हार में भी जीत

जीत कई बार हमें अहंकारी बना देती है, पर हार हमें जमीन से जोड़े रखती है। जब हम जमीन से जुड़े रहते हैं तो हमारी जड़ें गहरी होती हैं। जिनकी जड़ें गहरी होती हैं, उन्हें आंधी भी उखाड़ नहीं पाती, इसलिए हार को जीवन की जड़ समझना चाहिए। जड़ दिखाई नहीं देती, पर वही वृक्ष को खड़ा रखती है। अंतत: यदि हम ‘हार में भी जीत’ के इस सूत्र को जीवन में उतारेंगे तो हमें यह अनुभव होगा कि सच्ची जीत बाहरी पद, प्रतिष्ठा या ताली में नहीं है। सच्ची जीत उस स्थिरता में है जो बार-बार गिरकर भी हमें खड़ा कर देती है। हम ऐसा करेंगे तो परिणाम चाहे देर से आए, पर आएगा अवश्य। और तब हमें समझ आएगा कि जीत अचानक नहीं मिली, वह तो हर हार की सीढिय़ों से होकर आई थी। तब हम कह सकेंगे कि हमने हार को हराया नहीं, हमने हार को अपनाया, और उसी अपनाने में हमारी सबसे बड़ी जीत छिपी थी…

अमरीका के इतिहास में वहां के सोलहवें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का नाम सुनहरी अक्षरों में दर्ज है क्योंकि उन्होंने सघन विरोध के बावजूद देश से दास प्रथा को समाप्त किया। अब्राहम लिंकन का राजनीतिक सफर हार और जीत के संघर्ष की शानदार गाथा है, क्योंकि बार-बार हार के बावजूद उन्होंने न हिम्मत हारी और न ही अपने उसूल छोड़े। अब्राहम लिंकन ने सबसे पहला चुनाव सन् 1832 में लड़ा। इलिनॉय राज्य की विधानसभा के लिए लड़े गए इस चुनाव में ही उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा, यानी, उनके राजनीतिक चुनावी सफर की शुरुआत ही हार से हुई। दो वर्ष बाद ही उन्होंने दोबारा वही चुनाव लड़ा और यह उनकी पहली जीत बनी। इसके बाद वे लगातार तीन और बार भी इलिनॉय राज्य की विधानसभा के लिए चुने जाते रहे। इसके बाद सन् 1843 में अमरीकी कांग्रेस के चुनाव के लिए वे अपने दल की ओर से नामांकित नहीं हो सके। हालांकि यह उनकी दूसरी हार थी, पर यह एक बड़ी हार थी। सन् 1846 में वे जीते, पर अगली ही बार वे अपने दल का नामांकन प्राप्त करने में असफल रहे। इसके बाद सन् 1855 और 1858 में उन्हें पार्टी की टिकट तो मिल गई, पर दोनों बार वे सीनेट का चुनाव हार गए। लगातार दो बार सीनेट का चुनाव हार जाने के बावजूद वे 1860 में राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवार बने और चुनाव जीता, राष्ट्रपति बने और अमरीका के माथे से दास प्रथा का कलंक धोने में कामयाब रहे। राष्ट्रपति बनने से पहले अब्राहम लिंकन दो बार सीनेट का चुनाव हार चुके थे, इसके बावजूद उन्होंने राष्ट्रपति के पद के लिए चुनाव लड़ा, और सिर्फ जीते ही नहीं, बल्कि इतिहास बनाया। अब्राहम लिंकन के जीवन की यह गाथा हमें यही सिखाती है कि दौड़ में जीतने की पहली शर्त तो यही है कि हम दौड़ में बने रहें। हारें या जीतें, पर अगर दौड़ ही छोड़ दी तो फिर जीतने की संभावना भी नहीं रहेगी, इसके विपरीत बार-बार की असफलताएं भी अंतिम सफलता की राह बन सकती हैं।

