Divya Himachal Logo Aug 20th, 2017

वैचारिक लेख


बंगाल में ममता का अभेद्य किला

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं

newsयह ठीक है कि ममता बनर्जी के किले को सेंध लगाने में कोई कामयाब नहीं हो रहा। उसका एक कारण विकल्पहीनता का होना है। तृणमूल को हटा कर बंगाल का मतदाता चुनाव में आखिर किस को वोट दे? सीपीएम को दोबारा वह सत्ता में लाना नहीं चाहता क्योंकि वह उनका तीस साल का कुशासन भोग चुका है। सोनिया कांग्रेस अब लगभग कोमा में जा चुकी है। उसको होश में लाने का प्रयास भला बंगाल के लोग क्यों करेंगे? ले दे कर बंगाल में अब एक ही पार्टी बचती है जो तृणमूल को टक्कर दे सकती है-वह भारतीय जनता पार्टी है…

पश्चिम बंगाल में सात नगरपालिकाओं के चुनाव तेरह अगस्त को संपन्न हुए। धूपगुड़ी, हल्दिया, पंसकुडा, दुर्गापुर, कूपर कैंप, नलहाटी और बुनियादपुर की ये नगरपालिकाएं उत्तरी बंगाल से लेकर दक्षिणी बंगाल तक फैली हुई हैं। इन चुनावों में मुकाबला मुख्य रूप से ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और सीपीएम के बीच ही था, ऐसा बहुत से राजनीतिक विश्लेषक मानते थे। वैसे भी आम तौर पर मान लिया जाता है कि पश्चिम बंगाल साम्यवादियों का गढ़ रहा है, इसलिए सत्ताधारी दल को कोई टक्कर दे सकता है तो वह साम्यवादी दल ही हो सकता है। कम्युनिस्ट पार्टी के लोग स्वयं भी इसी तर्क के कारण आस्ट्रेलिया भागते फिरते हैं। तीसरे नंबर पर सोनिया गांधी की कांग्रेस आती है। शुरू में बंगाल में मुकाबला कांग्रेस और कम्युनिस्टों के बीच ही हुआ करता था। यह ठीक है कि लगभग तीन दशकों से सीपीएम ही बंगाल में सत्ता पर कब्जा जमाए बैठी रही, लेकिन दूसरे नंबर पर कांग्रेस के पास भी सदा वोट देने वालों का अच्छा खासा प्रतिशत कांग्रेस के खाते में आता ही था। लेकिन ममता बनर्जी ने अपने संघर्ष से कांग्रेस का वह हिस्सा खा लिया। इस प्रकार कांग्रेस तीसरे नंबर पर छिटक गई थी। रही भारतीय जनता पार्टी की, तो उसका बंगाल में कभी कोई जनाधार नहीं रहा। उसे कोलकाता के बड़े बाजार की पार्टी के रूप में जाना जाता था।

धीरे-धीरे बंगाल का रुझान बदलने लगा है। जिस भाजपा के बारे में कहा जाता था कि भाजपा और कहीं से भी कामयाब हो सकती है, लेकिन बंगाली मानुष से इसका मनोविज्ञान नहीं मिल सकता, उसी में धीरे-धीरे बंग मन को छूना शुरू कर दिया है। ऊपर दी गई सात नगरपालिकाओं में कुल मिलाकर 148 वार्ड हैं, जिनके लिए चुनाव हुए। सीपीएम किसी एक वार्ड में भी अपना प्रत्याशी नहीं जिता पाई, जबकि इनमें से कुछ नगरपालिकाएं ऐसी थीं , जिन्हें पूर्व में सीपीएम का गढ़ माना जाता था। विधानसभा के लिए होने वाले किसी चुनाव में हार जाना अपने आप में कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन प्रदेश भर में फैले 148 वार्डों में से कोई एक भी सीट न जीत पाना, बंगाल में सीपीएम की शोचनीय स्थिति को तो इंगित करता ही है, लेकिन इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि बंगाल में कम्युनिस्ट वहां के आम आदमी से कट चुके हैं। वे न तो बंगाल में बदलते युग को पढ़ पा रहे हैं और न ही उसकी कोशिश करते दिखाई देते हैं। हल्दिया को तो साम्यवादियों का पुराना अड्डा माना जाता था, लेकिन उसी हल्दिया ने तृणमूल को जिता दिया और कामरेड एक नायाब सीट के लिए तरसते रहे। लेकिन सोनिया कांग्रेस की हालत भी सीपीएम जितनी ही दयनीय रही। वह भी इन चुनावों में एक अदद सीट के लिए तरस कर रह गई। उसके प्रत्याशियों का वोट प्रतिशत तो कम्युनिस्टों के वोट प्रतिशत से भी कहीं कम निकला। पिछले कुछ महीनों से यह कहा जाने लगा था कि तृणमूल का आधार छिन रहा है, लेकिन ममता बनर्जी ने उन सभी विश्लेषकों का आकलन गलत सिद्ध कर दिया। बनर्जी ने अपना आधार और मजबूत किया है। वे जनता की नब्ज पहचानने में माहिर हो गईं। साम्यवादियों की लाज रखने के लिए ही बंगाल की जनता ने एक सीट फॉरवर्ड ब्लॉक के प्रत्याशी को दे दी। लेकिन पश्चिमी बंगाल की राजनीति पर गिद्ध दृष्टि रखने वालों के लिए इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को मिली सीटें आश्चर्य पैदा करने वाली हैं।

