गीता यह भी सिखाती है कि अहम सबसे बड़ा अवरोध है। जो व्यक्ति हर समय बोलना चाहता है, वह खुद को सबसे बड़ा ज्ञानी मानता है, वह चाहता है कि लोग उसकी बातें सुनें, उसके ज्ञान का आदर करें, वह सुन नहीं सकता, वह किसी का दुख भी सुन नहीं सकता। आयोन भी बोलना चाह रहा है, पर वह ज्ञान नहीं बांट रहा। आयोन अहंकार में नहीं है, दुख में है। आयोन के ग्राहक बोलते हैं, इसलिए वे सुन नहीं पाते। घोड़ा नहीं बोलता, इसलिए वह सुन लेता है। यह प्रतीक अत्यंत गहरा है। यह बताता है कि करुणा बुद्धि की नहीं, भावना की उपज है। आयोन जब अपने घोड़े को अपना दुख बताता है तो इस दृश्य में एक बूढ़ा व्यक्ति है और उसका घोड़ा, और बीच में बहता हुआ मौन। यही मौन गीता का भी मूल स्वर है। आयोन पोटापोव हर उस मनुष्य का प्रतीक है जिसने पाया है कि दुनिया उसके शोक के लिए रुकी नहीं है। भारतीय जीवन-दर्शन हमें सिखाता है कि यदि हम किसी के दुख के साथ बैठ सकें तो शायद हम उसके जीवन का सबसे बड़ा सहारा बन सकते हैं…
रूसी लेखक एंटोन चेखव की कहानी ‘मि•ारी’, यानी, कष्ट को विश्व प्रसिद्ध कहानियों में गिना जाता है। इस कहानी का मुख्य पात्र आयोन पोटापोव नामक एक बूढ़ा तांगे वाला है, जो अपने बेटे की मौत के दुख से टूट चुका है। वह बर्फीली रात में ग्राहकों को ले जाता है और उन्हें अपने बेटे की मृत्यु के बारे में बताने की कोशिश करता है क्योंकि वह किसी से अपना दर्द साझा करना चाहता है, लेकिन कोई भी उसकी बात नहीं सुनता और उल्टे अपने दुखों की चर्चा करने लगता है। लोगों के इस रुख से वह इतना परेशान हो जाता है कि अंत में वह अपने घोड़े के पास जाता है, उसे अपना दुख सुनाता है, और उसके साथ लिपट कर अपना मन हल्का करता है। यह सिर्फ एक कहानी नहीं है, यह एक स्थिति है जिसे हम सभी कभी न कभी भुगतते ही हैं। कभी-कभी मनुष्य के जीवन में दुख इतना गहरा उतर जाता है कि वह किसी का सहारा खोजता है, वह बस इतना ही चाहता है कि कोई उसकी बात सुन ले। आयोन पोटापोव उसी अवस्था का प्रतीक है। उसका दुख कोई दर्शन नहीं मांगता, कोई समाधान नहीं चाहता, वह केवल साझेदारी चाहता है। पर संसार समाधान सुनने का आदी है, दुख सुनने का नहीं।
आज का समाज अपने दुखों में, अपने स्वार्थों में, अपने छोटे-छोटे अहंकारों में व्यस्त है। वहां किसी दूसरे के शोक के लिए स्थान नहीं है। आयोन जब अपने बेटे की मृत्यु का उल्लेख करता है, तो सामने वाला उसे अपने जीवन की समस्या सुनाने लगता है। यह केवल कहानी नहीं है, यह मानव-स्वभाव का आईना है। आयोन का दुख इसलिए असह्य नहीं है कि उसका बेटा मर गया, बल्कि इसलिए है कि वह उसे किसी से बांट नहीं पा रहा। दुख बांटने से हल्का होता है, पर जब बांटने का पात्र न मिले, तो दुख बोझ बन जाता है। हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि मनुष्य को यहां सबसे पहले समाधान नहीं, सहानुभूति चाहिए होती है। घोड़ा उत्तर नहीं देता, सलाह नहीं देता, बस उपस्थित रहता है। यही उपस्थिति आयोन को राहत देती है। यहां कोई ज्ञान नहीं, कोई उपदेश नहीं, केवल मौन है और वही मौन औषधि बन जाता है। यह कहानी दुख की नहीं, अनसुनेपन की है। आयोन रो नहीं रहा, चिल्ला नहीं रहा, वह केवल कहना चाहता है कि उसका बेटा मर गया है। लेकिन दुनिया सुनने के लिए रुकी हुई नहीं है। हर आदमी अपने ही नाटक में व्यस्त है। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि मनुष्य तभी सुन सकता है जब वह भीतर से खाली हो। जो स्वयं दुखों से भरा है, वह दूसरे के दुख के लिए जगह कहां बनाए? इसलिए आयोन को कोई नहीं सुनता। अंत में वह घोड़े से बात करता है, क्योंकि घोड़े का मन खाली है। यह कहानी कहती है कि संवाद शब्दों से नहीं, उपस्थिति से होता है। घोड़ा समझता नहीं, फिर भी सुन लेता है। मनुष्य समझने का दावा करता है, पर सुन नहीं पाता। यही विडंबना है। दार्शनिक दृष्टि से यह कहानी मानव-अस्तित्व की उस स्थिति को उजागर करती है जहां व्यक्ति समाज के बीच रहते हुए भी अकेला होता है।
