मैंने सोचा…

पूछने से निर्णय सही होते हैं। पूछने से हम दूसरों की पीड़ा को भी समझ पाते हैं और अपनी सीमाओं को भी। जीवन का सरल नियम यह है कि सोचने से नहीं, पूछने से संबंध बनते हैं। यह संसार संबंधों पर आधारित है। संबंधों की जड़ प्रेम है और प्रेम की जड़ संवाद है। संवाद का पहला कदम पूछना है। जो पूछता है, वह जोड़ता है। जो सोचता है, वह या तो तोड़ देता है, या उस स्थिति में पहुंच जाता है। ‘मैंने सोचा’ का तरीका जीवन का सबसे बड़ा पत्थर है जो रिश्तों, अवसरों, समझ और प्रेम के प्रवाह को रोक देता है। ‘मैंने पूछा’ का तरीका जीवन की एक बड़ी कुंजी है जो हर बंद दरवाजा खोल देती है। पूछना और समर्पण दुनियादारी का ही नहीं बल्कि आध्यात्मिकता का भी सबसे सरल सूत्र है। सहज संन्यास के हम अनुयायियों को तो सिखाया ही जाता है कि आध्यात्मिकता में यही सत्य लागू होता है। जब साधक सोच लेता है कि उसने सब जान लिया है, वही क्षण उसके पतन की शुरुआत है…

अकसर जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जब हम पूरे मन से, पूरी नीयत से, किसी के लिए कुछ कर डालते हैं। मन में एक मिठास होती है। हम सोचते हैं कि इससे सामने वाला कितना खुश होगा, कितना धन्य हो जाएगा, कितना लाभ होगा, पर जैसे ही हम अपना किया हुआ सामने रखते हैं, दूसरे के चेहरे पर जो भाव आता है, वह हमें भीतर तक हिला देता है। चेहरा कहता है कि तुमने मुझसे पूछा क्यों नहीं, और हमारे भीतर से एक धीमी-सी आवाज उठती है कि मैंने सोचा था कि…। मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम ही है, सोच लेना। अपनी ही धारणाओं को सत्य मान लेना। अपने मन की गूंज को ही असलियत समझ लेना। यह मन की धारणाओं का अदृश्य बोझ है जिसे हम अकारण ढोते रहते हैं और बाद में पछताते हैं। सोचना आसान है, पूछना कठिन है। सोचना बिना मेहनत का काम है। पूछना विनम्रता मांगता है। सोचना अहंकार को पोषित करता है। पूछना अहंकार को पिघला देता है। सोचना एक तरफा है, जैसे एक ही दिशा में बहती नदी। पूछना दो धाराओं को मिलने देता है, जैसे संगम। हम किसी के लिए कुछ करने से पहले पूछते नहीं, क्योंकि भीतर कहीं गहरी जगह पर कभी कोई डर होता है कि पहले बता दिया तो काम हो ही नहीं पाएगा, या हम ‘सरप्राइज’ देना चाहते हैं, या इसमें एक अहंकार छुपा है, ‘मुझे पता है…मैं समझता हूं…मैं जानता हूं…!’ ऐसे में कारण चाहे जो भी रहा हो, हमारा किया हुआ काम, जो शुभ नीयत से शुरू हुआ था, पर वह अक्सर दुख का कारण बन जाता है। पूछने में हमें कठिनाई क्यों होती है? क्योंकि पूछना हमें भीतर से अनावृत्त कर देता है।

कभी वह हमारी अज्ञानता दिखा देता है और कभी बेबसी। पूछते ही स्वीकार करना पड़ता है कि मुझे पता नहीं, और व्यवस्था यही है कि मनुष्य अपनी अज्ञानता छुपाकर ही मजबूत दिखना चाहता है, जबकि असलियत यह है कि जो अपनी अज्ञानता को स्वीकार करता है, वही असली ज्ञानी बनता है, जो स्वीकार नहीं करता, उसकी धारणाएं जीवन भर उसे भरमाती रहती हैं। अपनी धारणाओं के पीछे का मनोविज्ञान ऐसा है कि हम जो करते हैं, उसका आधार अक्सर हमारी अपनी जरूरतें, हमारी अपनी इच्छाएं होती हैं। हम सोचते हैं कि सामने वाला भी उसी मिट्टी का बना है। हम सोचते हैं उसे वही अच्छा लगेगा, जो मुझे अच्छा लगता है। हम सोचते हैं कि हमारी खुशी ही उसकी खुशी है। यही भ्रम जीवन के अधिकतर रिश्तों में उलझनें पैदा करता है। अक्सर माता-पिता अपने बच्चों को वही रास्ता दिखाना चाहते हैं जिसे उन्होंने सही मान लिया है। पति, पत्नी के लिए वही निर्णय ले लेता है जो उसके हिसाब से फायदेमंद है। दोस्त की जगह दूसरा दोस्ता फैसला कर देता है कि यह तेरे लिए बेहतर है, और जब दूसरा असहज होता है, दुखी होता है, तो हम हक्का-बक्का खड़े रह जाते हैं। तब हमारे मन में एक ही वाक्य गूंजता रहता है कि मैंने तो सोचा था…! सोचना और सत्य असल में दो अलग ध्रुव हैं, दो अलग दुनियाएं हैं। जिसे हम सोच लेते हैं, वह अक्सर वास्तविकता से बहुत दूर होता है। एक धारणा बनाते समय हम सामने वाले का मन, उसकी परिस्थितियों, उसकी जरूरतों, उसकी पीड़ा को नहीं देखते। हम अपनी कल्पना के आधार पर एक ‘सच’ बना लेते हैं और उसी के मुताबिक काम कर बैठते हैं। उसके बाद जो होता है, वह दुखद होते हुए भी बहुत सामान्य है क्योंकि इससे समझ का द्वार बंद हो जाता है, और भ्रम का बवंडर शुरू हो जाता है। सत्य कभी भी सोचने से नहीं मिलता। सत्य हमेशा जानने से मिलता है, और जानना पूछे बिना संभव नहीं।

