मन की गति कछु और है…

बाहरी संसार चाहे जैसा हो, पर भीतर की व्यवस्था मजबूत हो जाए तो मन की दशा भी संतुलित रहती है और दिशा भी स्पष्ट रहती है। जीवन में संतुलन आवश्यक है। न तो अत्यधिक आसक्ति से खुशी मिलती है, न अत्यधिक त्याग से। संतुलन का मार्ग ही वह जगह है जहां मन शांत रहता है, कार्य सहज होते हैं और संबंध सहजता से बहते हैं। जब हम संतुलन में होते हैं तो रिश्तों में भी स्पष्टता आती है, हम कम अपेक्षा करते हैं, ज्यादा समझते हैं और कम आहत होते हैं। जो बदल रहा है उसे पकडऩे की कोशिश नहीं करनी चाहिए। परिस्थितियां, लोग, स्थितियां, सब अपने समय के अनुसार बदलते हैं। हम जब परिवर्तन को स्वीकार करते हैं, तब मन में संघर्ष कम होता है…

संसार शोर से भरा है। बाहर का शोर, भीतर का शोर, विचारों का शोर, अपेक्षाओं का शोर, चारों तरफ आवाजें ही आवाजें। हम समझते हैं कि जीवन कठिन इसलिए है क्योंकि दुनिया बहुत उलझी हुई है, पर असल में कठिनाई दुनिया की नहीं, हमारे मन की दशा की है। जब मन थक जाता है, असमंजस में होता है, डरा हुआ होता है या बोझ से दबा होता है, तो दुनिया का शोर और भी तेज लगने लगता है। संसार वही रहता है, बदलता मन है। मन की अवस्था ही हमारी दिशा तय करती है। संसार हमेशा अलग-अलग दिशाओं में खींचता है। कभी प्रतिस्पर्धा की तरफ, कभी तुलना की ओर, कभी रंजिश की तरफ, कभी लालसा की ओर। बाहर की दुनिया हमें हर समय बताती रहती है कि हमें कैसा दिखना है, क्या बनना है, और किस गति से आगे बढऩा है। लेकिन मन की अपनी लय होती है और जब हम इस लय से हट जाते हैं, तब भीतर से बेचैनी शुरू होती है। बेचैनी इसी का नाम है कि दिशा संसार तय कर रहा है और दशा हमारा मन ढो रहा है। हम रोज किसी न किसी द्वंद्व में जीते हैं। कभी सही-गलत की उलझन, कभी रिश्तों की जटिलता, कभी अपने ही विचारों का भारीपन। जागरूकता इन उलझनों के बीच एक ऐसा दीपक है जो बाहर की दुनिया नहीं, भीतर का रास्ता दिखाता है। जीवन का युद्ध बाहर कम और भीतर अधिक होता है। यह युद्ध हमारे डर, भ्रम, क्रोध, अपेक्षाओं और मोह के साथ चलता रहता है, और जब हम इस युद्ध को पहचान लेते हैं, तब समझ आने लगता है कि जीत भीतर से शुरू होती है। जीवन की परिस्थितियां जैसे हैं, वैसी ही रहेंगी, पर चेतना हमें यह सामथ्र्य देती है कि हम परिस्थितियों के शिकार न बनें। हम मन को डर से नहीं, समझ से चलाना सीखें।

मानव मस्तिष्क लगातार आने वाली सूचनाओं से घिरा है, आवाजें, दृश्य, संदेश, भावनाएं, अपेक्षाएं और निर्णय। यह सब मिलकर एक मानसिक शोर पैदा करते हैं जिसे न्यूरोसाइंस में कॉग्निटिव नॉइज कहा जाता है। जब यह शोर बढ़ जाता है, तो हमारी मानसिक ऊर्जा तेजी से खर्च होने लगती है और मन की दिशा अस्थिर हो जाती है। मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, जो स्पष्टता, निर्णय और विवेक का केंद्र है, अत्यधिक उत्तेजनाओं के कारण थक सकता है। इस समय हम वही अनुभव करते हैं जिसे हम साधारण भाषा में ‘मन का भारी होना’ या ‘मन का उलझना’ कहते हैं। हमारा मस्तिष्क बाहरी संसार के शोर से बचने के लिए नहीं बना है। आज हम हर सेकंड जितनी जानकारी लेते हैं, वह हमारे मस्तिष्क के प्राकृतिक डिजाइन से कई गुना अधिक है। परिणामस्वरूप, हमारा ध्यान बिखरने लगता है, मध्यम स्तर का तनाव बना रहता है, और भावनाएं जल्दी उत्तेजित होती हैं। जब बाहरी शोर बहुत होता है, तो मस्तिष्क लगातार सक्रिय रहता है, इससे डर और बेचैनी बढ़ जाते हैं जिससे मन की दशा अस्थिर हो जाती है और दिशा स्पष्ट नहीं रह पाती। बाहरी कोलाहल का असर मन पर तभी अधिक पड़ता है जब भीतर की प्रसंस्करण प्रणाली थकने लगती है। लगातार नोटिफिकेशन, तुलना, सामाजिक अपेक्षाएं, काम का दबाव और रिश्तों की जटिलताएं, ये सब मिलकर मस्तिष्क को ‘हाइपर-विजिलेंस’ की स्थिति में ले जाते हैं जहां वह हमेशा सतर्क, हमेशा चिंतित रहता है। परिणामस्वरूप नींद गहरी नहीं आती, मन जल्दी उत्तेजित होता है, और छोटी-छोटी चीजों में भी परेशानी महसूस होती है। यह केवल भावनात्मक अनुभव नहीं, यह एक न्यूरोलॉजिकल प्रक्रिया है। मन की दिशा का वैज्ञानिक आधार है नियंत्रण प्रणाली का मजबूत होना। जब हम ध्यान, धीमी सांसों या आत्म-जागरूकता जैसी गतिविधियों में समय देते हैं, तो मस्तिष्क सक्रिय और मजबूत होता है।

