मन चिंतित हो तो हमारी सोच कुंद हो जाती है और हम सचमुच बेबस हो जाते हैं। तब एकमात्र उपाय यही है कि कुछ समय के लिए, और हो सके तो कुछ दिनों के लिए उस समस्या से अपना मन पूरी तरह से हटा लें। जब भावनाओं का उद्वेग शांत हो जाए तो उस पर फिर से विचार करें, खुद से सवाल करें, सवाल करते चलें और अंतत: हल तक पहुंच जाएं। कुछ समय के लिए समस्या से मन हटा लेने का लाभ यह भी होता है कि अक्सर कोई समाधान अचानक सूझ जाता है, कभी विचार के द्वारा, कभी किसी स्वप्न के द्वारा और कभी अचानक किसी बातचीत में। ध्यान यही रखना है कि समस्या आए तो चिंतित न हों, बस उसे टुकड़ों में बांटें और हर टुकड़े के हल का प्रयास करें। खुद से सवाल करने की प्रक्रिया को अपनाएंगे तो समस्याओं की चिंता से बचे रहेंगे…
अक्सर हम जब भ्रम की स्थिति में होते हैं, चिंतित होते हैं, अनिर्णय की स्थिति में होते हैं, जीवन के किसी खास मुकाम पर दोराहे पर होते हैं और हमें समझ नहीं आता कि हम क्या करें, किस दिशा में जाएं, क्या निर्णय लें, तो हम अक्सर अपनों की, अपने मित्रों की, अपने शुभचिंतकों की या फिर अपने गुरुजनों से सलाह लेते हैं। किसी दूसरे से सलाह मांगने का लाभ यह है कि दूसरा व्यक्ति उस पूरी घटना को दूर से देख रहा है, वह उस घटना से जुड़ा हुआ नहीं है, उसकी भावनाएं उससे नहीं जुड़ी हैं, ऐसे में उस दूसरे व्यक्ति का विश्लेषण ज्यादा तार्किक होगा, वह हमें उन छुपे हुए पहलुओं के दर्शन भी करा सकता है जो हमारी नजरों से ओझल थे। इस तरह हमारी उलझन सुलझ सकने की संभावना बढ़ जाती है। सलाह लेना अच्छी बात है, लेकिन सलाह लेते ही रहना गलत है। किसी समस्या का विश्लेषण करना बुरा नहीं है, लेकिन सिर्फ विश्लेषण ही करते जाना हमारे लिए नई उलझनें पैदा कर देगा। सलाह के मामले में एक और बात ध्यान देने योग्य है। यह आवश्यक नहीं है कि जिससे हमने सलाह ली वह हमारी स्थितियों से पूरी तरह से अवगत हो, वह हमारी काबलियत और हुनर से पूरी तरह से अवगत हो, वह हमारी मानसिकता से पूरी तरह से अवगत हो, वह हमारी विभिन्न समस्याओं से पूरी तरह से अवगत हो। ऐसे में सलाह आधी-अधूरी हो सकती है या गलत भी हो सकती है। अपने बारे में और अपनी स्थितियों के बारे में हम जितना जानते हैं, उतना कोई और कभी नहीं जान सकता। कई बार तो हमारे परिवार वाले भी हमें पूरी तरह से नहीं जान सकते। इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति की सलाह हर बार कारगर हो ही, ऐसा कदापि संभव नहीं है। समस्याओं से पार पाने के तरीके पर बात करने से पहले यह आवश्यक है कि हम यह समझें कि समस्या का हल अक्सर कैसे प्रभावी हो पाता है, कब प्रभावी होता है। संन्यास लेने से पूर्व मैं जनसंपर्क के क्षेत्र में देश के पचास शीर्ष के सलाहकारों में गिना जाता रहा हूं।
तब बड़ी-बड़ी कार्पोरेट कंपनियों के आला अधिकारियों की समस्याओं का समाधान करते हुए मैंने जो सीखा वह एक साधारण सा मंत्र है। वह मंत्र है – सामने वाले की समस्या सुनो, उस पर विचार करो और फिर सवाल पूछते चले जाओ। सवाल पूछते-पूछते ही ऐसी नौबत आ जाएगी कि खुद उस अधिकारी के दिमाग में अपनी समस्या का हल स्पष्ट हो जाएगा। हल हमने नहीं बताया, हम सवाल पूछ-पूछ कर उन्हें उस स्थिति में ले आए जहां उनकी समस्या से जुड़ी धुंध छंट गई और समस्या का हल सामने नजर आने लगा। इस प्रक्रिया के दो फायदे हैं। पहला तो यह कि समस्या का हल जब समस्याग्रस्त व्यक्ति खुद ढूंढता है तो उसे यह समझाने की आवश्यकता नहीं रह जाती कि यह हल ही सर्वाधिक उपयुक्त हल है। दूसरा यह है कि चूंकि समस्याग्रस्त व्यक्ति ने खुद अपनी