
स्थानीय स्वशासन के सभी निकायों, नगर निकायों और पंचायतों के सदस्यों, प्रधानों, मेयर और कोंसिलर विशेष रूप से नियमों को लागू करने और जागरूकता फैलाने के लिए जिम्मेदार ठहराए गए हैं। नियमों को लागू करने में असफलता या ढील के चलते इन चुने हुए स्थानीय स्वशासन के जिम्मेदार लोगों और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को दंडित करने का प्रावधान किया गया है। कचरा पैदा करने वाले और प्रबंधन की जिम्मेदारी में ढील बरतने वाले, दोनों को ही दंड के दायरे में रखा गया है। यह नियम 1 अप्रैल 2026 से लागू हो गए हैं, किन्तु मुख्य चुनौती तो इन प्रावधानों को सही से लागू करने-करवाने की है। कचरा प्रबन्धन नियम तो 2016 से ही लागू हो गए हैं। वर्तमान में उनको अधिक सख्त बनाने का निर्णय स्वागत योग्य है, फिर भी जब तक गंभीरतापूर्वक लागू करने की
बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा के नाम पर बहुत सी जानकारियों को छुपाया जाता है। इसके कारण अपशिष्ट प्रबन्धन पर निगरानी रखना कठिन हो जाता है। इन सबका एकत्रित विषाक्त प्रभाव कितना पड़ रहा है इसका अभी तक पूर्ण आकलन ही नहीं किया गया है...
कुछ जगह मनरेगा में भी खरपतवार उखाडऩे का काम हुआ था, किन्तु चरागाह स्थापित होने तक लगातार निगरानी और घास रोपण नहीं होने के कारण दोबारा वहां खरपतवार आ गया। और केवल जागरूकता भी कारगर नहीं हो सकती क्योंकि लेंटाना आदि खरपतवार उन्मूलन का काम सघनश्रम का कार्य है। इसे स्वैच्छिक रूप से नहीं किया जा सकता। इसलिए प्रदेश को चरागाह पुनस्र्थापन के कार्य को बजट का जरूरी हिस्सा बनाना होगा जो प्रदेश की विभिन्न आर्थिक गतिविधियों को संबल प्रदान करेगा...
अंग्रेजी शासन काल से इन बहुमूल्य जड़ी बूटियों को वर्किंग प्लान का हिस्सा नहीं बनाया गया जिस कारण इनको उगाने की व्यवस्थाएं भी पनप नहीं सकीं। छोटा मोटा उखाडऩे का परमिट जारी करने और एक्सपोर्ट परमिट जारी करने के बाद अपने कत्र्तव्यों की इतिश्री मान ली गई...
पर्वतीय क्षेत्रों में ढांचागत विकास में भी विशेष सावधानी और उन्नत तकनीक प्रयोग की जरूरत है। सडक़ निर्माण मंत्री नितिन गडकरी जी ने स्वयं यह माना था कि डीपीआर बनाने वाली कंपनियों और ठेकेदारों ने लापरवाही की है जिससे आपदा में वृद्धि हुई। इस बजट में पर्वतीय क्षेत्रों में बृहद ढांचागत निर्माण कार्यों में गुणवत्ता और बेहतरीन तकनीक इस्तेमाल करने के लिए क्या प्रावधान किए गए हैं, यह सुनिश्चित नहीं किया गया है...
बेकार पदार्थों और कचरे के पुन: चक्रीकरण की व्यवस्थाओं को प्रोत्साहित करना संसाधनों के अत्यधिक दोहन को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। वायु प्रदूषण को रोकना और पारिस्थितिक तंत्र को बचाना और पुनर्जीवित करने पर जोर देना पड़ेगा...
हाथी, बन्दर, सूअर, नीलगाय और मांसाहारी शेर-चीता आदि भी वनों में भोजन न मिलने के कारण गांव या खेतों की ओर मुंह कर रहे हैं। एक ओर वन क्षेत्र घट रहा है दूसरी ओर बचा हुआ अनुत्पादक होता जा रहा है। हिमालय क्षेत्र पहले ही आजीविका कमाने की दृष्टि से संघर्ष पूर्ण क्षेत्र है। वहां स्थिति ज्यादा खराब है। यहां खेती और पशुपालन पर निर्भरता भी 90 प्रतिशत के आसपास है। वन्यप्राणी-मानव संघर्ष के चलते बहुत से क्षेत्रों में किसान अपनी जमीनें खाली छोडऩे पर विवश हो चुके हैं। इसके अलावा ईंधन आपूर्ति, और स्थानीय उपयोग के लिए विविध दस्तकारी के लिए कच्चा माल देने वाले उत्पाद और दवा-दूरी के लिए जड़ी-बूटी के न मिलने के कारण आजीविका के लिए स्थितियां कठिनतर होती जा रही हैं। हैरानी का विषय है कि आज तक इस समस्या को चिन्हित ही नहीं किया गया है...
पर्वतीय क्षेत्रों में ज्यादातर पेयजल योजनाएं जंगलों से होकर गुजरती हैं। उनमें जंगलों के बीच हाईडरेंट पॉइंट रखे जाने चाहिए ताकि आग लगने पर आसपास के जंगल को बचाया जा सके। केवल पाइप ले जाना होगा। इस तरह नवाचारी तरीके अपनाने होंगे। वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के सामने एक चुनौती और है, कि थोड़ा दूर से आग पर प्रभावी प्रहार कैसे किया जाए? जैसे टियर गैस शैल दूर से फायर किए जाते हैं। क्या आग बुझाने वाले शैल विकसित किए जा सकते हैं, जो दूर से फायर करके आग वाले क्षेत्र में फैंके जा सकें और उनमें मौजूद रसायन आग बुझाने का काम करे। आम समाज को स्कूलों, महिला मंडलों, पंचायतों, युवक मंडलों आदि के माध्यम से जागरूक करते रहना भी वनों को आग से बचाने के लिए एक जरूरी गतिविधि मानी जानी चाहिए...
जाहिर है कि जमीनी संरक्षण कार्य तो ग्राम पंचायत स्तर पर ही होना संभव है। इसलिए ग्राम पंचायत स्तरीय जैवविविधता प्रबन्धन समिति को सशक्त, कार्यक्षम और जागरूक बनाना पड़ेगा...