शोध बताते हैं कि नियमित माइंडफुलनेस अभ्यास से हम परिस्थितियों पर तुरंत प्रतिक्रिया देना बंद कर देते हैं और चीजों को संतुलन से देखने लगते हैं। बाहरी शोर वही रहता है, पर उसका प्रभाव कम हो जाता है। संसार का शोर अक्सर भावनाओं में अवरोध पैदा करता है। जब भावनाएं व्यक्त नहीं होतीं या स्पष्ट नहीं होतीं, तो मस्तिष्क में ‘इमोशनल क्लटर’ जमा होने लगता है। भावनाओं के जमे हुए तनाव से मन जल्दी थकने लगता है। मन की दिशा का स्पष्ट होना तभी संभव है जब भावनात्मक ऊर्जा को प्रवाहित होने दिया जाए। भावनाओं को दबाने से मस्तिष्क को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है और इससे मन में भारीपन आता है। हमारे मस्तिष्क का एक महत्वपूर्ण तत्व है, डिफॉल्ट मोड नेटवर्क। यह वह नेटवर्क है जो तब सक्रिय होता है जब हम कुछ नहीं कर रहे होते, या अपने बारे में सोच रहे होते हैं। अत्यधिक शोर और व्यस्तता इसे अत्यधिक सक्रिय कर देती है, जिससे ओवरथिंकिंग, चिंता और आत्म-आलोचना बढ़ती है। हमारा संतुलन तभी सुधरता है जब हम खुद को विराम देते हैं, थोड़ा मौन, थोड़ी प्रकृति, थोड़ी धीमी गति। इस विराम से मस्तिष्क रीसेट होता है और मन की दिशा फिर से साफ होने लगती है। हम शोर को पूरी तरह रोक नहीं सकते, लेकिन हम अपने मस्तिष्क को इस प्रकार प्रशिक्षित कर सकते हैं कि शोर का प्रभाव कम हो जाए।

इससे बेचैनी घटती है और विचारों की स्पष्टता बढ़ती है। बाहरी संसार चाहे जैसा हो, पर भीतर की व्यवस्था मजबूत हो जाए तो मन की दशा भी संतुलित रहती है और दिशा भी स्पष्ट रहती है। जीवन में संतुलन आवश्यक है। न तो अत्यधिक आसक्ति से खुशी मिलती है, न अत्यधिक त्याग से। संतुलन का मार्ग ही वह जगह है जहां मन शांत रहता है, कार्य सहज होते हैं और संबंध सहजता से बहते हैं। जब हम संतुलन में होते हैं तो रिश्तों में भी स्पष्टता आती है, हम कम अपेक्षा करते हैं, ज्यादा समझते हैं और कम आहत होते हैं। जो बदल रहा है उसे पकडऩे की कोशिश नहीं करनी चाहिए। परिस्थितियां, लोग, स्थितियां, सब अपने समय के अनुसार बदलते हैं। हम जब परिवर्तन को स्वीकार करते हैं, तब मन में संघर्ष कम होता है। स्वीकार करना हार नहीं, यह जीवन के प्रवाह को पहचानना है। स्वीकार से मन शांत होता है, और शांत मन ही बुद्धि का घर है। बात विज्ञान की हो या अध्यात्म की, मन के बेकाबू होने का कारण एक ही है, सोचना और सोचते ही रहना, यानी, ओवरथिंकिंग, और मन को काबू में रखने का तरीका यह है कि जब दिमाग में कोई विचार लगातार चलने लगे तो कोशिश करके उस विचार से ध्यान हटाकर किसी काम में व्यस्त हो जाएं। मन की गति ऐसी ही है, यह कुछ और ही है, इसीलिए कहा गया है कि ‘मन की गति कछु और है’, और इस गति को, इस विचलन को काबू में रखने का तरीका है, खुद का ज्ञान और जागरूकता। जागरूकता ही हमें विचारों की उलझन से बचाती है, और यही हमारा लक्ष्य भी है।

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण

गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक, स्पिरिचुअल हीलर

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