निंदिया न आए…

जब दिन में प्रकाश मिलता है तो यह घड़ी सक्रिय रहती है और मेलाटोनिन कम बनता है, रात में अंधेरा बढ़ते ही मेलाटोनिन का निर्माण शुरू होता है, जो नींद लाता है। हम ऐसा करेंगे तो जल्दी समझ पाएंगे कि रात में भी यदि हम मोबाइल की तेज रोशनी, टीवी और लैपटॉप को लगातार देखते रहें, तो मस्तिष्क को प्रकाश का भ्रम मिलता है। वह मान लेता है कि अभी दिन है और मेलाटोनिन बनना रुक जाता है। इस कारण नींद दूर भागने लगती है। रात्रि के अनुशासन पर इसीलिए जोर दिया जाता है। नींद तो एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जो हमारे सहज होने पर खुद ही आ जाती है। अनिद्रा एक समस्या नहीं, बल्कि मन की पुकार है। हम इस पुकार को सुनेंगे, अपने भीतर की धूल झाड़ेंगे, थोड़ी-सी रोशनी अंदर रहने देंगे, और जीवन में शांति के लिए थोड़ी-सी जगह बना देंगे तो नींद हमारे तकिये पर लौट आएगी…

अनिद्रा केवल नींद न आने की शारीरिक समस्या भर नहीं है, बल्कि यह मन की अशांति, अधूरी समझ, उलझे भाव, अनसुलझे डर और दबे हुए तनाव का परिणाम भी होती है। यह समझना कठिन नहीं है कि अनिद्रा का असली कारण हमारे भीतर ही कहीं बैठा होता है, बाहर नहीं। जब मन दिन भर दुनिया को संभालता-संभालता थक जाता है और हम उसे रात में भी शांत होने का अवसर नहीं देते तो स्वाभाविक है कि नींद हमें छोडऩे लगती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई बच्चा लगातार रो रहा हो और हम उसे चुप कराने के बजाय उसे और जोर से पकड़ कर हिला दें, वह और जोर से रोएगा। मन भी ऐसा ही है। अनिद्रा की जड़ हमारे भीतर पैदा हुए अति-चिंतन में छिपी होती है। यह अति-चिंतन केवल समस्याओं को बढ़ाता नहीं, बल्कि हमारे भीतर की ऊर्जा को उलझा देता है। दिन में जो भाव दबे रह जाते हैं, वे रात में सामने आकर बैठ जाते हैं। नींद के समय मन स्वाभाविक रूप से ढीला होना चाहता है, पर हम दिन भर के अधूरे पृष्ठ रात में खोलकर बैठ जाते हैं। जब मन को आराम का समय नहीं मिलता, तब शरीर भी सोने की क्षमता खोने लगता है। अनिद्रा की दूसरी बड़ी वजह है, अनुशासनहीन जीवन-शैली। हम सोने का एक समय नहीं तय करते, भोजन और काम का समय गड़बड़ा कर रखते हैं, मोबाइल को देर रात तक आंखों के सामने रखते रहते हैं, और फिर उम्मीद करते हैं कि नींद जल्दी आ जाएगी। शरीर एक अनुशासित अस्तित्व है। उसे लय चाहिए। हम लय बिगाड़ेंगे तो नींद भी साथ नहीं देगी। कई लोग कहते हैं कि ‘नींद अचानक गायब हो गई’, लेकिन सच्चाई यह है कि नींद अचानक नहीं जाती, हम धीरे-धीरे उसे दूर धकेल देते हैं।

अनिद्रा का एक बड़ा कारण मन का अकेलापन भी है। दिन भर भले ही आसपास भीड़ रहती हो, लेकिन भीतर का व्यक्ति अकेला रह जाता है। कोई अपना दर्द नहीं सुनता और न हम सचमुच किसी के दिल की सुनते हैं। रात में यह अकेलापन अपनी पूरी ताकत से उभरता है और मन को चैन नहीं लेने देता। जब मन को सहारा नहीं मिलता, तो नींद के लिए भी जगह नहीं बचती। यह समझना जरूरी है कि बिस्तर नींद के लिए है, काम के लिए नहीं। अगर हम बिस्तर पर बैठे रहकर काम करें, लैपटॉप खोलें, खाना खाएं, तो मन को लगता ही नहीं कि यह जगह सोने के लिए है। मन भ्रम में रहता है तो उसका असर नींद पर पड़ता है और हम अनिद्रा की शिकायत के शिकार हो जाते हैं। हमारे रिश्ते भी अनिद्रा का राज खोलते हैं। जिन घरों में तनाव है, अनकहे शब्द हैं, दबे हुए तर्क और टूटे संवाद हैं, वहां रात सबसे पहले अपना असर दिखाती है। रात में दो ही चीजें सच होती हैं, हमारा मन और हमारी सच्चाई। इसलिए दिन में जितना संभव हो रिश्तों में बोलने लायक बात बोल दें, मन में कचरा जमा न होने दें। मन साफ रहेगा तो रात साफ होगी। अब समाधान की ओर चलते हैं। सबसे पहले अपने मन से मित्रता करनी होगी। मन रात में शांत तभी होगा जब हम दिन में उसे समझेंगे। दिन भर मन को दबाने की जगह थोड़ा-सा समय उसे समझने, उसे सुनने और उसकी थकान दूर करने में लगाएं। हर दिन 15-20 मिनट आंखें बंद कर शांत बैठें। यह कोई ध्यान की तकनीक नहीं, बस मन को सांस लेने का अवसर है। जब मन को यह मौका मिलेगा, वह रात में ज्यादा सहजता से विश्राम में जाएगा। दूसरा महत्वपूर्ण समाधान है, रात्रि-अनुशासन। सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल, टीवी, समाचार और किसी भी उत्तेजक सामग्री से दूरी रखें। यह दूरी मन को बताती है कि अब रात विश्राम का समय है। यह समय छोटा है लेकिन मन पर इसका असर बहुत गहरा है। इस एक घंटे में हल्की सैर, धीमी सांसें, धीमी रोशनी, हल्की आवाज और मन को शांत करने वाली गतिविधियां रखें। हम अपने वातावरण को शांत करेंगे तो मन आसानी से शांत होने लगेगा। शरीर की थकान भी नींद का हिस्सा है। दिन में यदि हम शरीर को चलाते नहीं, पसीना नहीं बहाते, तो शरीर रात में विश्राम की मांग ही नहीं करता।