मन का अनुमान अंधेरे में तीर चलाना है, पूछना दीपक जलाना है। जीवन में अनुमान सबसे बड़े अंधकार हैं। कई रिश्ते टूटते ही इसलिए हैं कि दोनों ने सोचा और किसी ने पूछा नहीं। कई अवसर हाथ से निकल जाते हैं क्योंकि हमने मान लिया कि यह अवसर हमारे लिए नहीं है। कई बार मन अपनी घबराहट को सच मान लेता है और हिम्मत करने का मौका छूट जाता है। कई बार हम सिर्फ इसलिए दुख में जीते रहते हैं क्योंकि हम मान लेते हैं कि सामने वाला हमें समझ नहीं सकता जबकि हमने आज तक पूछा ही नहीं। जीवन की सबसे बड़ी उलझनें अनुमान के कारण पैदा होती हैं। अनुमान में न सत्य है, न स्पष्टता, न प्रेम। अनुमान केवल भ्रम है, और भ्रम का फल हमेशा दुख होता है। पूछना तो प्रेम का शुद्धतम रूप है। जब हम किसी से पूछते हैं कि तुम्हें क्या चाहिए, तुम्हारी जरूरत क्या है, तुम क्या चाहते हो जो मैं करूं, तो उस क्षण हमारे भीतर से अहंकार हट जाता है, और उस क्षण सामने वाले को यह संदेश मिलता है कि वह हमारे लिए महत्वपूर्ण है, उसकी इच्छा हमारे लिए मूल्यवान है। पूछना मतलब, रिश्ते को आदर देना। पूछना मतलब सामने वाले के मन में प्रवेश की अनुमति लेना। पूछना मतलब प्रेम को उसकी सही दिशा देना। जब हम पूछ लेते हैं, तो जीवन सहज हो जाता है। पूछने से दो बातें होती हैं। पहली तो यह कि हमारा भ्रम टूटता है और स्पष्टता जन्म लेती है। दूसरी यह कि सामने वाले को अहसास होता है कि हम इस रिश्ते को महत्वपूर्ण मानते हैं। जिस जीवन में स्पष्टता है वहां न गलतफहमियां होती हैं, न निराशा, न अनावश्यक दुख। पूछने से रिश्तों में मधुरता आती है। पूछने से मन हल्का होता है।

पूछने से निर्णय सही होते हैं। पूछने से हम दूसरों की पीड़ा को भी समझ पाते हैं और अपनी सीमाओं को भी। जीवन का सरल नियम यह है कि सोचने से नहीं, पूछने से संबंध बनते हैं। यह संसार संबंधों पर आधारित है। संबंधों की जड़ प्रेम है और प्रेम की जड़ संवाद है। संवाद का पहला कदम पूछना है। जो पूछता है, वह जोड़ता है। जो सोचता है, वह या तो तोड़ देता है, या उस स्थिति में पहुंच जाता है। ‘मैंने सोचा’ का तरीका जीवन का सबसे बड़ा पत्थर है जो रिश्तों, अवसरों, समझ और प्रेम के प्रवाह को रोक देता है। ‘मैंने पूछा’ का तरीका जीवन की एक बड़ी कुंजी है जो हर बंद दरवाजा खोल देती है। पूछना और समर्पण दुनियादारी का ही नहीं बल्कि आध्यात्मिकता का भी सबसे सरल सूत्र है। सहज संन्यास के हम अनुयायियों को तो सिखाया ही जाता है कि आध्यात्मिकता में यही सत्य लागू होता है। जब साधक सोच लेता है कि उसने सब जान लिया है, वही क्षण उसके पतन की शुरुआत है, और जब साधक विनम्र होकर पूछता है कि मुझे मार्ग दिखाइए, यही क्षण उसके आगे बढऩे का आरंभ बन जाता है। सत्य का द्वार केवल विनम्र मन के लिए खुलता है। अहंकारी मन सोचता है। विनम्र मन पूछता है, और पूछने वाले के जीवन में सत्य उतर आता है।

स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

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