श्रीमद्भगवद्गीता हमें यही स्मरण कराती है कि जीवन को गति और विश्राम, दोनों की आवश्यकता है। केवल दौड़ ही जीवन नहीं है, ठहरना भी उतना ही आवश्यक है। ठहरना कोई हार नहीं, बल्कि चेतना की वापसी है। जब हम ठहरते हैं, तब हम देखते हैं कि हमने क्या पाया, क्यों पाया, और उसकी कीमत क्या चुकाई। रजोगुण का संतुलन सत्त्व की ओर झुकने से ही संभव है, जहां कर्म तो होता है, पर अहंकार नहीं, प्रयास होता है, पर बेचैनी नहीं, लक्ष्य होता है, पर अंधापन नहीं। यदि मनुष्य यह समझ ले कि असली सफलता बाहरी उपलब्धियों से अधिक आंतरिक शांति में है, तो दौड़ अपने आप सहज हो जाती है। तब जीवन ‘भागो, भागो, भागो’ की चीख नहीं रहता, बल्कि एक सजग यात्रा बन जाता है। कर्म करो, पर कर्म में ऐसे न डूबो कि जीवन में कुछ और न बचे…
फ्लाइंग सिख के नाम से प्रसिद्ध रहे स्वर्गीय धावक मिल्खा सिंह की जीवनी पर एक फिल्म बनी थी जिसका नाम था ‘भाग मिल्खा भाग’। मिल्खा सिंह दौड़ते थे क्योंकि दौडऩा उनका जुनून था, दौडऩा उनका पेशा था। पर क्या यह सच नहीं है कि आज हम सब दौड़ रहे हैं, लगातार दौड़ रहे हैं और सिर्फ दौड़ते ही जा रहे हैं। हम पैदा होते हैं, कुछ बड़े होते हैं तो पहले स्कूल, फिर कालेज की पढ़ाई, पढ़ाई में भी दौड़, फिर नौकरी या व्यवसाय, उसमें भी दौड़, फिर शादी, बच्चे और बच्चों का करिअर, उसमें भी दौड़, फिर बुढ़ापे की चिंता, उसमें भी दौड़। इस प्रकार हम हमेशा ‘भागो, भागो, भागो’ की स्थिति में ही रहते हैं। हमारा समाज हमें सफल होने की शिक्षा देता है। सफलता के लिए हमेशा चलते ही रहने की शिक्षा देता है और चेताता है कि इस दौड़ में रहना है तो हमेशा दौड़ते ही रहना होगा। हमें सिखाया जाता है कि विश्राम का वक्त नहीं है, मंजिल पानी है तो विश्राम के लिए रुकना नहीं है, वरना दौड़ से बाहर। पीछे छूट जाओगे तो कोई और तुम्हारी जगह ले लेगा। इस दौड़ में हम जीवन को ही भूल गए हैं। श्रीमद्भगवद्गीता हमें बताती है कि हमारा जीवन तीन तरह के गुणों से निर्धारित होता है और ये तीन गुण हैं- सत्व, रजत और तमस। किसी व्यक्ति में जब रजोगुण बढ़ जाता है तो वह कर्मशील हो जाता है, मेहनत करने लगता है, लक्ष्य की दौड़ में लग जाता है और लक्ष्य पाने की चाह में नैतिक मूल्यों को भी भूल जाता है जिससे उसका जीवन समस्याओं का पिटारा बनकर रह जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता तो हमें कर्म की शिक्षा देती है। न मेहनत बुरी है, न लक्ष्य को पाने की चाह। समझना यह है कि हम अति कहां कर बैठते हैं और यही वह मुद्दा है जहां श्रीमद्भगवद्गीता हमें चेतावनी देती है। श्रीमद्भगवद्गीता के संदेश को आसानी से और पूरी तरह समझना हो और इसे जीवन में उतारना हो तो एमेजॉन पर उपलब्ध मेरी पुस्तक ‘सरस गीता’ हमारे समाज के लिए मानो वरदान ही है।
इस पुस्तक में श्रीमद्भगवद्गीता के हर श्लोक को सरल हिंदी में काव्य रूप में अनुवाद किया गया है जिससे श्रीमद्भगवद्गीता के हर श्लोक को समझना आसान हो जाता है। यही नहीं, चूंकि यह पुस्तक काव्य रूप में है तो इसे लयबद्ध रूप में गाया जा सकता है जिससे याद रखना अत्यंत आसान हो गया है। एमेजॉन पर उपलब्ध ‘सरस गीता’ में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि श्रीमद्भगवद्गीता के हर श्लोक का पूरा अर्थ उसके काव्य रूप में आए ही, यही नहीं यदि किसी श्लोक में वाक्य अधूरा है जिसे अगले श्लोक में पूरा किया गया है तो काव्य रूप भी हर हालत में वैसा ही हो। जिस व्यक्ति की प्रकृति रजोगुण वाली होती है तो भोग में डूबे रहना उसका लक्ष्य बन जाता है और यही उसके जीवन पर भार बन जाता है जो सारी चिंताओं का कारण बनता है। वह हमेशा इस प्रकार सोचता है कि आज मैंने यह पा लिया, कल यह और पा लूंगा और व्यक्ति ‘मेरा-मेरा’ करता हुआ धन जोड़ते रहने की जुगत में ही जीवन बिता देता