भजन का अर्थ है मन को भीतर की ओर मोडऩा, थोड़ा ठहरना, थोड़ा सुनना, थोड़ा विसर्जित होना। आज पूरी दुनिया सुविधाओं से भरी है। स्मार्टफोन, एसी, नेटफ्लिक्स, ऐप्स, ट्रिप्स, पर ‘स्व’ की यात्रा वहीं की वहीं खड़ी है। हम कह डालते हैं कि समय नहीं मिलता, पर यह भूल जाते हैं कि जिसके लिए समय नहीं मिलता, वही तो हमारा असली खजाना है। मनुष्य जन्म कोई दंड नहीं है, कोई पुरस्कार भी नहीं है, यह एक मौका है अपने भीतर के फूल को खिलाने का। अपने भीतर के ईश्वर को पहचानने का, उस तक पहुंचने का। यह जीवन हमें केवल जीने के लिए ही नहीं, बल्कि जागने के लिए मिला है। सवाल यह है कि जागें कैसे? जागरण की लिव लग जाए तो समझ आ जाता है कि जागरण की पहली सीढ़ी है, सांसों पर ध्यान, दूसरी सीढ़ी है मौन…
इस संसार में तीन उपलब्धियां अत्यंत दुर्लभ हैं। प्रथम तो मनुष्य जन्म मिलना, क्योंकि यह देव-दुर्लभ है। देव योनि भोग योनि है जब तक पुण्य-कर्मों का फल शेष है, देव योनि समाप्त नहीं हो सकती। इधर जब तक पाप कर्मों का फल शेष है, तब तक मनुष्य जन्म नहीं मिल सकता है। यह भगवान की कृपा से ही सुलभ हो पाता है। इसीलिए भक्त शिरोमणि गोस्वामी तुलसी दास जी कहते हैं कि ‘बड़़े भाग मानुष तनु पावा।’ मनुष्य जन्म कोई जैविक घटना नहीं है। यह केवल मां-बाप के मिल जाने का परिणाम नहीं है। यह अस्तित्व का एक रहस्य है, एक आमंत्रण है, एक द्वार है जो केवल मनुष्य के लिए खुलता है। समस्या यह है कि जिस चीज को हम बिना प्रयास के पा लेते हैं, उसे हल्का समझ लेते हैं। हम इसी भूल में फंसे हैं। हमें लगता है कि मनुष्य होना एक सामान्य बात है, लेकिन ऐसा नहीं है। चेतना की अनंत यात्रा में यह शरीर, यह मन, यह बुद्धि, यह सब एक दुर्लभ क्षण है। दूसरी दुर्लभ उपलब्धि है किसी सच्चे संत का सत्संग मिलना, यह कठिन इसलिए है क्योंकि यह संसार कर्मक्षेत्र है। इसमें मनुष्य प्रत्यक्ष, किंतु अंतत: दु:ख देने वाले कर्मों में लिप्त मिलता है। प्रथम तो संतों का मिलना ही कठिन है। मिल भी जाए तो उनको पहचानना कठिन है। तभी गोस्वामी जी ने कहा है ‘बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता।’ तीसरी और सबसे दुर्लभ उपलब्धि है भगवद् भजन में रुचि होना। संसार के विषयों में आसक्ति जितनी सहज है, भजन में आसक्ति उतनी ही कठिन है। इसलिए आशुतोष भगवान शंकर ने माता पार्वती जी से कहा कि ‘सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं विषय अनुरागी।’ निश्चित ही वे लोग अभागे हैं जो मनुष्य शरीर प्राप्त कर पाने के बावजूद भगवद् भजन नहीं करते तथा हरि का परित्याग कर विषयों के प्रति अनुरक्त होते हैं। मनुष्य जीवन कोई सहज घटना नहीं है। यह तो अनंत योनियों की यात्रा के बाद प्राप्त होने वाली एक दिव्य मंजिल है, एक ऐसा अवसर जिसमें चेतना अपने वास्तविक स्रोत को पहचान सकती है। जब संत परंपरा कहती है ‘बड़े भाग मानुष तनु पावा’, तो यह केवल कोई काव्य पंक्ति नहीं, बल्कि अस्तित्व की सबसे गहरी सच्चाई का उद्घोष है।
सच ही है कि मनुष्य जन्म मांस, रक्त और हड्डियों का ढांचा मात्र नहीं, बल्कि चेतना के जागने की खिडक़ी है। इसे पहचानें, इससे पहले कि सांसों की गिनती अपने अंतिम अंक पर पहुंच जाए। हम जब तक अपने भीतर की ज्योति को नहीं जगाते, तब तक हम संसार की विशाल भीड़ में चलते-फिरते एक अचेतन कण के समान ही हैं। हम चांद पर कदम रख चुके हैं, लेकिन अपने भीतर कदम रखना भूल गए हैं। हमने दुनिया जीत ली है, पर स्वयं को हार गए हैं। हम भूल गए हैं कि विजय बाहर नहीं, भीतर है। यही नहीं, हम यह भी भूल गए हैं कि मनुष्य वह अद्भुत जीव है जिसमें विवेक की ज्योति है, आत्मबोध की क्षमता है। उसमें