जब हम यह स्वीकार करते हैं कि मैं अभी नहीं जानता, तब ही जानने की संभावना पैदा होती है। जो पहले से मान बैठा है, उसके लिए सीखने को कुछ बचता ही नहीं। इसलिए ‘मैं न मानूं’ कहना वास्तव में यह स्वीकार करना है कि मैं अभी यात्रा में हूं। यह ठहराव नहीं, यह गति है। यह वह विनम्रता है जो कहती है- हो सकता है मेरी आज की समझ अधूरी हो, और कल उसमें कुछ और जुड़ जाए। यह भाव व्यक्ति को छोटा नहीं करता, बल्कि भीतर से व्यापक बनाता है। गृहस्थ जीवन में भी यही दृष्टि संतुलन लाती है। परिवार में, समाज में, कार्यक्षेत्र में जब हम हर बात को अंतिम सत्य मानकर पकड़ लेते हैं, तब टकराव बढ़ता है और जब हम यह स्थान छोड़ते हैं कि शायद सामने वाला भी कुछ देख रहा है जो मुझे नहीं दिख रहा, तब संवाद जन्म लेता है। ‘मैं न मानूं’ संवाद का द्वार है, संघर्ष का नहीं। यह हमें कठोर नहीं, लचीला बनाता है, और लचीलापन कमजोरी नहीं, परिपक्वता का चिन्ह है…
हाल ही में मुझे एक सभा में बोलने के लिए बुलाया गया। विषय था अध्यात्म और विज्ञान। मेरे अलावा एक और सज्जन भी थे जिन्होंने इसी विषय पर अपने विचार रखे। वे सज्जन सचमुच बहुत विद्वान हैं और उन्होंने अपने विचार बहुत सुंदर ढंग से और व्यवस्थित रूप में रखे। बाद में जब प्रश्नोत्तर काल में हम दोनों श्रोताओं से मुखातिब हुए और हमने उनके प्रश्नों के जवाब देने आरंभ किए तो 25-26 साल के एक युवक ने सबसे ज्यादा सवाल पूछे। उस युवक का हर सवाल बहुत संयत था, जिज्ञासा से परिपूर्ण था और कई सवाल ऐसे थे जो हमारे जवाब से उपजे थे। वह युवक शालीनता से अपनी शंकाओं का समाधान कर रहा था। उसके सवालों ने मेरे ज्ञान चक्षु खोले कि संतुष्ट न हो पाने तक वह सवाल पूछ कर अपना ज्ञान बढ़ा रहा है। वह हमारा अनादर नहीं कर रहा था बल्कि हमारे ज्ञान और अनुभव का लाभ ले रहा था। बहुत से श्रोताओं को उसका रुख ‘मैं ना मानूं’ सरीखा लगा, पर मुझे उसके रुख में ‘मैं जानना चाहता हूं’ स्पष्ट नजर आया। उसका यह रुख मेरे लिए एक बड़ी सीख है। मैंने वहां सिर्फ अपना अनुभव बांटा ही नहीं, बल्कि मैं वहां से कुछ नया सीख कर आया। जो मैं जानता हूं, वह तो मैं जानता ही हूं, जो नया सीखा, वह मेरे संचित ज्ञान में जुड़ गया।
प्रमाण से पहले अस्वीकार का भाव न अनादर है, न निर्लज्जता, और न ही मूर्खता, बल्कि यह तो आत्मिक स्वराज है। ‘मैं ना मानूं’ से ही खोज शुरू होती है जो अक्सर किसी उपयोगी आविष्कार को जन्म देती है। भेद सिर्फ इसी में है कि अस्वीकार की भावना क्या है, उसके पीछे की नीयत क्या है। यदि अस्वीकार अहंकार से जन्मा है तो वह राजसी और तामसी भाव का मिश्रण है और यदि वह चेतना से उपजा है तो वह सात्विक है। फर्क नीयत का है, अस्वीकार का नहीं। यदि मेरी बात न जंचे तो सामने वाले को उसे अस्वीकार करने का पूरा हक है, चाहे वह मेरा बेटा ही क्यों न हो। अस्वीकृति हमेशा विद्रोह ही नहीं है, वस्तुत: यह जिज्ञासा और आत्मबोध की राह है। जिज्ञासा पर नाराजगी क्यों हो? यह हठ नहीं है, अपितु यह भीतर की सच्चाई के प्रति निष्ठा है। सच्चाई के प्रति निष्ठा के इस भाव का तो सम्मान होना चाहिए। ऐसा होना संभव है कि बाहर की सीख भीतर के अनुभव से टकराए। परंपराओं, सामाजिक मान्यताओं और रूढिय़ों का दृढ़ अस्वीकार गलत ही हो, ऐसा आवश्यक नहीं है। श्रद्धा के नाम पर आंख मूंद कर मान लेना उचित नहीं है। यह समझना आवश्यक है कि गुरू और व्यवस्था मार्गदर्शक हैं, निर्णायक नहीं हैं। विज्ञान की तो नींव ही संदेह पर टिकी है। वहां व्यक्ति की वरिष्ठता नहीं, तथ्यों का सम्मान है। ऐसी स्थिति में अस्वीकरण वस्तुत: तर्क और विवेक का उद्घोष है। यह मैं न मानूं से मैं जानूं तक की यात्रा है। इस अर्थ में यह गृहस्थ, साधक और विचारक- तीनों के लिए उपयोगी है। मैं न मानूं का असली अर्थ यह है कि मंै अभी नहीं जानता, पर मैं जानना चाहता हूं, मैं जानने और सीखने के लिए उत्सुक हूं, पर यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे समाज ने हमेशा इसका नकारात्मक पक्ष ही देखा है और इसे दबाने का हरसंभव प्रयत्न किया है।
