जब व्यक्ति केवल साथी से ही प्रेम की अपेक्षा करता है, तब संबंध असंतुलित हो जाता है। परंतु जब वह अपने भीतर भी प्रेम उगाता है, तब संबंध खिल उठता है। कई बार व्यक्ति के भीतर गहरी भावनात्मक चोटें होती हैं। जब कोई हमें छोड़ दे, अलग हो जाए, या हमें अस्वीकृत कर दे, लगातार हमारी उपेक्षा करता रहे तो भावनात्मक चोट सचमुच गहरी होती है और आज के प्रेम में अक्सर दिखाई देती हैं। इन घावों को समझने और भरने के लिए संवाद महत्वपूर्ण है, पर कभी-कभी किसी अनुभवी मार्गदर्शक, किसी चिकित्सक, या किसी गुरु की शरण भी आवश्यक होती है, क्योंकि कुछ घाव ऐसे होते हैं जो अकेले नहीं भरे जा सकते, उन पर प्रेम, करुणा और समझ की मरहम लगानी होती है…
मनुष्य के जीवन में संबंध केवल बाहरी जुड़ाव नहीं, बल्कि आत्मा की गहनतम यात्रा का साधन हैं। यही कारण है कि हम प्रेम की ओर आकर्षित होते हैं, परंतु यही प्रेम जब भय, असुरक्षा और आश्रय की मांग से घिर जाता है, तब वह संबंध को पोषित करने के बजाय संबंध को थका देता है। इसे ‘आश्रित मन’ कहा जाता है, ऐसा मन जिसे बचपन में आश्वासन नहीं मिला, जो कभी भी अपने अभिभावकों से पूरी सुरक्षा का अनुभव नहीं कर पाया। इसलिए वह मन वयस्क होने पर भी उसी सुरक्षा की खोज करता रहता है, कभी साथी के पास, कभी परिवार में, कभी समाज में। बचपन की इस छाया से वयस्क जीवन के संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जब शिशु को अपने माता-पिता से समय पर स्पर्श, ध्यान, प्रेम और भरोसा मिलता है, तब उसका भावनात्मक जन्म सुरक्षित होता है। परंतु यदि यह जन्म असुरक्षित, अधूरा या टूटा हुआ हो, तो यही टूटी हुई संरचना आगे चलकर संबंधों में चिंता, भय और निर्भरता के रूप में प्रकट होती है। असलियत यह है कि बचपन की कमी को वयस्क संबंध पूरा नहीं कर सकते, इसीलिए जब व्यक्ति में ऐसे जुड़ाव की चाहत होती है जिसमें बहुत ज्यादा चिंता शामिल हो, छोड़ दिए जाने का डर शामिल हो तो वह अपने साथी से सामान्य से अधिक आश्वासन चाहता है।
उसे लगता है कि कहीं साथी छोड़ न दे, कहीं प्रेम कम न हो जाए, कहीं वह अकेला न पड़ जाए। मन इतना भयभीत हो जाता है कि वह सबसे प्रिय व्यक्ति के साथ चिपककर रहने लगता है। एक स्पिरिचुअल हीलर के रूप में मैंने महसूस किया है कि आश्रित मन में तीन मुख्य वृत्तियां दिखती हैं। सबसे पहली वृत्ति है छोड़ दिए जाने का भय, और यह भय इतना गहरा है कि मन बार-बार भविष्य की कल्पना करता है .. ‘अगर वह मुझे छोड़ दे तो? अगर उसे कोई और मिल गया तो?’ यह कल्पना इतनी गहरी हो जाती है कि वास्तविकता भी धुंधली पडऩे लगती है। इसी कारण उसे अतिरिक्त आश्वासन की आवश्यकता महसूस होती है और व्यक्ति बार-बार पुष्टि चाहता है .. ‘क्या तुम मुझसे प्यार करते हो? क्या तुम नाराज तो नहीं? क्या तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगे?’ यह प्रश्न साथी को थकाता है, अंतत: यह भावनात्मक उथल-पुथल में बदल जाता है और छोटी-छोटी बातों में भी चिंता बढ़ जाती है। यह सब इसलिए नहीं कि व्यक्ति गलत है, बल्कि इसलिए कि उसका मन अधूरा है और वह अधूरापन प्रेम से भरना चाहता है। परिणाम यह होता है कि संबंध में संघर्ष उत्पन्न होने के आसार बढ़ जाते हैं। जब रिश्ते में एक साथी भावनात्मक रूप से अतिशय आश्रित होता है और दूसरा तुलनात्मक रूप से स्वतंत्र, तो संघर्ष स्वाभाविक है। आश्रित साथी अधिक निकटता चाहता है, दूसरा साथी थोड़ी-सी दूरी भी चाहता है। यहीं कठिनाई उत्पन्न होती है क्योंकि आश्रित मन निकटता को प्रेम समझता है, और दूरी को अस्वीकृति, परंतु दूरी कभी-कभी आवश्यक होती है जैसे सांस लेने के लिए हवा चाहिए, वैसे ही संबंध को भी अपनी स्वतंत्रता चाहिए। मानसिक सुरक्षा, आश्रित मन की सबसे बड़ी जरूरत है। वह साथी को पकडक़र रखना नहीं चाहता, वह सिर्फ यह महसूस करना चाहता है कि मैं सुरक्षित हूं, मुझे छोड़ा नहीं जाएगा। परंतु समस्या यह है कि यह सुरक्षा अंदर नहीं है, इसलिए वह बाहर तलाशता है। आश्रित मन को ठीक करने के लिए किसी साथी को बदलने की आवश्यकता नहीं होती, आवश्यक है अपने भीतर ‘स्व-आश्रय’ का निर्माण। जब व्यक्ति स्वयं को सहारा देना सीख जाता है, तब उसे बाहरी सहारे की आवश्यकता कम हो जाती है। यह तीन मार्गों से संभव है।
