झूठे दिमाग का सच

हमारे दिमाग की यह खासियत एक खूबी भी है और खामी भी क्योंकि इसका असर हमारे रिश्तों पर भी पड़ रहा है। कोई व्यक्ति अगर हमें नापसंद है तो हम उसके हर अच्छे काम में भी कमियां निकाल लेते हैं और यदि कोई व्यक्ति हमें बहुत पसंद हो तो हमें उसकी गलतियां भी नजर नहीं आतीं। एक व्यक्ति हंस रहा है, वह हमें पसंद हो तो हम कहेंगे कि क्या फूल झर रहे हैं और अगर नापसंद हो तो हम कहेंगे कि क्या दांत फाड़ रहा है। किसी भी कारण से यदि हमें किसी पर शक हो जाए तो हमारा दिमाग खुद ही कहानियां गढऩे लग जाता है। जिस व्यक्ति पर हमें शक हो उसके हर काम में हमें गड़बड़ी का अंदेशा रहता है। आज परिवारों के टूटने का यह बहुत बड़ा कारण बन गया है। पति-पत्नी में किसी को भी अगर अपने साथी पर शक हो जाए तो सिर्फ शक के ही कारण कई बार स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि तलाक तक की नौबत आ जाती है…

यह तो सच है ही कि यदि ज्ञान अर्जित किया जाए और इसे प्रयोग में भी लाया जाए तो यह अपने आप में ही एक शक्ति, एक ताकत बन जाता है, और यदि इसे रचनात्मक ढंग से काम में लाया जाए तो यह एक बड़ी ताकत बन जाता है। ज्ञान के रचनात्मक प्रयोग में कल्पनाशक्ति की आवश्यकता होती है, इसीलिए मनोवैज्ञानिक आरंभ से ही कल्पनाशक्ति को मानव समाज का सर्वोत्तम उपहार मानते रहे हैं। रचनात्मक कल्पनाशक्ति का विकास उसी तरह संभव है जैसे हम तैरना, पढऩा या चित्र बनाना सीखते हैं। वस्तुत: लगभग हर कला को वैज्ञानिक विधि से सीखा जा सकता है। कला और विज्ञान के इस संगम ने ही मानव को अपरिमित ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। हमारी कल्पनाशक्ति भी हमारी स्मरणशक्ति जितनी ही पुरानी है। कल्पनाशक्ति के विकास के लिए बुद्धिमत्ता, ज्ञान और अनुभव से भी ज्यादा बड़ी भूमिका हमारे हालात और हमारी जरूरत की होती है। यही कारण है कि अगर कभी हमारी जान पर आ बने तो हमारी कल्पनाशक्ति ज्यादा मुखर हो जाती है। ज्ञान और रचनात्मक कल्पनाशक्ति का मेल हमें शक्तिशाली बनाता तो है, पर हम यह भूल जाते हैं कि हमारे दिमाग की बहुत सी सीमाएं भी हैं और हमारा अपना ही दिमाग हमें पथभ्रमित भी कर सकता है। दरअसल, अगर हम जरा भी लापरवाह हो जाएं तो हमारा दिमाग अक्सर हमें पथभ्रमित करता ही है और सही मार्गदर्शन के बजाय गलत राह पर डाल देता है।

मानव मस्तिष्क पर किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों से यह पता चलता है कि हमारे दिमाग की पहली प्राथमिकता हमें जिंदा रखना है, किसी भी आसन्न संकट से बचाना है, संकट वास्तविक हो या काल्पनिक, संकट से रक्षा करना दिमाग का मूलभूत काम है और हमें जीवित रखने के प्रयास में दिमाग अक्सर हमें ऐसा घनचक्कर बना देता है कि हमारी मति मारी जाती है और हम ऐसे-ऐसे काम कर डालते हैं कि बाद में हम यह नहीं समझ पाते कि हमने इतनी बड़ी भूल कैसे कर डाली? दिमाग की सीमाओं को समझने के लिए एक छोटा-सा उदाहरण ही काफी है। जब हम कोई सडक़ पार करने लगते हैं तो हमारा दिमाग हमें उस सडक़ पर आने-जाने वाली गाडिय़ों की, उनकी संभावित गति की, हम तक पहुंच पाने के समय की, सडक़ की चौड़ाई और उसे पार करने में लगने वाले समय की सूचना देता है। ट्रैफिक लाइट को ध्यान में रख कर और शेष सूचनाओं के आधार पर हम तय करते हैं कि हमें सडक़ पार करना शुरू करना चाहिए या गाडिय़ों के निकल जाने का इंतजार करना चाहिए और अगर हम सडक़ पार करना शुरू कर दें तो हमारी गति क्या होनी चाहिए ताकि हम सुरक्षित सडक़ के दूसरी ओर पहुंच जाएं। सडक़ पार करते समय हमारी आंखें और कान ज्यादा चौकन्ने हो जाते हैं और हमारी मांसपेशियां उसी अनुपात में सक्रिय हो जाती हैं। ऐसे में हमारा दिमाग इस हद तक फोकस में हो जाता है कि ये सारी सूचनाएं और उनके आधार पर लिया गया निर्णय अक्सर एक सैकेंड से भी कम समय में हो जाता है। यह सारा इंतजाम हमारी सुरक्षा के लिए है। हमारा दिमाग जानता है कि एक छोटी सी भूल भी हमारे जीवन के लिए खतरा बन सकती है, अत: वह अंत्यत जागरूकता से, पूरी गंभीरता और जिम्मेदारी से अपना यह कर्तव्य निभाता है। अपने इस काम को अंजाम देने के लिए हमारा दिमाग बहुत सी बातों की उपेक्षा कर देता है। इस दौरान हमारा ध्यान सडक़ के आसपास के पेड़-पौधों और उनके फूलों-फलों की सुगंध की ओर नहीं जाता, पक्षियों की चहचहाट हमें सुनाई नहीं देती, चारों तरफ के शोर, हॉर्न की आवाजें आदि भी हमें सुनाई नहीं देती। हमारा दिमाग हर अप्रासंगिक तथ्य की उपेक्षा कर देता है और पूरे फोकस से हमारी सुरक्षा में लगा रहता है।

