अंतस का आनंद

श्रीराम शर्मा

आनंद अध्यात्म की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। जो व्यक्ति इसे प्राप्त कर लेता है, उसकी अवस्था आध्यात्मिक दृष्टि से काफी उच्च मानी जाती है। बहिरंग की प्रफुल्लता सर्वसामान्य में भी देखी जाती है, पर वह भौतिकता से जुड़ी होने के कारण अस्थिर होती और घटती-बढ़ती रहती है, लेकिन आनंद आत्मिक होने के कारण चिरस्थायी होता और समस्वर बना रहता है। आमतौर पर आनंद और उत्फुल्लता को एक माना जाता है, किंतु दोनों में जमीन-आसमान जितना अंतर है। जो भेद सूर्य और चंद्रमा के प्रकाश के मध्य है, लगभग वैसा ही फर्क इन दोनों के बीच माना जाना चाहिए। बाह्य वस्तुओं में हमें जहां-जहां, जब-जब सुख की अनुभूति होती है, वह वस्तुतः हमारे अंतस के आनंद का ही प्रकाश है, क्योंकि बाहरी उपादानों में सुख कभी होता नहीं। जो होता है, वह मात्र दुःख है। यदि भौतिक पदार्थ आनंद के स्रोत रहे होते, तो जिस चीज से एक को प्रसन्नता मिलती है, दूसरे के लिए भी वह उत्फुल्लतादायक ही होनी चाहिए थी, पर दैनिक जीवन में जो अनुभव होते हैं, वह इसके ठीक विपरीत है। देखा जाता है कि जो सामग्री हमारे जीवन में सुख और शांति लाती है, दूसरे के लिए वही महान दुःख का कारण बन जाती है। जड़ पदार्थ यदि सचमुच ही प्रसन्नता के उद्गम होते, तो किसी के लिए भी वे विपन्नता के निमित्त नहीं बनते। यदि बनते हैं, तो निश्चय ही समझने में कोई भूल हुई है। इस भूल को समझकर और सुधारकर ही हम उस चिरंतन आनंद को प्राप्त कर सकते है। इस संसार में पदार्थ और चेतना दो प्रधान तत्त्व है। स्थूल जगत में पदार्थ ही सर्वोपरि है, जबकि सूक्ष्म जगत में आत्मा परमात्मा से बढ़कर दूसरा कुछ भी नहीं। दोनों ही अपने-अपने प्रकार के सत्य हैं, पर यह संभव नहीं कि एक से संबंधित सत्य की उपलब्धि दूसरे में की जा सके।  द्रव्य का गुण आत्मा में ढूंढ़ना निरर्थक है और आत्मा का धर्म पदार्थ और संसार में तलाशना न समझी। संसार में सौंदर्य भरा पड़ा है। कोई उसको निहारकर गदगद होता रहता है, जबकि दूसरे को उसमें वैसा सुख नहीं मिल पाता। यदि सौंदर्य है, तो इसकी खोज करने वाले प्रत्येक अन्वेषक को इससे सुख मिलना चाहिए, किंतु ऐसा कहां होता है? जिस सौंदर्य से, भोग और विलासिता से हमें आनंद मिलता है, उसी से कोई बुद्ध भाग खड़ा होता है, वैरागी बन जाता है। यदि सौंदर्य सच्चा है, तो यह विरोधाभास नहीं दिखलाई पड़ना चाहिए। कोई नयनाभिराम सौंदर्य के बीच रहकर भी अतृप्त बना रहता है, जबकि दूसरा घोर नरक जैसी परिस्थितियों में भी स्वर्गीय सुख की प्रतीति करता है। आखिर ऐसा क्यों? गहराई से विचार करने पर यही ज्ञात होता है कि जिस शाश्वत संतोष की तलाश हम बाहर करते रहते हैं, वस्तुतः अंदर की वस्तु है। बाहर यदि उसकी अनुभूति होती है, तो वह भी भीतर का ही विस्तार है। जैसे-जैसे हम गहराई में प्रवेश करते चलते हैं, वैसे-वैसे इस तथ्य की अनुभूति और अधिक स्पष्ट होती जाती है। हम सुख को बाहरी वस्तुओं में ढूंढना चाहते है। सुख वहां है नहीं, इसलिए दुःख भोगना पड़ता है। इतना जानते-समझते हुए भी व्यक्ति आज संसार में साधनों के पीछे शांति के लिए भागता फिर रहा है। कोई उसे किसी चीज में खोजने का प्रयास कर रहा है, तो दूसरा किसी अन्य में अन्वेषण कर रहा है। सभी प्रयत्नशील हैं, पर आज तक इनमें से कोई भी इस सनातन सुख को उपलब्ध कर पाने में सफल न हो सका। पत्नी सोचती है कि उसे पति के सान्निध्य में सुख मिलेगा और पति सोचता है कि वह इसे पत्नी से प्राप्त कर लेगा। मां, बेटे में सुख ढूंढ़ रही है, जबकि बेटे को इसकी तलाश मां में है। पिता पुत्र में, पुत्र पिता में, संसारी संसार में और वैरागी वैराग में इसे अपने-अपने ढंग से खोज रहे हैं, किंतु उनकी अब तक की यह खोज यात्रा पूरी न हो सकी है और न भविष्य में पूरी होने की संभावना है, क्योंकि जिन्हें हम सुख का स्रोत मान बैठे हैं, वे इसके उद्गम हैं नहीं।

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