इनमें सबसे पहली है आत्म जागरूकता की साधना, इसके बाद आता है सीमाएं निर्धारित करना, यानी किसी को कहां तक के व्यवहार की छूट देनी है, यह प्रेम की रक्षा के कवच की तरह काम करती है। तीसरी और अंतिम है अपनी खुद की देखभाल करना, खुद से प्यार करना, अपने भीतर अपने लिए प्रेम उगाना। आत्म-जागरूकता की साधना के लिए हमें अपने भय को पहचानना होता है, अपने ट्रिगर को समझकर अपने मन के पैटर्न को देखना होता है। इसका वास्तविक अर्थ है अपने मन को दर्पण दिखाना। जब हम देखते हैं कि हमारा भय वास्तव में हमारे बचपन की लालसाएं हैं, न कि हमारा साथी, तब संबंधों में बोझ कम होता है। आत्म-जागरूकता हमें प्रतिक्रियाओं से मुक्त करती है। हम जान जाते हैं कि यह हमारी कमी है, साथी की गलती नहीं। इसी प्रकार सीमाओं का स्पष्टीकरण दरअसल प्रेम की रक्षा का कवच है। कई लोग सीमाओं को दूरी समझते हैं। परंतु सीमा वास्तव में प्रेम की मर्यादा है। सीमाएं होने से संबंध स्पष्ट होता है कि कब बात करनी है, कब निजी समय है, कहां हम एक-दूसरे की स्वतंत्रता स्वीकारते हैं। सीमा वही है जो नदी को दिशा देती है, नदी बंधन में नहीं बंधती, प्रवाह पाती है। जब हम किसी दूसरे पर अत्यधिक निर्भर हो जाते हैं, अपने हर काम और हर विचार के लिए उसकी सहमति चाहते हैं, स्वीकृति चाहते हैं तो हम खुद तो कमजोर होते ही हैं, अपने साथी को भी परेशान करते हैं, इस हद तक कि उसे हमसे चिढ़ होने लग जाए।
इससे बचने का सरल उपाय यह है कि हम अपने भीतर अपने लिए प्रेम जगाएं। इससे हमारा आत्मविश्वास बढ़ेगा और रिश्तों की मिठास कम नहीं होगी। हम जब अपने लिए अपने भीतर प्रेम जगाते हैं, तभी हम बाहरी प्रेम को सहजता से स्वीकार कर पाते हैं। इसका सीधा सा मतलब है अपने मन को विश्राम देना, अपने शरीर को सम्मान देना, अपने अकेलेपन को मित्र बनाना। जब व्यक्ति केवल साथी से ही प्रेम की अपेक्षा करता है, तब संबंध असंतुलित हो जाता है। परंतु जब वह अपने भीतर भी प्रेम उगाता है, तब संबंध खिल उठता है। कई बार व्यक्ति के भीतर गहरी भावनात्मक चोटें होती हैं। जब कोई हमें छोड़ दे, अलग हो जाए, या हमें अस्वीकृत कर दे, लगातार हमारी उपेक्षा करता रहे तो भावनात्मक चोट सचमुच गहरी होती है और आज के प्रेम में अक्सर दिखाई देती हैं। इन घावों को समझने और भरने के लिए संवाद महत्वपूर्ण है, पर कभी-कभी किसी अनुभवी मार्गदर्शक, किसी चिकित्सक, या किसी गुरु की शरण भी आवश्यक होती है, क्योंकि कुछ घाव ऐसे होते हैं जो अकेले नहीं भरे जा सकते, उन पर प्रेम, करुणा और समझ की मरहम लगानी होती है। प्रेम एक-दूसरे को पकडक़र रखने का नाम नहीं है। प्रेम का अर्थ है एक-दूसरे को सुरक्षित अनुभव कराना। सुरक्षित संबंध में मन शांत होता है, भय कम हो जाता है और हृदय खुलने लगता है। पर यह याद रखना भी जरूरी है कि यह कोई दोष नहीं है। यह अधूरे प्रेम की पुकार है। जब हम इसे पहचान लेते हैं और आपसी प्रेम और सहयोग से इसका उपचार कर लेते हैं, तब यही मन सबसे अधिक करुणामयी, संवेदनशील और प्रेमपूर्ण बन जाता है।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
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