भाजपा को सीटें कोई ज्यादा नहीं मिलीं। उसे 148 में से कुल मिला कर छह सीटें ही प्राप्त हुई हैं, लेकिन कोलकाता के बंगला भाषी अखबारों से लेकर दिल्ली के अंग्रेजी भाषा के अखबारों में कोहराम मचा हुआ है कि प्रदेश में भाजपा आगे बढ़ रही है। यदि सीपीएम भी दस बीस सीटें ले जाती, तो इतना ज्यादा कोहराम न मचता। परंतु सीपीएम के दम तोड़ने के संकेत मिल रहे हैं और उसके नजदीक भाजपा का अंकुर फूट रहा हैं। लगता है भाजपा का और बंगाल का मानस मिलने लगा है। अब वह बड़ा बाजार से निकलकर बंगाल के भीतर घुस रही है। इसीलिए बंगाल का मीडिया चिल्ला रहा है कि बंगाल में भारतीय जनता पार्टी तेजी से दूसरी शक्ति के रूप में उभर रही है।

  कुछ समय पहले पश्चिमी बंगाल में दो लोकसभा और एक विधानसभा क्षेत्र मोंटेश्वर के लिए मतदान हुआ था। तब भी माना जा रहा था कि मुख्य लड़ाई तृणमूल और सीपीएम में होगी। सोनिया कांग्रेस ने पहले अपने बलबूते और उसके बाद तृणमूल के साथ मिल कर भी चुनाव लड़ कर देख लिया है। दोनों ही स्थितियों में उसकी स्थिति हाशिए पर की ही रही। भारतीय जनता पार्टी को तो कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने वहां दर्शकों में भी स्वीकार नहीं किया। उस पृष्ठभूमि में हुए उपचुनाव के परिणाम भी राजनीतिक पंडितों को चौंका गए थे। कूचबिहार लोकसभा सीट के लिए तृणमूल ने 59 प्रतिशत वोटों पर कब्जा जमाया था। भाजपा को तब 28.29 प्रतिशत मत मिले, जबकि वाम मोर्चा और सोनिया कांग्रेस की बात थी तो उन्हें क्रमशः 6.49 प्रतिशत और 2.49 प्रतिशत मत मिले थे। दूसरी सीट तमलुक की थी। वह सीट भी लगभग 60 प्रतिशत मत प्राप्त करके तृणमूल ने ही जीती, लेकिन जहां तक वाम मोर्चा और सोनिया कांग्रेस का ताल्लुक है, उनको प्राप्त मतों की संख्या 2014 के लोकसभा चुनावों के मुकाबले गिरकर क्रमशः 35.15 प्रतिशत से 21.62 प्रतिशत और 2.22 प्रतिशत से 1.52 प्रतिशत रह गई। भाजपा को  2014 के चुनावों में 6.45 प्रतिशत मत मिले थे, जो उप चुनावों में बढ़ कर 15.06 प्रतिशत हो गए थे। पश्चिम बंगाल में तीसरी मोंटेश्वर की सीट विधानसभा के लिए थी। वह भी तृणमूल ने लगभग 78 प्रतिशत मत हासिल करके जीत ली। वाममोर्चा यहां पिछले विधानसभा चुनावों में प्राप्त 44 प्रतिशत मतों से खिसक कर इस बार 11 प्रतिशत पर लुढ़क गया। भाजपा को पिछले विधानसभा चुनावों में 8.10 प्रतिशत मत मिले थे, जो उप चुनावों में कुछ बढ़कर 8.47 प्रतिशत पर पहुंच गए। सोनिया कांग्रेस की बंगाल में इन तीनों सीटों पर जमानत जब्त हो गई थी। उन तीन परिणामों को आधार बना कर कोई गंभीर टिप्पणी तो नहीं की जा सकती थी, लेकिन कुल मिला कर जनता तब भी ममता बनर्जी के साथ थी।

यह ठीक है कि ममता बनर्जी के किले को सेंध लगाने में कोई कामयाब नहीं हो रहा। उसका एक कारण विकल्पहीनता का होना है। तृणमूल को हटा कर बंगाल का मतदाता चुनाव में आखिर किस को वोट दे? सीपीएम को दोबारा वह सत्ता में लाना नहीं चाहता क्योंकि वह उनका तीस साल का कुशासन भोग चुका है। सोनिया कांग्रेस अब लगभग कोमा में जा चुकी है। उसको होश में लाने का प्रयास भला बंगाल के लोग क्यों करेंगे? ले दे कर बंगाल में अब एक ही पार्टी बचती है जो तृणमूल को टक्कर दे सकती है-वह भारतीय जनता पार्टी है। भाजपा पर अभी बंग मन का विश्वास जम नहीं रहा। उसी के कारण तृणमूल मजबूत दिखाई देती है। लेकिन नगरपालिकाओं के इन चुनावों ने दिखा दिया है कि पश्चिमी बंगाल में भाजपा बंगाली मानस को पढ़ने में निपुण हो गई है, इतना तो ममता बनर्जी भी जान गई होंगी।

ई-मेल : kuldeepagnihotri@gmail.com

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