भारतीय समाज में बेरोजगारी

देश की अर्थव्यवस्था तो आगे बढ़ रही है, किन्तु उस अनुपात में रोजगार नहीं बढ़ रहे। हिमाचल में भी बेरोजगारी है…

भारतीय समाज को आम तौर पर कृषि प्रधान देश के रूप में परिभाषित किया जाता है, किन्तु यह अर्धसत्य निष्कर्ष है। असल में भारतीय समाज का बहुसंख्यक भाग दस्तकार रहा है और वह कृषकों की जरूरतें पूरा करते हुए खाद्य पदार्थ सुरक्षा अपनी मेहनत के बदले में प्राप्त करता था। लोहार, बढ़ई, तेली, जुलाहा, चर्मकार, बांसोर, नाई, धोबी, पत्थर की मूर्तियां बनाने और चिनाई का काम करने वाले, कच्ची ईंट बनाने वाले, घुमन्तु पशु पालक, भेड़ों की ऊन निकालने वाले, बाण बटाई का काम करने वाले, रंगाई-छपाई करने वाले, वूट्स स्टील बनाने वाले, और एक-एक पेशे से जुड़े हुए सहयोगी व्यवसाय करने वाले अनेक लोग रहते थे और सब एक दूसरे की जरूरतें पूरी करते हुए आराम की जिंदगी जीते थे। कोई बेरोजगार नहीं था। यह व्यवस्था एक दूसरे के सम्मान और स्वावलंबन की सोच पर आधारित थी, बाकी बारीकियां जो भी रही हों, हमें तो केवल यह देखना है कि देश कृषि के अलावा उत्पादक दस्तकारी पर ज्यादा निर्भर था। औद्योगिक क्रांति के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने भारत की उत्पादक व्यवस्था को नष्ट करने का बीड़ा उठाया, ताकि वह अपने देश के उद्योगों में बने उत्पादों को भारत में बेच सके। क्योंकि यहां के उत्पाद गुणवत्तापूर्ण थे, इसलिए उन्होंने साम, दाम, दंड, भेद से यह कार्य करने के रास्ते अपनाए।

कहीं समाज में व्याप्त छोटे मोटे मतभेदों को हवा देकर, तो कहीं बुनकरों के हाथ के अंगूठे काट कर सीधी कार्रवाई करके, कहीं दस्तकारों को कच्चे माल की उपलब्धता को नियंत्रित करके स्वावलंबी अर्थव्यवस्था को तोडऩे का काम किया गया। इसी के चलते ज्यादातर दस्तकारी से बेदखल हुए लोगों को कृषि का रास्ता पकडऩा पड़ा। उसमें भी स्थायी बंदोबस्त करके जागीरदारी प्रथा को कायम किया, जिससे बहुत से दस्तकारों को जागीरदारों के मजदूर काश्तकार के रूप में जीवन यापन करना पड़ा, जिससे पैदा विसंगतियां और सामाजिक टूटन आज दिन तक देश के सामने अनेक प्रत्यक्ष और परोक्ष समस्याएं खड़ी करती रहती है। अब जबकि देश की आबादी भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है तो इस औद्योगिक विस्तार के मॉडल से दस्तकार समाज की खोई हुई रोजी की भरपाई कैसे हो सकेगी, यह प्रश्न लगातार चिंता को बढ़ाता ही जा रहा है। पढ़े-लिखे बच्चे पुरानी दस्तकारी तकनीकों को अपना कर वर्तमान विकसित तकनीक वाले उद्योगों से टक्कर नहीं ले सकते हैं। वर्तमान औद्योगिक मॉडल में रोजगार प्रदान करने की क्षमता बहुत सीमित है और स्वचालित और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे उपायों से कामगारों की जरूरत को लगातार घटाया जा रहा है। ऐसे में खेती में भी सबको रोजगार प्राप्त नहीं हो सकता, क्योंकि अधिकांश जोतें इतनी छोटी हो चुकी हैं कि उन पर पूरे परिवार का पालन संभव ही नहीं है। पर्वतीय क्षेत्रों में तो हालात और भी ज्यादा खराब हैं, जहां 80 प्रतिशत जोतें एक हेक्टेयर से भी छोटी हैं जिनमें आधी तो 2-3 बीघे मात्र ही हैं। इतनी कम जमीन पर आदमी सम्मानपूर्वक घर-बार तो बसा सकता है और इतनी जमीन तो होनी ही चाहिए, किन्तु सम्मानजनक आय खड़ी नहीं कर सकता।