यही कारण है कि सडक़ पार करते समय बाकी सब कुछ मानो अदृश्य हो जाता है। वैज्ञानिक इसे सिलेक्टिव अवेयरनेस यानी, चयनात्मक जागरूकता का नाम देते हैं। अवेयरनेस यानी जागरूकता का मतलब है किसी चीज के बारे में ज्ञान, समझ या चेतना होना, और सिलेक्टिव अवेयरनेस का मतलब है कि पूरे दृश्य के बजाय उसके एक खास हिस्से पर पूरे ध्यान का फोकस होना। चयनात्मक जागरूकता में हमारा पूरा ध्यान उन चीजों पर फोकस हो जाता है जो उस समय हमारे लिए महत्वपूर्ण हों। स्थितियों, घटनाओं और वस्तुओं के विश्लेषण की हमारी क्षमता सीमित है, यही कारण है कि हमारा दिमाग सिर्फ प्रासंगिक चीजों पर ही फोकस करता है और बाकी सभी सूचनाओं की उपेक्षा कर देता है। एक अन्य उदाहरण से इसे भी आसानी से समझा जा सकता है। हमारे सामने अगर दो टीमें हों जो एक-दूसरे की ओर गेंद फेंक रही हों। इनमें से एक टीम की टी-शर्ट पीले रंग की हो और दूसरी टीम की टी-शर्ट हरे रंग की हो और हमें यह निर्देश दिया जाए कि हमें यह गिनना है कि पीली टी-शर्ट वाली टीम ने कितनी बार हरी टी-शर्ट वाली टीम की ओर गेंद फेंका तो हम यह काम पूरी दक्षता से कर दिखाएंगे, लेकिन गेंद फेंकने की क्रिया का ध्यान करते समय यह नोटिस नहीं कर पाएंगे कि इसी दौरान दोनों टीमों के पीछे से एक ऐसा व्यक्ति भी गुजरा जिसने वनमानुष की ड्रेस पहन रखी थी। हमारे दिमाग की यह खासियत एक खूबी भी है और खामी भी क्योंकि इसका असर हमारे रिश्तों पर भी पड़ रहा है। कोई व्यक्ति अगर हमें नापसंद है तो हम उसके हर अच्छे काम में भी कमियां निकाल लेते हैं और यदि कोई व्यक्ति हमें बहुत पसंद हो तो हमें उसकी गलतियां भी नजर नहीं आतीं।

एक व्यक्ति हंस रहा है, वह हमें पसंद हो तो हम कहेंगे कि क्या फूल झर रहे हैं और अगर नापसंद हो तो हम कहेंगे कि क्या दांत फाड़ रहा है। किसी भी कारण से यदि हमें किसी पर शक हो जाए तो हमारा दिमाग खुद ही कहानियां गढऩे लग जाता है। जिस व्यक्ति पर हमें शक हो उसके हर काम में हमें गड़बड़ी का अंदेशा रहता है। आज परिवारों के टूटने का यह बहुत बड़ा कारण बन गया है। पति-पत्नी में किसी को भी अगर अपने साथी पर शक हो जाए तो सिर्फ शक के ही कारण कई बार स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि तलाक तक की नौबत आ जाती है। ऐसे बहुत से मामले सामने आए हैं जहां शक के कारण रिश्ता टूट गया जबकि असलियत यह थी कि सिर्फ शक ने ही राई का पहाड़ बना डाला था। अपने झूठे दिमाग के इस सच को अगर हम समझ लें तो हमारे निर्णय ज्यादा सटीक हो जाएंगे और दिमाग हमारा साथ तो देगा, पर हमें भटका नहीं सकेगा। इसी में हमारा कल्याण है।

स्पिरिचुअल हीलर, सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण 

गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

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