बड़ी सीख यह है कि किसी भी प्रतियोगिता में हारने वाले और जीतने वाले दोनों एक सरीखे ही होते हैं क्योंकि दोनों ने प्रयास करने का साहस किया। दोनों ने उपहास या अपमान का जोखिम उठाया क्योंकि यदि हार हो जाए तो अक्सर लोग हारने वाले को नजरों से गिरा देते हैं। प्रतियोगिता में शामिल दोनों अनिश्चितता का सामना करने को तैयार हुए। दोनों में इतनी जिद थी कि वे डटे रहे। उन दोनों में से कोई एक हारा, लेकिन वह जीत भी तो सकता था। सफलता दरअसल सहनशीलता का छिपा हुआ रूप है। वह उसी की होती है जो हार को सह सकता है, पर वह कभी मन में यह सोच कर प्रतियोगिता में नहीं उतरता कि मैं हारने वाला हूं। असली अंतर शुरू करने के साहस और लगे रहने की क्षमता में होता है, परिणाम तो बाद की बात है। परिणाम तो उसी के लिए है जो मैदान में बना रहता है। किनारे पर बैठने वाले कभी भी इस गौरव के भागी नहीं बन सकते। किनारे पर बैठा रहने वाला व्यक्ति कभी हारता नहीं, पर वह कभी जीतता भी नहीं। इसीलिए कहा जाता है कि किनारे सुरक्षित हैं, पर वे बांझ हैं, अनुत्पादक हैं, वहां कुछ भी नहीं उगता, न हार, न जीत, न विकास। ‘हार में भी जीत’ केवल एक प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का एक गूढ़ आध्यात्मिक सिद्धांत है। जब हम अब्राहम लिंकन के जीवन को देखते हैं, तो हमें केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं दिखता, हमें कर्म और धैर्य का वह साधना-पथ दिखाई देता है जिसमें हर हार एक तपस्या बन जाती है। हम यदि जीवन को साधना मान लेंगे तो हमें यह समझ आएगा कि हार वास्तव में हमारे भीतर की अधूरी तैयारी को उजागर करती है। हम जब गिरते हैं तो हमारा अहंकार टूटता है, और जब अहंकार टूटता है तभी भीतर की वास्तविक शक्ति जागती है। यह समझ लें तो हार हमारे लिए अपमान नहीं, आत्म-परिष्कार का अवसर बन जाती है। हम यदि जीवन की दौड़ में बने रहते हैं तो धीरे-ृधीरे हमें अनुभव होगा कि असफलता हमें भीतर से मजबूत करती है। जीत हमें प्रसन्न करती है, पर हार हमें परिपक्व बनाती है। हर हार का दर्द भीतर एक नई जिजीविषा को जन्म देता है। यही जिजीविषा हमें फिर से खड़ा करती है। जब हम हर असफलता के बाद स्वयं से पूछते हैं- ‘मैंने क्या सीखा?’, तो हम हार को शिक्षक बना लेते हैं, और जो हार को शिक्षक बना लेता है, वह अंतत: जीवन का विद्यार्थी नहीं, आचार्य बन जाता है। हम ऐसा करेंगे तो समझेंगे कि संसार में जो भी महान हुआ, वह पहले भीतर से टूटा, तपाया और परखा गया। सोना आग में तपकर ही कुंदन बनता है। यदि हम पहली ही असफलता के बाद पीछे हट जाएं तो हम अपनी ही संभावना से विश्वासघात करेंगे। हार हमें यह बताती है कि अभी हमारी यात्रा अधूरी है। वह हमें रोकती नहीं, दिशा बदलने का संकेत देती है। जब हम हार को शत्रु नहीं, मित्र मानेंगे तो हमारी दृष्टि बदल जाएगी। तब हम पाएंगे कि हार हमें गिराती नहीं, झुकना सिखाती है, और जो झुकना सीख लेता है, वही आगे चलकर ऊंचा उठता है।

हम जब किसी प्रतियोगिता में उतरते हैं तो वास्तव में हम अपने ही भय से मुकाबला कर रहे होते हैं। जीत और हार तो बाहरी परिणाम हैं। असली जीत तब है जब हम भय के बावजूद कदम बढ़ाते हैं। यदि हम ऐसा करेंगे तो हमें दिखेगा कि हार में भी एक सूक्ष्म विजय छिपी है, वह है हमारे साहस की विजय। जिसने जोखिम लिया, जिसने उपहास का सामना किया, जिसने असुरक्षा को स्वीकार किया, वह पहले ही आधा विजेता है। परिणाम चाहे जो हो, उसने अपने भीतर की कायरता को परास्त कर दिया। मन दृढ़ हो तो हर हार हमें विनम्र बनाती है। विनम्रता आत्म-विकास का द्वार है। जीत कई बार हमें अहंकारी बना देती है, पर हार हमें जमीन से जोड़े रखती है। जब हम जमीन से जुड़े रहते हैं तो हमारी जड़ें गहरी होती हैं। जिनकी जड़ें गहरी होती हैं, उन्हें आंधी भी उखाड़ नहीं पाती, इसलिए हार को जीवन की जड़ समझना चाहिए। जड़ दिखाई नहीं देती, पर वही वृक्ष को खड़ा रखती है। अंतत: यदि हम ‘हार में भी जीत’ के इस सूत्र को जीवन में उतारेंगे तो हमें यह अनुभव होगा कि सच्ची जीत बाहरी पद, प्रतिष्ठा या ताली में नहीं है। सच्ची जीत उस स्थिरता में है जो बार-बार गिरकर भी हमें खड़ा कर देती है। हम ऐसा करेंगे तो परिणाम चाहे देर से आए, पर आएगा अवश्य। और तब हमें समझ आएगा कि जीत अचानक नहीं मिली, वह तो हर हार की सीढिय़ों से होकर आई थी। तब हम कह सकेंगे कि हमने हार को हराया नहीं, हमने हार को अपनाया, और उसी अपनाने में हमारी सबसे बड़ी जीत छिपी थी।

स्पिरिचुअल हीलर, सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण

गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

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