सरकारी नौकरी तो मात्र दो-तीन प्रतिशत लोगों को ही स्थापित कर सकती है। तो वर्तमान सरकारी और निजी उद्योगों की नौकरी जिसमें आईटी क्षेत्र भी शामिल है, कृषि, पशुपालन की वर्तमान स्थिति के बावजूद जो बेरोजगारों की बड़ी संख्या इंतजार में खड़ी है और हर साल बढ़ती जा रही है, उनके लिए जवाब ढूंढने की जरूरत है। लोग नौकरी के इंतजार में आयु सीमा पार कर जाते हैं, फिर हताश होकर जीवन जीने को बाध्य होते हैं। ये परिस्थितियां देश के लिए सही नहीं हैं। सरकारें कोशिश करने के तमाम दावों के बावजूद जरूरत का दस प्रतिशत भी रोजगार खड़ा नहीं कर पा रही हैं। देश की अर्थव्यवस्था तो आगे बढ़ रही है, किन्तु उस अनुपात में रोजगार नहीं बढ़ रहे। हिमाचल का उदाहरण लें तो बेरोजगारों की संख्या 6 लाख 32 हजार है (31 मार्च 2025 तक), जबकि बहुत से लोग रोजगार कार्यालय में पंजीकरण को फिजूल मान कर पंजीकरण ही नहीं करवा रहे हैं। इसका अर्थ हुआ कि असली आंकड़ा और भी ज्यादा होगा। हिमाचल में पिछले तीन साल में सरकारी नौकरी 23 हजार 200 लोगों को दी गई। निजी क्षेत्र में 51 हजार को इस अवधि में नौकरी मिली। अत: प्रतिवर्ष 24 हजार 733 लोगों को नौकरी मिली। तो इस दर से 6 लाख 32 हजार लोगों को नौकरी मिलने में 25 वर्षों से ज्यादा समय लगेगा। तब तक और कितने बेरोजगार इसमें जुड़ जाएंगे, यानी यह अनंत इंतजार का खेल है। धन्य है हमारे राजनेताओं को, जो इतनी साफ तस्वीर होने के बावजूद लोगों को पीछे लगाए रखते हैं और सच नहीं बोलते। जो बोलेगा वह जाएगा। यानी हम आम नागरिक भी सच सुनना ही नहीं चाहते। न योजना बनाने वाला और न लाभार्थी, जब दोनों ही सच सुनने को तैयार नहीं तो समस्या का समाधान कैसे निकलेगा। सभी जब सफेद कॉलर जॉब ढूंढेंगे तो कैसे संभव होगा। तीन उंगली से कागज तो लिखे जाते हैं, जरूरत की वस्तुएं तो पैदा नहीं हो सकती। हम सोचते हैं कि मशीनीकरण से संभव होगा, किन्तु मशीनीकरण ने ही तो रोजगार छीने हैं। सौ छीन कर दस पैदा किए हैं तो 90 प्रतिशत का घाटा कैसे पूरा होगा? हम यूरोप और अमरीका की ओर समाधान के लिए देखने लगते हैं। किन्तु हमें याद रखना चाहिए कि इन देशों ने उपनिवेशवादी दौर में विकासशील देशों की जो लूट की थी, यह उसी के ऊपर खड़ी इमारत है। उतनी बुनियादी पूंजी हमें कहां से मिलेगी। फिर आजकल चीन का उदाहरण देने और उससे सीखने की बहुत बात होती है। किन्तु हम कभी चीन नहीं बन सकते।

चीन साम्यवादी सरकार चलाने वाला घोर पूंजीपति देश बन चुका है। भले ही उसके प्रत्यक्ष और परोक्ष चाहने वाले उसे इस रूप में देखने का साहस नहीं कर पाते, किन्तु सच्चाई तो यही है। चीन ने 1978 में ही आर्थिक उदारीकरण की राह पकड़ ली थी, जबकि भारत में उदारीकरण 1991 में शुरू हो सका। तब तक चीन, अमरीका के स्वार्थों का लाभ उठा कर अमरीका की ही सहायता से दुनिया का उत्पादन केंद्र बन गया। अब तो अमरीका भी अपनी चीन संबंधी नीति को गलत मान रहा है क्योंकि वह अमरीका का ही प्रतिस्पर्धी बन गया है। हर देश अपनी शक्ति और सामयिक हालात को देख कर बनाई योजना और रणनीति से ही आगे बढ़ सकता है। इसलिए हमें किसी की घटिया नकल बनने की जरूरत नहीं है, बल्कि अपनी शक्ति और सीमाओं को देख कर समाधान ढूंढने चाहिए। औद्योगिक नीति को विकेन्द्रित करना होगा।

कुलभूषण उपमन्यु

पर्यावरणविद