यह सामथ्र्य है कि वह अपने कर्म, अपने विचार और अपने संस्कारों को बदल सके। पशु जगत में यह परिवर्तन संभव नहीं। देव लोक में भी यह परिवर्तन दुर्लभ है, क्योंकि वहां भोग की प्रबलता है और विवेक की चुनौती नहीं। यह समझना आवश्यक है कि मनुष्य जन्म वह पुल है, जहां से हम चाहें तो ऊपर जा सकते हैं, ईश्वर की ओर, चाहे तो नीचे गिर सकते हैं, अज्ञान की ओर। यह हमारे भीतर की जागृति पर निर्भर करता है। हम अपनी बुद्धि पर गर्व तो बहुत करते हैं, परंतु जब वह भीतर के अंधकार से सामना होता है, तब हमें अपनी सीमाओं का पता चलता है। गुरु मिलना इसलिए कठिन कहा गया है क्योंकि सच्चा गुरु हमें अपने पीछे चलने को नहीं कहता, बल्कि हमें भीतर की राह पर चलना सिखाता है। भजन का अर्थ केवल नाम जप या कीर्तन नहीं है। भजन का वास्तविक अर्थ है मन को भगवद् चिंतन में स्थिर करना। संसार में आसक्ति तत्काल लगती है क्योंकि वह मन की पुरानी लत है, भजन की रुचि कठिन है क्योंकि वह मन की दिशा बदलने का प्रयास है।
हम बाहर की दिशा में अनुभवी हैं, भोजन, इंद्रियां, आशाएं, इच्छाएं, महत्वाकांक्षाएं और न जाने क्या-क्या? लेकिन भीतर की यात्रा से हम अपरिचित हैं, इसीलिए भजन में रुचि जागना स्वयं में एक क्रांति है। मनुष्य जन्म कठिन है, मिल जाए तो सौभाग्य है, लेकिन जीवन को केवल खाने-पीने, कमाने और मिट जाने की प्रक्रिया बनाकर हम इस सौभाग्य को खुद ही दुर्भाग्य में बदल देते हैं। मनुष्य जन्म आकस्मिक नहीं है, यह संयोग भी नहीं, यह हमारी लंबी-लंबी यात्राओं का सार है। हम इस धरती पर इसलिए आए हैं ताकि हमारे भीतर का बीज वृक्ष बन सके, और यही बात इस वाक्य को जीवित करती है कि बड़े भाग मानुष तनु पावा। हम पूरी जिंदगी यह साबित करने में लगा देते हैं कि हम ‘जागे हुए’ हैं, लेकिन भीतर कहीं एक कोना जानता है कि हम कहीं गहरी नींद में हैं। एक नींद जो सोचने, दौडऩे, कमाने, संघर्ष करने के बहाने ओढ़ी हुई है। मजेदार बात यह है कि सच्चाई खोजने में लगे लोग बड़े-बड़े तप करते हैं। कुछ लोग हिमालय जाते हैं, कुछ अकेले रहकर आत्मा तलाशते हैं, और कुछ सोचते हैं कि शायद सोलो ट्रिप से ही सब समझ आएगा, लेकिन जागृति किसी लोकेशन का प्रश्न नहीं, यह तो एक आंतरिक क्लिक है जो कभी ध्यान में होता है, कभी टूटे दिल में, कभी किसी मासूम बच्चे को देखकर और कभी-कभी तो हंसते-हंसते भी। अनायास ही एक छोटी सी जागृति की किरण उतरती है। वही क्षण भजन का बीज है। भजन का मतलब सिर्फ स्वर नहीं है। यह कोई धार्मिक ऐप नहीं कि चलाओ और पुण्य मिल जाए।
भजन का अर्थ है मन को भीतर की ओर मोडऩा, थोड़ा ठहरना, थोड़ा सुनना, थोड़ा विसर्जित होना। आज पूरी दुनिया सुविधाओं से भरी है। स्मार्टफोन, एसी, नेटफ्लिक्स, ऐप्स, ट्रिप्स, पर ‘स्व’ की यात्रा वहीं की वहीं खड़ी है। हम कह डालते हैं कि समय नहीं मिलता, पर यह भूल जाते हैं कि जिसके लिए समय नहीं मिलता, वही तो हमारा असली खजाना है। मनुष्य जन्म कोई दंड नहीं है, कोई पुरस्कार भी नहीं है, यह एक मौका है अपने भीतर के फूल को खिलाने का। अपने भीतर के ईश्वर को पहचानने का, उस तक पहुंचने का। यह जीवन हमें केवल जीने के लिए ही नहीं, बल्कि जागने के लिए मिला है। सवाल यह है कि जागें कैसे? जागरण की लिव लग जाए तो समझ आ जाता है कि जागरण की पहली सीढ़ी है, सांसों पर ध्यान, दूसरी सीढ़ी है मौन। ये दो सीढिय़ां पार कर लें तो आगे की राह स्वत: खुल जाती है और अगर हम चमत्कार दिखाने में व्यस्त न हो जाएं तो अध्यात्म की राह आसान हो जाती है, आखिर यही तो हमारा
लक्ष्य है।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
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