मन की थकान का असली कारण

मन थकता है ओवरथिंकिंग से, दूसरों की अपेक्षाओं का बोझ उठाने से, अपनी भावनाओं को दबाने से, अतीत ढोने से, भविष्य की चिंता में उलझने से, नकली मुस्कानों और नकली रिश्तों से, खुद के विरुद्ध जाकर जीने से। मन की थकान का असली कारण यह है कि हम मन का खयाल नहीं रखते। मन सोचने के लिए है, ढोने के लिए नहीं। मन की थकान मिटाने का एक ही रास्ता है, और वह है, मन से दोस्ती। मन कोई दुश्मन नहीं है। मन कोई पापी, कोई गलत, कोई बाधा नहीं है। मन थकता है क्योंकि उसे लंबी यात्रा अकेले करनी पड़ रही है, हम साथ नहीं दे रहे। मन की थकान तब मिटती है जब हम अपने मन को जगह देते हैं। थोड़ी खामोशी, थोड़ी स्वीकृति, थोड़ी सच्चाई, थोड़ी ईमानदारी और थोड़ी प्रेम की गर्माहट, बस इतना ही चाहिए मन को। जब मन को आराम मिलता है, वह फिर से ताजा हो जाता है। मन की थकान का मूल कारण असल में स्वयं से दूर होना है और इस थकान का इलाज भी स्वयं के करीब आना है…

जीवन में हम सभी थकते हैं, कभी शरीर थकता है, कभी भावनाएं, कभी मन। लेकिन जिस थकान को हम सबसे कम समझते हैं, वह मन की थकान है। शरीर की थकान तो थोड़ी नींद से मिट जाती है, पर मन की थकान, वह रात भर करवटें बदलती रहती है। साधारण मनुष्य इस थकान को अक्सर ‘तनाव’, ‘मूड ऑफ’ ‘उबाऊपन’ ‘किसी से बात करने का मन न होना’ जैसे नाम दे देता है, पर असल में यह मन का भारीपन है, मन का बोझ है, मन की थकावट है। मन की थकान का असली कारण क्या है, इसे समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि मन थक कैसे जाता है। आज हम नए साल में प्रवेश कर रहे हैं। नया साल हमारे लिए शुभ हो, बेहतर हो, यही हमारा लक्ष्य है। हमारी भूल यह है कि हम अक्सर समझ ही नहीं पाते कि मन थकता नहीं, थकाया जाता है। हमारा अज्ञान, हमारी गलतियां और हमारी लापरवाही इसका कारण बनते हैं। मन मूल रूप से थकने वाली वस्तु नहीं है। मन तो ऊर्जा से भरा हुआ, चंचल, प्रवाही और सदैव सक्रिय रहने के लिए बना है। उसकी प्रकृति गति है, स्थिरता नहीं। यह चिडिय़ा की तरह है, आसमान मिलता रहे तो उड़ता ही रहेगा। लेकिन जब हम उस चिडिय़ा को छोटी सोच के पिंजरे में बंद कर देते हैं, तो वह थक जाता है।

मन की थकान तब पैदा होती है जब प्राकृतिक प्रवाह रोक दिया जाता है। जब हम मन को वह सोचने पर मजबूर करते हैं, जिसे वह नहीं सोचना चाहता, या जिससे उसका कोई संबंध नहीं। मन की थकान का सबसे बड़ा कारण है अनावश्यक बोझ। जब हम खुद के बजाय दूसरों के बारे में ज्यादा सोचते हैं, खुद का ध्यान रखे बिना दूसरों को खुश करने की कोशिश करते हैं तो हम जाने-अनजाने अपने ही मन को थकाने की राह पर चल पड़ते हैं। हम अपने काम से ज्यादा दूसरों के काम में लगे रहते हैं। कौन क्या कह रहा है? वह मुझे कैसे देखता है? क्यों बात नहीं की? क्यों नाराज है? क्यों खुश है? क्यों आगे बढ़ गया? दूसरों के बारे में इतना सोचना कि अपने भीतर की शांति गायब हो जाए तो मन थक जाता है। हम लगभग 50 फीसदी मानसिक ऊर्जा सिर्फ दूसरों के बारे में सोचने में ही खर्च कर देते हैं और हमें इसका पता भी नहीं चलता। मन इससे ऊब जाता है। मन कहता है, ‘मालिक! थोड़ा अपने ऊपर भी ध्यान दे ले’, लेकिन हम सुनते नहीं, और जब मन की आवाज नहीं सुनी जाती, वह थकने लगता है। मन को हमने रेस के घोड़े की तरह बना रखा है। ‘अब यह करना है’, ‘फिर वह करना है’, ‘उसके बाद यह प्लान’, ‘उसके आगे यह टारगेट’, हम हमेशा आगे भाग रहे हैं, भविष्य के पीछे दौड़ रहे हैं। यही बेचैनी की जड़ है। मन को आराम चाहिए, पर हम उसे आराम नहीं देते। मन बोलना चाहता है, हम उसे चुप करा देते हैं। आराम से महरूम मन टूटता नहीं, पर थक जरूर जाता है। यही नहीं, उस रिश्ते में जो कहना था, नहीं कहा। उस गलतफहमी को साफ करना था, नहीं किया। जो दुख अंदर था, उसे बाहर नहीं आने दिया। जो आंसू बहने चाहिए थे, उन्हें रोक लिया। ये सब ‘भावनाओं का ट्रैफिक जाम’ बन जाते हैं। अभिव्यक्ति न होना मन की थकान का बड़ा कारण है। मन ऊर्जा से नहीं, भावनाओं के प्रवाह से ताजा रहता है। भावनाएं अटक जाएं तो मन थक जाता है।

