सत्संग से उपजा विवेक मनुष्य के जीवन में स्पष्ट परिवर्तन लाता है क्योंकि तब मनुष्य प्रतिक्रिया नहीं, उत्तर देता है, दोषारोपण नहीं करता बल्कि आत्मपरीक्षण करता है, संग्रह करने के बजाय संतोष करना सीख लेता है और दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को समझता है, अपनी गलतियां सुधारता है और एक बेहतर इनसान बनने की राह का पथिक बन जाता है। ऐसा व्यक्ति समाज में रहते हुए भी भीतर से स्वतंत्र होता है। सत्संग से उपजे विवेकपूर्ण जीवन की पहचान यही है। यही कारण है कि संत जनों का कहना है कि सत्संग एक आवश्यकता है, विकल्प नहीं है…
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक अटल सत्य है कि मनुष्य का जीवन केवल कर्मों से नहीं, संगति से भी गढ़ा जाता है। भक्त शिरोमणि गोस्वामी तुलसी दास जी का प्रसिद्ध कथन ‘बिनु सत्संग विवेक न होई’ केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य के आंतरिक विकास का शाश्वत सूत्र है। यह पंक्ति स्पष्ट करती है कि विवेक, अर्थात सही और गलत, नित्य और अनित्य, सार और असार का बोध, अपने आप उत्पन्न नहीं होता। इसके लिए जिस वातावरण, जिस संगति की आवश्यकता है, वही सत्संग है। सत्संग की भूमि में ही विवेक का बीज फलता-फूलता है। इस सब को गहराई से समझने के लिए हमें यह भी समझना होगा कि सत्संग क्या है और विवेक क्या है। दोनों के वास्तविक अर्थ को समझ लें तो ही इस कथन की महत्ता को भी समझा जा सकता है। आज का युग तकनीक का युग है। आज हमें सत्संग कई नए और सुविधाजनक रूपों में उपलब्ध है। संत साहित्य का स्वाध्याय, सद्विचारों की संगति, जीवन जी रहे महापुरुषों का सान्निध्य आदि तो है ही, यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और जूम आदि सोशल मीडिया के प्लैटफॉर्म भी हमें सत्संग की सुविधा प्रदान करते हैं। यही नहीं, आत्ममंथन भी एक आंतरिक सत्संग का बड़ा स्रोत है। अक्सर सत्संग को किसी धार्मिक सभा, प्रवचन या कीर्तन तक सीमित मान लिया जाता है। जबकि सत्संग का अर्थ है- सत के साथ संगति। ‘सत’ अर्थात सत्य, चेतना, आत्मा, ईश्वर, और संग अर्थात निकटता।
इस दृष्टि से सत्संग तीन स्तरों पर होता है। इनमें से पहला है संत-संगति, यानी ऐसे व्यक्तियों का साथ जिनका जीवन मूल्य, संयम और करुणा से आलोकित हो। दूसरा है सत विचार संगति, यानी शास्त्र, उपनिषद, गीता, रामचरितमानस जैसे ग्रंथों का अध्ययन, मनन और उनके द्वारा दी गई शिक्षा पर चिंतन, और अंत में आती है आत्म-संगति, यानी अपने भीतर के सत्य से जुडऩा। जहां इन तीनों का समन्वय होता है, वहीं वास्तविक सत्संग घटित होता है। अब बात आती है कि विवेक है क्या? विवेक के मायने क्या हैं? सामान्य अर्थों में विवेक को बुद्धि या समझ से जोड़ दिया जाता है, परंतु आध्यात्मिक दृष्टि से विवेक केवल बौद्धिक क्षमता ही नहीं है। विवेक वह अंत:दृष्टि है जो मनुष्य को यह पहचानने में समर्थ बनाती है कि क्या सत्य है और क्या मात्र आकर्षण, क्या स्थायी है और क्या क्षणिक, क्या आत्मोन्नति का मार्ग है और क्या पतन का। शास्त्रों में विवेक को मोक्ष का प्रथम सोपान कहा गया है। बिना विवेक के भक्ति अंधविश्वास बन सकती है, ज्ञान अहंकार बन सकता है और कर्म बंधन का कारण। सवाल उठता है कि बिना सत्संग विवेक क्यों नहीं हो सकता? विवेक के जागरण के लिए सत्संग पर इतना जोर क्यों दिया जाता है? उत्तर बहुत सरल है। मनुष्य का मन मूलत: अनुकरणशील है। वह जैसा देखता है, वैसा ही सोचने लगता है। आज का युग सूचना का है, पर विवेक का नहीं। सोशल मीडिया, विज्ञापन, आभासी चमक आदि सब मिलकर मनुष्य की सोच को प्रभावित करते हैं। ऐसे में यदि संगति असत की हो, तो अहंकार विवेक का स्थान ले लेता है, भोग को ही जीवन का लक्ष्य मान लिया जाता है, और तात्कालिक सुख को दीर्घकालिक हित पर प्राथमिकता मिल जाती है। सत्संग मनुष्य को ठहरना सिखाता है, प्रश्न करना सिखाता है। तब मनुष्य खुद से ही पूछने लगता है कि क्या यह मार्ग मुझे भीतर से शांत कर रहा है? इस पर मनन से ही विवेक जन्म लेता है। यही कारण है कि संतों ने सदैव सत्संग की महत्ता पर जोर दिया है। कबीर दास जी कहते हैं कि ‘सत्संगति से हरि कथा, मिटे कुमति का रोग।’ अर्थात सत्संग कुमति और कुचिंतन की औषधि है। रामकृष्ण परमहंस मानते थे कि जैसे गंगा किनारे रखा लोहा भी शीतल हो जाता है, वैसे ही संत-संगति में रहकर साधारण मनुष्य भी दिव्यता की ओर अग्रसर होता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को स्पष्ट रूप से कहा कि ज्ञानी, भक्त और संयमी जनों की संगति से ही ज्ञान स्थिर होता है। अकेला ज्ञान अक्सर भ्रमित कर देता है, पर सत्संग उसे दिशा देता है। सत्संग सदैव से प्रासंगिक, सदैव से उपयोगी रहा है और आधुनिक जीवन में भी सत्संग की प्रासंगिकता बराबर बनी हुई है।
आज का मनुष्य सुविधाओं से घिरा है, पर भीतर से अशांत है। तनाव, अवसाद, असंतोष, ये सभी विवेकहीन जीवन के लक्षण हैं। आधुनिक संदर्भ में सत्संग का अर्थ केवल आश्रम जाना नहीं, बल्कि इसमें विचारपूर्ण संवाद, मूल्य-आधारित मित्रता, सार्थक साहित्य, मौन और आत्मचिंतन आदि शामिल हैं। जब हम दिन भर नकारात्मक समाचार, कटु भाषा और तुलना से भरी दुनिया में रहते हैं, तो विवेक कुंठित हो जाता है। सत्संग उस धूल को धोने जैसा है जो आत्मा पर जम जाती है। यह समझना समीचीन होगा कि सत्संग से विवेक का विकास कैसे होता है? सत्संग केवल सुनने तक सीमित रह जाए तो वह मनोरंजन बन जाता है। पर जब वह आचरण में उतरता है, तभी विवेक स्थायी बनता है। सत्संग हमारे आचरण का हिस्सा बन जाए ऐसा अक्सर तीन चरणों में होता है। इसका पहला चरण है श्रवण, यानी सत्य को सुनना, फिर उसका मनन, यानी सुने हुए पर विचार करना, और फिर निदिध्यासन, यानी उसे जीवन में उतारना। सत्संग से उपजा विवेक मनुष्य के जीवन में स्पष्ट परिवर्तन लाता है क्योंकि तब मनुष्य प्रतिक्रिया नहीं, उत्तर देता है, दोषारोपण नहीं करता बल्कि आत्मपरीक्षण करता है, संग्रह करने के बजाय संतोष करना सीख लेता है और दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को समझता है, अपनी गलतियां सुधारता है और एक बेहतर इनसान बनने की राह का पथिक बन जाता है।
ऐसा व्यक्ति समाज में रहते हुए भी भीतर से स्वतंत्र होता है। सत्संग से उपजे विवेकपूर्ण जीवन की पहचान यही है। यही कारण है कि संत जनों का कहना है कि सत्संग एक आवश्यकता है, विकल्प नहीं है। जीवन में जब सत्संग आता है तो जीवन शांत, सजग और सत्य का उदाहरण बन जाता है क्योंकि विवेक से वैराग्य उत्पन्न होता है, वैराग्य से भक्ति का भाव जगता है और भक्ति से मुक्ति की ओर की यात्रा की शुरुआत होती है। यहां यह समझना आवश्यक है कि सत्संग साधन है साध्य की तैयारी का। सत्संग जीवन को दृष्टि देता है। जब हम इसे समझ लेते हैं तभी यह ज्ञान होता है कि ‘बिनु सत्संग विवेक न होई’ कोई नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन का मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य है। जिस प्रकार शरीर के लिए भोजन आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मा के लिए सत्संग अनिवार्य है। यदि विवेक जीवन की आंख है, तो सत्संग उसका प्रकाश है, और बिना प्रकाश के आंख होते हुए भी मनुष्य अंधकार में भटकता है। आज आवश्यकता है कि हम अपने जीवन में यह प्रश्न ईमानदारी से पूछें कि हम किसकी संगति में जी रहे हैं, क्योंकि वही संगति तय करेगी कि हमारा विवेक जागेगा या सोया रहेगा।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
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