ‘भाणा’ का अर्थ है इच्छा, रजा, यानी परमात्मा जो कुछ भी करते हैं हम उसे अमृत मानकर स्वीकार करें। ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करने में ही सच्चा सुख और शांति है। चाहे जीवन में कैसा भी अनुभव हो, उसे दयावान दीनबंधु ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करना चाहिए। परमात्मा की रजा में राजी रहने का भाव ही इस शिक्षा का सार है। श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान श्री कृष्ण ने निष्काम कर्म की जो शिक्षा दी है उसका अर्थ भी यही है कि हम अपनी पूरी काबीलियत से, पूरी शक्ति से, पूरे निश्चय से अपना हर काम करें, काम में आलस्य न हो, काम में कमी न हो, काम की गुणवत्ता में कमी न हो, उसके बाद जो हो वह परमात्मा की रजा और हम उसमें सिर्फ संतुष्ट ही न हों, बल्कि प्रसन्न हों, खुश हों, उसे परमात्मा का आशीर्वाद मानकर, परमात्मा का प्रसाद मानकर स्वीकार करें।
कर्म करें, फल की चिंता परमात्मा पर छोड़ दें, तो यह निष्काम कर्म है। हम अपनी जिम्मेदारियों से मुंह न चुराएं, नि_ले न बैठें, अपना कर्म करते चलें, पूरी तन्मयता से, पूरी श्रद्धा से, तो वह कर्म ही पूजा बन जाता है और उस कर्म का जो भी परिणाम हो उसे स्वीकार करें तो वह पूजा का प्रसाद बन जाता है। भक्त शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में इसे ‘जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए’ कहकर हमें यह समझाया है कि ईश्वर की इच्छा या विधान के प्रति संतोष ही सारे सुखों का मूल है। उनकी यह सीख इतनी लोकप्रिय हुई कि इसे कई भजनों में समाहित कर लिया गया और ‘सीता राम, सीता राम, सीता राम कहिए, जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए’ सरीखे भजन हमारी संस्कृति का स्थाई अंग बन गए। इसके बावजूद हमारी इच्छाएं, आकांक्षाएं और हमारी प्रार्थनाएं इस सीख के विरुद्ध जाती हैं। अपने अज्ञान और लालच में हम भूल ही जाते हैं कि हमारे लिए क्या उचित है, और परमात्मा से शिकायत करने लग जाते हैं, मांग रखने लग जाते हैं। इतना ही समझ लें और परमात्मा की रजा को प्रसाद मान लें तो जीवन सुख, शांति और समृद्धि से भरपूर होकर सफल जीवन बन जाता है। यही इस सीख का सार है।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
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