गोचर भूमियों के बारे में तो कोई स्पष्ट जिक्र तक इस कोड में नहीं है। लोगों की नजर में वन विभाग की भूमिका हमेशा अधिकार हड़पने की रही है तो इस प्रक्रिया में उनका विश्वास करना थोड़ा कठिन हो रहा है। जैसे अन्य विभागों में होता है कि जमीन तो लोगों की है, कृषि विभाग उसमें जरूरी सहयोग करता है, उद्योग तो उद्योपति का है, उद्योग विभाग उसमें जरूरी आर्थिक सुविधाएं और सहयोग देता है, इसी तरह सामुदायिक वन जो वन अधिकार कानून के तहत समुदाय को दिया गया उसका मालिक तो समुदाय है, वन विभाग को उसमें केवल जरूरत पडऩे पर मांगा गया सहयोग देने तक सीमित रखना चाहिए…
भारतवर्ष में वन हमेशा आदिवासी समुदायों और कृषि-पशुपालन-दस्तकारी व्यवसाय से जुड़े समाजों के लिए आजीविका के आधार रहे हैं, जिसमें चरागाह भूमियों का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है, जिसे चरागाह दख्र्तान, चरागाह बिला दख्र्तान, गोचर भूमि आदि नामों से जाना जाता था। अंग्रेजों ने जब 1860 के आसपास वन भूमियों पर कब्जा करके वनों को वन विभाग के हवाले करने का कार्य आरंभ किया, तब वनों का चरित्र और प्रबन्धन पूरी तरह से बदल गया। अब वनों का मालिक वन विभाग हो गया और स्थानीय समुदाय कुछ सीमित स्तर के बरतनदार मात्र बना दिए गए, जिन्हें वन विभाग की दया पर निर्भर कर दिया गया। आदिवासी इलाकों में इस स्थिति के खिलाफ कई आंदोलन और लड़ाइयां हुईं, किन्तु अन्ततोगत्वा ब्रिटिश वन प्रबन्धन का युग शुरू हुआ जिसमें वन विभाग का लक्ष्य वनों के व्यापार से अधिक से अधिक कमाई करके ब्रिटिश सरकार के हवाले करना था।
इस वजह से वनों के स्वरूप को भी बदलने का काम शुरू हुआ। मिश्रित बहुउपयोगी वनों को एकल प्रजाति के व्यापारिक प्रजाति के वनों में बदला जाने लगा जिससे स्थनीय समाजों की वनों पर आधारित आजीविकाएं नष्ट होती चली गईं। यह क्रम चिपको आन्दोलन द्वारा इस व्यापारिक वन प्रबन्धन के खिलाफ 70-80 के दशक में किए गए लंबे संघर्ष तक आजादी के बाद भी जारी रहा। हालांकि 1986 की वन नीति के बाद से वन रोपण नीतियों में बदलाव आने लगा, किन्तु आदिवासियों और अन्य वन निर्भर समुदायों को डेढ़ सदी तक हुई हानि को देखते हुए 2006 में वन अधिकार कानून बना कर इस ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने का प्रयास हुआ, जिसके अनुसार वन भूमि में खेती करने वाले आदिवासी और अन्य वन निर्भर समुदायों को खेती योग्य भूमि कानूनी तौर पर उन्हें देने, वनों में उनके बरतनदारी अधिकारों को कानूनी अधिकार में बदलने और बरतनदारी वन क्षेत्रों को इन समुदायों को अपनी जरूरतों के अनुसार प्रबंधित करने के प्रावधान किए गए। इस कानून को विशेष कानून का दर्जा दिया गया, ताकि यह अन्य सभी वन कानूनों की परवाह किए बिना लागू किया जा सके। वन भूमि पर इस तरह समुदायों के बढ़ते दखल और अधिकारों के मद्देनजर वन विभाग शुरू से ही इसके विरोध