आयोन का अकेलापन भौतिक नहीं, अस्तित्वगत है। वह लोगों के बीच है, पर संबंध में नहीं। आधुनिक समाज में संवाद एकतरफा हो गया है। हर व्यक्ति बोलना चाहता है, पर कोई सुनना नहीं चाहता। किसी का दुख सुन लेना करुण चेतना की अवस्था है, बुद्धि की नहीं। यहां हम दिमाग से नहीं, दिल से काम ले रहे होते हैं। मनोविज्ञान कहता है कि शोक का सबसे आवश्यक चरण है दुख को शब्द देना। आयोन बार-बार प्रयास करता है, पर असफल रहता है। इससे उसका शोक बढ़ जाता है। जब वह घोड़े से बात करता है, तो उसका मस्तिष्क पहली बार भावनात्मक राहत अनुभव करता है। इससे स्पष्ट होता है कि यह महत्वपूर्ण नहीं है कि सुन कौन रहा है, बल्कि महत्त्वपूर्ण यह है कि कोई सुन रहा है। भारतीय जीवन-दर्शन दुख को समस्या नहीं मानता, वह उसे अवस्था मानता है। यही कारण है कि हमारे यहां दुख के लिए तुरंत उत्तर नहीं दिए जाते, दुख के साथ बैठा जाता है। चेखव की कहानी इसी अंतर को तीखेपन से उजागर करती है। आयोन जिस किसी को भी अपने बेटे की मृत्यु के बारे में बताता है, वह उसे सुनने के बजाय अपनी कहानी सुना देता है। यहां संवाद नहीं, प्रतिस्पर्धा है कि किसका दुख बड़ा है। भारतीय दृष्टि में यह अहम का खेल है, जहां करुणा के लिए स्थान नहीं बचता। गीता का बोध हमें बताता है कि मनुष्य का संतुलन तब टूटता है जब वह केवल अपने अनुभवों में बंद हो जाता है। दूसरे के अनुभव में प्रवेश करने की क्षमता ही करुणा है जो संतुलन को पुन: स्थापित करती है। करुणा कोई भावुकता नहीं है, यह चेतना की परिपक्वता है। आयोन को करुणा नहीं मिलती, इसलिए उसका दुख भारी होता जाता है। दुख स्वयं भारी नहीं होता, उसे अकेले ढोना भारी बना देता है। गीता दुख के समय उपदेश देने के बजाय स्थिति में ठहरने की शिक्षा देती है। यही कारण है कि भारतीय जीवन-दर्शन में मौन का महत्व इतना अधिक है। मौन शून्यता नहीं है, मौन संपूर्ण स्वीकार है। जब कोई व्यक्ति दुख में होता है, तब उसे तर्क नहीं चाहिए, सलाह नहीं चाहिए, उसे यह अनुभूति चाहिए कि उसका दुख वैध है, कि वह देखा जा रहा है। सुनना मतलब अपने भीतर जगह बनाना। जो व्यक्ति सुनता है, वह अपने अहम को थोड़ी देर के लिए हटाता है। समाज में यही सबसे दुर्लभ है।
गीता यह भी सिखाती है कि अहम सबसे बड़ा अवरोध है। जो व्यक्ति हर समय बोलना चाहता है, वह खुद को सबसे बड़ा ज्ञानी मानता है, वह चाहता है कि लोग उसकी बातें सुनें, उसके ज्ञान का आदर करें, वह सुन नहीं सकता, वह किसी का दुख भी सुन नहीं सकता। आयोन भी बोलना चाह रहा है, पर वह ज्ञान नहीं बांट रहा। आयोन अहंकार में नहीं है, दुख में है। आयोन के ग्राहक बोलते हैं, इसलिए वे सुन नहीं पाते। घोड़ा नहीं बोलता, इसलिए वह सुन लेता है। यह प्रतीक अत्यंत गहरा है। यह बताता है कि करुणा बुद्धि की नहीं, भावना की उपज है। आयोन जब अपने घोड़े को अपना दुख बताता है तो इस दृश्य में एक बूढ़ा व्यक्ति है और उसका घोड़ा, और बीच में बहता हुआ मौन। यही मौन गीता का भी मूल स्वर है। आयोन पोटापोव हर उस मनुष्य का प्रतीक है जिसने पाया है कि दुनिया उसके शोक के लिए रुकी नहीं है। भारतीय जीवन-दर्शन हमें सिखाता है कि यदि हम किसी के दुख के साथ बैठ सकें तो शायद हम उसके जीवन का सबसे बड़ा सहारा बन सकते हैं। यही गीता का मौन उपदेश है। यही करुणा की साधना है।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
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