समस्या का हल ढूंढा है तो वह पूरी शक्ति से उस समाधान को अपनाएगा, उसके लिए हर आवश्यक कदम उठाएगा और उस हल की सफलता के लिए जी-जान लगा देगा। संन्यास लेने के बाद, एक स्पिरिचुअल हीलर के रूप में भी अपने पास आने वाले लोगों के इलाज में मैं इस प्रक्रिया का प्रयोग अक्सर करता हूं। समस्याओं के हल में अक्सर दो चरण होते हैं, पहला, कांउंसलिंग और दूसरा इलाज। कांउंसलिंग में तो यह प्रक्रिया बहुत कारगर है ही, पर कई बार इलाज में भी इस प्रक्रिया का उपयोग लाभदायक होता है। समस्या के समाधान का यह तरीका बहुत कारगर है, इसलिए जब कभी हम जब भ्रम की स्थिति में हों, चिंतित हों, अनिर्णय की स्थिति में हों, जीवन के किसी खास मुकाम पर दोराहे पर हों और हमें समझ में न आए कि हम क्या करें, किस दिशा में जाएं, क्या निर्णय लें, तो बेहतरीन इलाज यही है कि हम खुद से सवाल करना शुरू कर दें कि समस्या आई ही क्यों, समस्या दोबारा न हो इसके लिए क्या करना आवश्यक है, अभी इस समस्या के हल के लिए क्या करना आवश्यक है, समस्या को कितने टुकड़ों में बांटा जा सकता है, किस सबसे आसान टुकड़े से समाधान की शुरुआत की जा सकती है, हमारे सिस्टम में किन कमियों के कारण समस्या आई, किसकी सलाह की उपेक्षा कर दी, कहां हमारी मेहनत में कमी रह गई, अब इस नुक्सान की भरपाई कैसे होगी, नए कदम क्या होने चाहिएं, किसकी सहायता लेना आवश्यक है, आदि-आदि।
ऐसे प्रश्न पूछते चलेंगे तो समस्या का समाधान नजर आने लगेगा। इस प्रक्रिया से अपनी समस्या का हल ढूंढने का एक अतिरिक्त लाभ यह है कि हमारी समस्या का हल भी हो गया और न तो किसी दूसरे को समस्या का पता चला, न ही हल का। इस प्रकार हमारी निजता, हमारी प्राइवेसी भी सुरक्षित रही। जब हम अपनी समस्याओं का जिक्र किसी दूसरे व्यक्ति से करते हैं तो कई बार यह भी हो जाता है कि सामने वाला व्यक्ति हमारी कमजोरी का लाभ उठा ले, या उसकी नजरों में हमारा सम्मान कम हो जाए, या हमारा कोई ऐसा राज उसे पता चल जाए जो आम हालात में हम किसी को भी न बताते। समस्या को सुलझाने का एक और तरीका यह है कि हम समस्या के बारे में सोचना बिलकुल बंद कर दें क्योंकि जब हम किसी समस्या के बारे में सोचते हैं तो कई बार सोचते ही रह जाते हैं और तरह-तरह की शंकाओं से घिर जाते हैं। अत्यधिक सोच, यानी, ओवरथिंकिंग की यह स्थिति बहुत घातक है।
सोचते ही रह जाने की इस आदत के कारण अक्सर हम अकारण चिंता में पड़ जाते हैं, अनजाने भविष्य की कल्पना से इतना डर जाते हैं कि हमें लगता है कि हम बिलकुल बेबस हैं और किसी भी हल पर पहुंच पाना संभव ही नहीं है और हमारा भविष्य अब अंधकारमय हो ही जाएगा, या हमारा कोई बड़ा नुकसान हो जाएगा। मन चिंतित हो तो हमारी सोच कुंद हो जाती है और हम सचमुच बेबस हो जाते हैं। तब एकमात्र उपाय यही है कि कुछ समय के लिए, और हो सके तो कुछ दिनों के लिए उस समस्या से अपना मन पूरी तरह से हटा लें। जब भावनाओं का उद्वेग शांत हो जाए तो उस पर फिर से विचार करें, खुद से सवाल करें, सवाल करते चलें और अंतत: हल तक पहुंच जाएं। कुछ समय के लिए समस्या से मन हटा लेने का लाभ यह भी होता है कि अक्सर कोई समाधान अचानक सूझ जाता है, कभी विचार के द्वारा, कभी किसी स्वप्न के द्वारा और कभी अचानक किसी बातचीत में। ध्यान यही रखना है कि समस्या आए तो चिंतित न हों, बस उसे टुकड़ों में बांटें और हर टुकड़े के हल का प्रयास करें। खुद से सवाल करने की प्रक्रिया को अपनाएंगे तो समस्याओं की चिंता से बचे रहेंगे।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
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