में बना रहा। इसी खतरे को भांपते हुए इस कानून को लागू करने की जिम्मेदारी आदिवासी या जनजातीय मंत्रालय को सौंपी गई। अन्य प्रशासनिक स्तरों के परोक्ष विरोध और राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में 2008 में अधिसूचित हो जाने के बावजूद यह कानून कछुआ चाल से ही लागू किया जा रहा है। धीरे धीरे वन अधिकार कानून के अंतर्गत बनाई गई ग्राम सभाओं की शक्तियां जिला स्तरीय अनुश्रवण समितियों को सामुदायिक वन प्रबंधन में व्यापक भूमिका देकर कम की जा रही हैं। सामुदायिक वनों पर सामूहिक स्वामित्व आधारित व्यवस्था को सांझे वन प्रबंधन की दिशा में मोड़ा जा रहा है।
सांझा वन प्रबन्धन अपनी सीमाओं के चलते कोई प्रभावी सफलता दिखाने में पहले ही असफल हो चुका है, क्योंकि उसमें समुदाय की भूमिका नाममात्र की थी। जब तक समुदाय को यह विश्वास नहीं हो जाता कि यह वन हमारा है और हमें मिलकर इसकी रक्षा और संवर्धन करना है और इसके लाभ भी प्राप्त करने हैं, तब तक समुदाय को सक्रिय प्रबंधक नहीं बनाया जा सकता। इसी कमी को वन अधिकार कानून ध्यान में रखता है और अधिकार आधारित व्यवस्था बनाता है। 27 जुलाई 2026 को पर्यावरण और वन मंत्रालय और आदिवासी मंत्रालय का एक सांझा पत्र जारी किया गया है, जिसमें सांझा वन प्रबंधन की बात की गई है और 2023 के वर्किंग प्लान कोड के अनुसार सामुदायिक वनों के प्रबंधन की कार्ययोजना बनाने का निर्देश दिया गया है, और वन विभाग के सहयोग से यह योजना बनाई जाएगी। जाहिर है कि इसमें समुदायों की बात तो हाशिए पर ही रहेगी।
यह कोड इतना पेचीदा है कि कोई भी सामुदायिक वन प्रबंधन समिति इस आधार पर योजना बना ही नहीं सकती है। गोचर भूमियों के बारे में तो कोई स्पष्ट जिक्र तक इस कोड में नहीं है। लोगों की नजर में वन विभाग की भूमिका हमेशा अधिकार हड़पने की रही है तो इस प्रक्रिया में उनका विश्वास करना थोड़ा कठिन हो रहा है। जैसे अन्य विभागों में होता है कि जमीन तो लोगों की है, कृषि विभाग उसमें जरूरी सहयोग करता है, उद्योग तो उद्योपति का है, उद्योग विभाग उसमें जरूरी आर्थिक सुविधाएं और सहयोग देता है, इसी तरह सामुदायिक वन जो वन अधिकार कानून के तहत समुदाय को दिया गया उसका मालिक तो समुदाय है, वन विभाग को उसमें केवल जरूरत पडऩे पर मांगा गया सहयोग देने तक सीमित रखना चाहिए। तभी अधिकार आधारित व्यवस्था कायम हो सकेगी। हालांकि इस पूरी व्यवस्था को वन अधिकार कानून की धारणा के अनुसार विकसित होने में कुछ समय लगेगा। इसमें, करते हुए सीखने, की प्रक्रिया को अपनाना होगा। किन्तु सबसे जरूरी बात जो ध्यान में रखनी होगी, वह है कि कहीं भी समुदाय को यह नहीं लगना चाहिए कि हमारी स्थिति इस व्यवस्था में भी बाहरी तमाशाई से ज्यादा नहीं है। इसे वन अधिकार कानून की आत्मा पर ही आघात लगेगा और वांछित प्रतिफल भी प्राप्त नहीं हो सकेगा।
कुलभूषण उपमन्यु
पर्यावरणविद