टच कीजिए टच-स्क्रीन!

जीवन का एक बहुत सरल नियम है, जो इनसान की पूरी दुनिया बदल सकता है। मन की बात कह मन में रखने के बजाय कह देनी चाहिए। उसे हम भीतर न दबाएं। चि_ी लिखें तो भेज भी दें। बहुत देर होने से पहले ही कह भी दें और याद रखें कि जीवन में मिले लोगों और ईश्वर की कृपाओं के प्रति अपना प्रेम और आभार बिना झिझक जताते रहें। हमारा हृदय आधुनिक स्मार्ट फोन की टच-स्क्रीन की तरह का है। इसे टच करते रहें, छूते रहें, मन को सहलाते रहें, दुलारते रहें तो प्रेम बना रहेगा, रिश्तों की मिठास बनी रहेगी। मां-बाप की व्यस्तता के बीच अकेलेपन से जूझ रहे बच्चे जब अपने मन की बात किसी को नहीं कह पाते तो गलत राहों पर मुड़ जाते हैं। मोबाइल फोन, इंटरनेट और गलत संगत उन्हें किसी भी ऐसी दिशा में धकेल सकती है जहां बाद में सिर्फ पछतावा ही हाथ लगता है..

अलबर्ट आइंस्टीन को भला कौन नहीं जानता? आइंस्टीन केवल एक साधारण वैज्ञानिक ही नहीं थे, वे एक महान वैज्ञानिक और सिद्धांतकार थे। अपने क्रांतिकारी विचारों और खोजों से उन्होंने आधुनिक विज्ञान की दिशा ही बदल दी। उन्होंने कई ऐसे सिद्धांत दिए, जिनसे आज की तकनीक, अंतरिक्ष विज्ञान और परमाणु ऊर्जा तक प्रभावित हुए हैं। सापेक्षता का सिद्धांत उनकी सबसे प्रसिद्ध खोज है। उन्होंने बताया कि समय, दूरी और गति स्थिर नहीं होते, बल्कि परिस्थिति के अनुसार बदल सकते हैं। इसी सिद्धांत की वजह से आज ब्लैक होल, गुरुत्वीय तरंगें और ब्रह्मांड की कई घटनाएं समझी जा सकीं। उनकी एक और प्रमुख खोज थी कि पदार्थ और ऊर्जा एक-दूसरे में बदले जा सकते हैं। इसी सिद्धांत ने आगे चलकर परमाणु ऊर्जा और परमाणु बम के विकास का रास्ता खोला। फोटोइलेक्ट्रिक प्रभाव की उनकी खोज से सिद्ध हुआ कि प्रकाश केवल तरंग नहीं, बल्कि फोटॉन नामक छोटे-छोटे ऊर्जा कणों के रूप में भी काम करता है, इसी खोज के लिए उन्हें 1921 में नोबेल पुरस्कार मिला। सोलर पैनल, कैमरे के सैंसर, टीवी और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से जुड़ी बहुत सी तकनीकें इसी सिद्धांत पर आधारित हैं। आइंस्टीन के इन सिद्धांतों के कारण ही आज प्रयोग होने वाले जीपीएस सिस्टम, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष अनुसंधान, लेजर तकनीक और सोलर ऊर्जा आदि के क्षेत्रों का विकास हो सका। आइंस्टीन को संगीत से बहुत प्रेम था और वे नियमित रूप से वायलिन बजाया करते थे। वे शांति के समर्थक थे और युद्ध के खिलाफ बोलते थे। यही कारण है कि आइंस्टीन को केवल एक वैज्ञानिक नहीं, बल्कि मानव इतिहास के सबसे प्रभावशाली विचारकों में गिना जाता है। अल्बर्ट आइंस्टीन ब्रह्मांड के रहस्य समझा सकते थे- रोशनी, समय, गुरुत्वाकर्षण और इस दुनिया की बनावट तक, लेकिन उनके जीवन का एक दुखद अध्याय यह है कि वे अपने और अपने बेटे के बीच की दूरी कम नहीं कर सके।