कभी यह बचपन से आरोपित धारणाओं के विसर्जन के रूप में सामने आता है, कभी यह मानने के बजाय जानने की प्रक्रिया है। उधार की आस्था तो मानसिक गुलामी का प्रतीक है। वस्तुत: यह भीड़ की मानसिकता से अलग खड़े होने का साहस है। ऐसे में यह डर से, भीड़ की सुरक्षा से और मान्यता की झूठी भूख से मुक्ति का साहसी ऐलान है। इस मामले में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आदर्श को समझना और जीवन में उतारना अध्यात्म के विरुद्ध नहीं है। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण की विनम्रता ही है जो यह मानती है कि आज जिसे हम सच मानते हैं, हो सकता है कल हमें कुछ नए तथ्य मिलें और यह स्पष्ट हो जाए कि हमारी मान्यता गलत थी। आज के सत्य में कल कोई संशोधन संभव है। सच तो यह है कि ‘मैं न मानूं’ कोई नकार नहीं, बल्कि एक जागृत हां है, पर वह हां भीतर से आती है, बाहर से थोपी नहीं जाती। जब हम बिना समझे मान लेते हैं, तब भीतर कुछ नहीं खिलता, केवल आदत बनती है। और आदत से जीवन चलता तो है, पर विकसित नहीं होता। जीवन का विकास वहीं से शुरू होता है, जहां हम अपने भीतर यह साहस जगाते हैं कि जो कहा जा रहा है, जो सिखाया जा रहा है, जो पीढिय़ों से चला आ रहा है, उसे हम परखेंगे, जांचेंगे और फिर आत्मसात करेंगे। हम अक्सर श्रद्धा और विवेक को एक-दूसरे का विरोधी मान लेते हैं। हम अक्सर कहते हैं कि विश्वास करो, श्रद्धा रखो, सवाल मत करो, जबकि सच्चाई यह है कि श्रद्धा बिना विवेक के अंधी होती है और विवेक बिना श्रद्धा के रूखा। ‘मैं न मानूं’ इन दोनों के बीच से निकलने वाला रास्ता है।
यह वह बिंदु है जहां मन झुकता नहीं, जागता है। जहां व्यक्ति किसी के विरोध में नहीं, अपने भीतर की सच्चाई के पक्ष में खड़ा होता है। जब हम यह स्वीकार करते हैं कि मैं अभी नहीं जानता, तब ही जानने की संभावना पैदा होती है। जो पहले से मान बैठा है, उसके लिए सीखने को कुछ बचता ही नहीं। इसलिए ‘मैं न मानूं’ कहना वास्तव में यह स्वीकार करना है कि मैं अभी यात्रा में हूं। यह ठहराव नहीं, यह गति है। यह वह विनम्रता है जो कहती है- हो सकता है मेरी आज की समझ अधूरी हो, और कल उसमें कुछ और जुड़ जाए। यह भाव व्यक्ति को छोटा नहीं करता, बल्कि भीतर से व्यापक बनाता है। गृहस्थ जीवन में भी यही दृष्टि संतुलन लाती है। परिवार में, समाज में, कार्यक्षेत्र में जब हम हर बात को अंतिम सत्य मानकर पकड़ लेते हैं, तब टकराव बढ़ता है और जब हम यह स्थान छोड़ते हैं कि शायद सामने वाला भी कुछ देख रहा है जो मुझे नहीं दिख रहा, तब संवाद जन्म लेता है। ‘मैं न मानूं’ संवाद का द्वार है, संघर्ष का नहीं। यह हमें कठोर नहीं, लचीला बनाता है, और लचीलापन कमजोरी नहीं, परिपक्वता का चिन्ह है। अंतत: प्रश्न यह नहीं है कि हम मानते हैं या नहीं मानते। प्रश्न यह है कि उस स्वीकरण या अस्वीकरण में हमारा भाव क्या है। यदि भीतर सत्य के प्रति निष्ठा है, सीखने की आकांक्षा है और अहंकार का आग्रह नहीं है, तो ‘मैं न मानूं’ भी साधना बन जाता है। यही साधना धीरे-धीरे ‘मैं जानूं’ में बदलती है, और जब हम सच में जानने लगते हैं, तब मानना अपने आप घटित हो जाता है। तब मान्यता उधार नहीं होती, अनुभव से जन्मी होती है और वही मान्यता व्यक्ति को मुक्त करती है, और भीतर एक शांत, दृढ़ आलोक जगा देती है।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
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