वो भावनाएं जो प्रकट नहीं की गईं, जो शिकायत बता कर खत्म कर देनी चाहिए थी, उसे मन में दबा लिया, वो मन को थकाने का कारण बन जाती है। कई बार दिल कुछ और कहता है, और दिमाग कुछ और। इससे मन में संघर्ष पैदा होता है। कभी हम कुछ और करना चाहते हैं, पर अपनी झूठी इमेज बनाए रखने के लिए करते कुछ और हैं। ऐसे में हम खुद से ही मुंह चुराते हैं और परेशान रहते हैं। हम दो हिस्सों में बंटे हुए हैं। एक जो सच में हैं, एक जो दुनिया को दिखाना चाहते हैं। जो हम भीतर हैं और जो हम बाहर दिखते हैं, दोनों के बीच जितना अधिक फासला होगा, मन उतना अधिक थकेगा। ‘मैं जैसा हूं वैसा नहीं दिख सकता, और जैसा दिख रहा हूं वैसा हूं नहीं।’ यह आंतरिक संघर्ष बहुत भारी पड़ता है। मन दो नावों में सवार होने के कारण थक जाता है। इसके अलावा खुद को लगातार जज करते रहना, अपनी आलोचना करते रहना, खुद को दूसरों से कमतर मानना ऐसे कारण हैं जो हमारी चिंता बढ़ा देते हैं। सबसे बड़ा बोझ वह नहीं है जो दुनिया देती है। सबसे बड़ा बोझ वह है जो हम खुद को देते हैं। ‘मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था’, ‘मैं अच्छा इनसान नहीं हूं’, ‘मेरी गलती है’, ‘लोग क्या सोचेंगे’, ‘मैं दूसरों जितना अच्छा नहीं’, यह अंदर का न्यायाधीश, यह ‘जज साहब’ मन को दिन-रात कटघरे में खड़ा रखता है। घंटों की इस पूछताछ में मन पूरी तरह थक जाता है। मन को ईमानदारी चाहिए, न कि आत्म-उत्पीडऩ। मन की थकान किसी एक वजह से नहीं होती।

मन थकता है ओवरथिंकिंग से, दूसरों की अपेक्षाओं का बोझ उठाने से, अपनी भावनाओं को दबाने से, अतीत ढोने से, भविष्य की चिंता में उलझने से, नकली मुस्कानों और नकली रिश्तों से, खुद के विरुद्ध जाकर जीने से। मन की थकान का असली कारण यह है कि हम मन का खयाल नहीं रखते। मन सोचने के लिए है, ढोने के लिए नहीं। मन की थकान मिटाने का एक ही रास्ता है, और वह है, मन से दोस्ती। मन कोई दुश्मन नहीं है। मन कोई पापी, कोई गलत, कोई बाधा नहीं है। मन थकता है क्योंकि उसे लंबी यात्रा अकेले करनी पड़ रही है, हम साथ नहीं दे रहे। मन की थकान तब मिटती है जब हम अपने मन को जगह देते हैं। थोड़ी खामोशी, थोड़ी स्वीकृति, थोड़ी सच्चाई, थोड़ी ईमानदारी और थोड़ी प्रेम की गर्माहट, बस इतना ही चाहिए मन को। जब मन को आराम मिलता है, वह फिर से ताजा हो जाता है। मन की थकान का मूल कारण असल में स्वयं से दूर होना है और इस थकान का इलाज भी स्वयं के करीब आना है। जब खुद से प्रेम करते हैं, अपने मन को स्वीकार करते हैं, अपने भीतर के संघर्षों को समझते हैं, तो थकान खुद गायब हो जाती है। मन रूह का आईना है, धूल साफ हो जाए तो फिर साफ-साफ दिखने लगता है। मन की थकान जीवन का संकट नहीं है, यह संकेत है, एक दर्पण है, एक संदेश है। मन थककर यही कहना चाहता है, ‘मालिक, थोड़ा रुक जा। थोड़ा अपने भीतर भी उतर जा। मैं बहुत कुछ कहना चाहता हूं।’ जब हम मन की आवाज सुनते हैं, जीवन भी हल्का हो जाता है और हम भी।

स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

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