उनका छोटा बेटा एडुआर्ड बहुत भावुक, बुद्धिमान और प्रतिभाशाली था। उसे कविता से प्रेम था, वह शोपां का संगीत बहुत सुंदर बजाता था, और मनोचिकित्सक बनने का सपना देखता था। आइंस्टीन उसे बहुत प्यार करते थे, लेकिन जब आइंस्टीन का विवाह टूटा, तब वे बेटे के जीवन में धीरे-धीरे दूर होते चले गए। वे चि_ियों में तो पिता बने रहे, पर जीवन में साथ नहीं दे सके। बड़ा होने पर एडुआर्ड को मानसिक बीमारी हो गई। उसने अपना अधिकतर जीवन ज्यूरिख के एक मानसिक चिकित्सालय में बिताया। उस समय तक आइंस्टीन पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो चुके थे और प्रिंस्टन में रहते थे। वे पैसे भेजते थे, कभी-कभी पत्र लिखते थे और बेटे का हाल पूछ लेते थे, लेकिन वे उससे फिर कभी मिलने नहीं गए। उनके स्वर्गवास के कई वर्षों बाद, आइंस्टीन के कागजों में एक ऐसा पत्र मिला, जो उन्होंने एडुआर्ड के लिए लिखा था, पर कभी भेजा नहीं। उस पत्र में उन्होंने याद किया कि बचपन में उनका बेटा कैसे शोपां बजाया करता था। फिर उन्होंने एक ऐसी पंक्ति लिखी, जिसने सब कुछ कह दिया- ‘मुझे तुम्हारे साथ और अधिक समय बिताना चाहिए था। मैं विचारों के पीछे भागता रहा, जबकि मुझे तुम्हारे पीछे भागना चाहिए था।’ वह पत्र कभी भेजा नहीं गया। एडुआर्ड उसे कभी पढ़ नहीं पाया। अपने अंतिम दिनों में एडुआर्ड अस्पताल में ही रहा। उसके बिस्तर के पास हमेशा अपने पिता की तस्वीर रखी रहती थी। जब आइंस्टीन की मृत्यु हुई, तब एडुआर्ड को यह समाचार दिया गया। वह लंबे समय तक चुप बैठा रहा। फिर वह कमरे में गया और शोपां का संगीत बजाने लगा। यह केवल आइंस्टीन की कहानी नहीं है। यह उन शब्दों की कहानी है, जिन्हें हम कहना चाहते हैं, उन फोन कॉल्स की कहानी है, जिन्हें हम टालते रहते हैं, उन चि_ियों की कहानी है, जिन्हें हम कभी भेज नहीं पाते। जीवन के सबसे बड़े पछतावे अक्सर उन कामों के नहीं होते, जो हमने किए। वे उन भावनाओं के होते हैं, जिन्हें हमने महसूस तो किया, लेकिन कभी कह नहीं पाए। सच तो यह है कि मन की बातें कभी दबाकर नहीं रखनी चाहिए। इससे गलतफहमियां और मन में कल्पनाएं पैदा होती हैं। जब बहुत अधिक चुप्पी होती है, तब इनसान जरूरत से ज्यादा सोचने लगता है, इसलिए अपने भाव थोड़ा खुलकर व्यक्त करना सीखिए। हर व्यक्ति आपके मन की बात अपने आप नहीं समझ सकता। अगर हमें कुछ चाहिए तो हमें साफ-साफ कह देना चाहिए। नाराज होकर यह उम्मीद मत रखना गलत है कि सामने वाला हमारी चुप्पी समझ जाएगा। अगर हम किसी को पसंद करते हैं तो भी बताना चाहिए। मन ही मन दुखी होते रहने से कुछ नहीं बदलता। अगर हमें कोई बात या कोई व्यक्ति अच्छे नहीं लगते तो विनम्रता से सच बोल देना श्रेयस्कर है। दूरी बनाकर यह उम्मीद मत रखना गलत है कि सामने वाला इशारा समझ जाएगा। जीवन का एक बहुत सरल नियम है, जो इनसान की पूरी दुनिया बदल सकता है।

मन की बात कह मन में रखने के बजाय कह देनी चाहिए। उसे हम भीतर न दबाएं। चि_ी लिखें तो भेज भी दें। बहुत देर होने से पहले ही कह भी दें और याद रखें कि जीवन में मिले लोगों और ईश्वर की कृपाओं के प्रति अपना प्रेम और आभार बिना झिझक जताते रहें। हमारा हृदय आधुनिक स्मार्ट फोन की टच-स्क्रीन की तरह का है। इसे टच करते रहें, छूते रहें, मन को सहलाते रहें, दुलारते रहें तो प्रेम बना रहेगा, रिश्तों की मिठास बनी रहेगी। मां-बाप की व्यस्तता के बीच अकेलेपन से जूझ रहे बच्चे जब अपने मन की बात किसी को नहीं कह पाते तो गलत राहों पर मुड़ जाते हैं। मोबाइल फोन, इंटरनेट और गलत संगत उन्हें किसी भी ऐसी दिशा में धकेल सकती है जहां बाद में सिर्फ पछतावा ही हाथ लगता है। बच्चे की भावनाओं को समझें, उसे बोलने का मौका दें, गलतियां करने और सीखने का मौका दें। बच्चे का ध्यान रखें, उसका उत्साह बढ़ाएं, उसे सही समय पर मार्गदर्शन दें पर कठोर न बनें, अनुशासन ऐसा न हो कि वह बंदिश बन जाए। कभी-कभार उसे मनमानी भी करने दें, मन का गुबार निकलता रहे, उबाल निकलता रहे तो कुकर प्रेशर फटता नहीं। हमें याद रखना चाहिए कि मन बहुत कोमल है, टच-स्क्रीन की तरह संवेदनशील है, इसे टच करते रहिए, खुशियां बांटते रहिए और खुद भी खुश रहिए। इसी में जीवन की सार्थकता है।

स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

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