हर दिन 25-30 मिनट की तेज चाल, हल्का व्यायाम या कोई भी शारीरिक गतिविधि नींद के लिए बहुत जरूरी है। शरीर जितना थकता है, उतना ही मन हल्का होता है। कई लोग सोते समय सोचते रहते हैं कि ‘आज नींद आएगी या नहीं?’, ‘कल सुबह कैसे उठूंगा’, ‘अगर फिर न सो पाया तो?’, इन डर के कारण नींद दूर चली जाती है। नींद को लक्ष्य नहीं बनाना है। अनिद्रा केवल सोने में कठिनाई का नाम नहीं है, यह एक ऐसी वैज्ञानिक स्थिति है जिसमें मस्तिष्क अपनी स्वाभाविक शांत अवस्था में प्रवेश नहीं कर पाता। विज्ञान मानता है कि नींद हमारे शरीर का दैनिक पुनस्र्थापन तंत्र है, एक ऐसा समय, जब मस्तिष्क अपनी अनावश्यक स्मृतियों को साफ करता है, न्यूरॉन्स की ऊर्जा का संतुलन बनाता है, और शरीर के हार्मोनल सिस्टम को रीसेट करता है। हम ऐसा करेंगे तो समझ पाएंगे कि नींद की कमी मतलब रीसेट बटन का काम न करना है। जब रीसेट नहीं होगा, तो अगले दिन मन बेचैन, शरीर थका हुआ और भाव अस्थिर होंगे। विज्ञान यह भी बताता है कि नींद एक सर्केडियन रिद्म पर आधारित है, यानी हमारी जैविक घड़ी। यह घड़ी मस्तिष्क के सुप्राकायजमैटिक न्यूक्लियस द्वारा संचालित होती है।

जब दिन में प्रकाश मिलता है तो यह घड़ी सक्रिय रहती है और मेलाटोनिन कम बनता है, रात में अंधेरा बढ़ते ही मेलाटोनिन का निर्माण शुरू होता है, जो नींद लाता है। हम ऐसा करेंगे तो जल्दी समझ पाएंगे कि रात में भी यदि हम मोबाइल की तेज रोशनी, टीवी और लैपटॉप को लगातार देखते रहें, तो मस्तिष्क को प्रकाश का भ्रम मिलता है। वह मान लेता है कि अभी दिन है और मेलाटोनिन बनना रुक जाता है। इस कारण नींद दूर भागने लगती है। रात्रि के अनुशासन पर इसीलिए जोर दिया जाता है। नींद तो एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जो हमारे सहज होने पर खुद ही आ जाती है। अनिद्रा एक समस्या नहीं, बल्कि मन की पुकार है। हम इस पुकार को सुनेंगे, अपने भीतर की धूल झाड़ेंगे, थोड़ी-सी रोशनी अंदर रहने देंगे, और जीवन में शांति के लिए थोड़ी-सी जगह बना देंगे तो नींद हमारे तकिये पर लौट आएगी। नींद कभी जाती नहीं है, हम उससे दूर चले जाते हैं। लौटना हमेशा हमारे हाथ में है। यह समझना बहुत जरूरी है कि अनिद्रा कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक संकेत है। यह संकेत बताता है कि हमारी गति, हमारी सोच, हमारा जीवन चक्र और हमारे भाव, कहीं न कहीं असंतुलित हो गए हैं। जब हम इन संकेतों को सुनेंगे, बदलाव शुरू करेंगे, धीरे-धीरे मन अपनी लय वापस पा लेगा। नींद फिर से आने लगेगी।

स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

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