है। ‘श्रीमद्भगवद् सरस गीता’ में इसे बड़े ही आसान शब्दों में समझाया गया है। ‘आज मिला, कल और लूं, मन में यही विचार, मेरा-मेरा जोड़ता, बढ़ता तृष्णा भार’ कहकर श्रीमद्भगवद्गीता के संदेश को इतने सरल शब्दों में स्पष्ट किया गया है कि संदेह की कोई गुंजायश ही नहीं रह जाती। इसी पुस्तक में यह भी कहा गया है .. ‘चिंता में डूबे रहें, जीवन भर का भारय भोग बने जब लक्ष्य तब, सूझे न कोई पार’। रजोगुण का यह विश्लेषण एकदम सटीक है जो हमारे दिमाग की धुंध को एक ही झटके में साफ कर देता है। रोचक और सरल पद्य रूप में श्रीमद्भगवद्गीता की यह प्रस्तुति बहुत रुचिकर है। संदेश स्पष्ट है कि रजोगुण की प्रकृति वाला व्यक्ति एक इच्छा पूरी करता है तो साथ ही अगली इच्छा की पूर्ति में लग जाता है। यही कारण है कि उसे कभी भी चैन नहीं है। वह कितना ही अमीर हो जाए, पीढिय़ों तक का इंतजाम हो जाए, तो भी उसका लालच उसे दौड़ाता ही रहता है जिससे उसके जीवन में चैन नहीं रह पाता। ऐसा व्यक्ति हमेशा यही सोचता है कि आज मैंने इस शत्रु को पराजित कर दिया, कल मैं उसे हरा दूंगा। व्यक्ति अपने दंभ में ही डूबा रहता है। उसके जीवन में सुविधाएं चाहे जितनी भी हों, शांति नहीं होती, तसल्ली नहीं होती, संतोष नहीं होता।
रजोगुण तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न होता है। इसका परिणाम केवल क्रियाशीलता नहीं, बल्कि लोभ और मोह से प्रेरित क्रियाशीलता है, कुछ पाने की बेचैनी, कुछ बन जाने की आकांक्षा, कुछ कर दिखाने का दबाव। इसकी जड़ में तृष्णा है, अतृप्त चाह, और आसक्ति है। रजोगुण में व्यक्ति निरंतर दौड़ता रहता है। थकता है, पर ठहर नहीं पाता। गीता यहां कर्म-त्याग नहीं, कर्म के समय लोभ, ईष्र्या और अनैतिकता के त्याग का संकेत करती है। रजोगुण से किए कर्मों का फल अक्सर दुखदायी होता है क्योंकि रजोगुण से लोभ पैदा होता है, इच्छाएं बढ़ती हैं, ईष्र्या बढ़ती है, आदमी खुद को काम में झोंक देता है, इससे परेशानियां बढ़ती हैं, फिर भी आदमी खुद को गरीब महसूस करता है क्योंकि ‘गरीबी’ धन की कमी से कम अपितु इच्छाओं की वृद्धि से ज्यादा महसूस होती है और इस सब का फल अक्सर दुखदायी होता है। यही कारण है कि जीवन की इस अंधी दौड़ में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं रह जाता कि हम कितना आगे निकल गए, बल्कि यह हो जाता है कि हम भीतर से कितने थक चुके हैं। समस्या दौडऩे में नहीं है, समस्या उस होश के खो जाने में है जिसके साथ दौड़ा जाता है। जब कर्म साधना बन जाता है, तब वही कर्म मन को हल्का करता है, और जब कर्म तृष्णा बन जाता है, तब वही कर्म मन को बोझिल कर देता है। श्रीमद्भगवद्गीता हमें यही स्मरण कराती है कि जीवन को गति और विश्राम, दोनों की आवश्यकता है। केवल दौड़ ही जीवन नहीं है, ठहरना भी उतना ही आवश्यक है।
ठहरना कोई हार नहीं, बल्कि चेतना की वापसी है। जब हम ठहरते हैं, तब हम देखते हैं कि हमने क्या पाया, क्यों पाया, और उसकी कीमत क्या चुकाई। रजोगुण का संतुलन सत्त्व की ओर झुकने से ही संभव है, जहां कर्म तो होता है, पर अहंकार नहीं, प्रयास होता है, पर बेचैनी नहीं, लक्ष्य होता है, पर अंधापन नहीं। यदि मनुष्य यह समझ ले कि असली सफलता बाहरी उपलब्धियों से अधिक आंतरिक शांति में है, तो दौड़ अपने आप सहज हो जाती है। तब जीवन ‘भागो, भागो, भागो’ की चीख नहीं रहता, बल्कि एक सजग यात्रा बन जाता है। कर्म करो, पर कर्म में ऐसे न डूबो कि जीवन में कुछ और न बचे। दौड़ो, पर अपने अस्तित्व को रौंदकर नहीं। जब यह समझ जीवन में उतरती है, तब संतुलन जीवन को भार से मुक्त करता है और मन को वह विश्राम देता है, जिसकी तलाश में हम जीवन भर दौड़ते रहते हैं।
स्पिरिचुअल हीलर
हैपीनेस गुरु डा. प्रमोद निर्वाण
गिनी•ा विश्व रिकॉर्ड से सम्मानित लेखक
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