Divya Himachal Logo May 22nd, 2017

वैचारिक लेख


मुक्त व्यापार से मुक्ति का बिगुल

NEWS(मार्टिन खोर)

साउथ सेंटर के कार्यकारी निरीक्षक हैं

सैद्धांतिक तौर पर देखें तो यदि इस वर्ष टीपीपी लागू नहीं हो पाता है तो अमरीकी राष्ट्रपति अगले वर्ष इसे संसद से पारित करवा सकते हैं, लेकिन ऐसा हो पाने की संभावना अत्यंत क्षीण है। अतएव टीपीपीए को इसी अलसाए सत्र में ही पारित करवाना होगा  अन्यथा यह हमेशा के लिए चर्चा से बाहर हो जाएगा। गौरतलब है कि नाटकीय ढंग से मुक्त व्यापार समझौतों के खिलाफ कम से कम उस अमरीका में जनमत बना है,जिसने व्यापार मुक्त व्यापार समझौतों की शुरुआत की थी…

अंतर प्रशांत साझेदारी समझौता (ट्रांस पेसिफिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट या टीपीपीए) पर इसी वर्ष फरवरी में 12 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते पर पहुंचने में पांच वर्ष का समय लगा था। साथ ही यह उम्मीद थी कि प्रत्येक देश द्वारा स्वीकृति प्रदान किए जाने के दो वर्ष के भीतर यह लागू हो जाएगा, परंतु अब इस विवादास्पद समझौते पर संकट के बादल छा गए हैं। त्रासदी यह है कि अमरीका जिसने इस समझौते की प्रक्रिया प्रारंभ की थी, वहीं इसे समाप्त करने पर तुला हुआ है। अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में टीपीपीए सर्वाधिक प्रमुखता वाला मुद्दा बन गया था। वैसे डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव अभियान का केंद्र बिंदु टीपीपीए का विरोध ही था। पूर्व उम्मीदवार बर्नी सेंडर्स, जो कि टीपीपीए विरोध के अगुआ रहे, का कहना है कि हमें टीपीपीए पर पुनः बातचीत नहीं करना चाहिए। इस उन्मुक्त, मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को नष्ट कर देना चाहिए, क्योंकि इससे हमारे यहां के पांच लाख रोजगार नष्ट हो जाएंगे। हिलेरी क्ंिलटन भी अपने विदेश मंत्री पद के दौरान के अभिमत के विपरीत जाकर अब टीपीपीए के खिलाफ हो गई थीं, परंतु उनके इस हृदय परिवर्तन को लेकर संदेह किया जा रहा था कि राष्ट्रपति बनते ही वह अपना रुख पुनः बदल लेंगी, परंतु क्लिंटन का कहना है कि मैं टीपीपीए खिलाफ हूं।

इसका अर्थ है चुनाव के पहले भी और बाद में भी इस बात की पूरी संभावना है कि दोनों उम्मीदवार इस प्रचलित धारणा को लेकर चिंतित हो रहे थे, जिसके अनुसार मुक्त व्यापार समझौतों से लाखों रोजगार समाप्त होते हैं, मजदूरी में ठहराव आता है और अमरीका समाज में लाभों का अनुचित वितरण होता है। राष्ट्रपति पद के इन दो उम्मीदवारों के अलावा दो अन्य खिलाड़ी और भी थे, जिन्होंने कि टीपीपीए की निर्यात के बारे में तय करना थो। ये थे राष्ट्रपति बराक ओबामा और अमरीकी कांग्रेस। ओबामा टीपीपीए के मुख्य पैरोकार रहे हैं।

उन्होंने अत्यंत उत्कटता से यह कहते हुए इसके पक्ष में तर्क दिए थे कि इससे आर्थिक लाभ होंगे, पर्यावरण एवं श्रम मानकों में सुधार होगा और एशियाई भौगोलिक राजनीति में अमरीका चीन से आगे निकल जाएगा, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली है। यह आवश्यक था कि अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले ओबामा जनवरी, 2017 के मध्य तक इसे अवश्य ही पारित करवा लेते। पिछले वर्ष इससे संबंधित एक फास्ट ट्रैक व्यापार अधिकारिता विधेयक बहुत कम बहुमत से पारित हो पाया था। अब जबकि यह ठोस टीपीपीए सदन के सामने आने वाला है तो कई सदस्यों के मत में परिवर्तन  आ रहा है। ऐसे कुछ सांसद जिन्होंने फास्ट ट्रैक विधेयक के पक्ष में मत दिया था उन्होंने संकेत दिया है कि टीपीपीए के पक्ष में मतदान नहीं करेंगे।

अधिकांश ड्रेमोक्रेट सांसदों ने संकेत दिया था कि वे टीपीपीए के खिलाफ हैं इसमें क्ंिलटन के साथ उपराष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे सीनेटर टिम कैनी भी शामिल थे, जिन्होंने फास्ट ट्रैक के पक्ष में मत दिया था। कार्यकारी समिति के सदस्य सेंडी लेविन का कहना है कि अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि सदन में इस वर्ष टीपीपीए को मत नहीं मिलेंगे। यदि प्रस्तावित ढीले-ढाले सत्र में इसे प्रस्तुत कर भी दिया जाता है तो यह गिर जाएगा। सदन के रिपब्लिकन नेताओं ने भी अपना विरोध जताया है। सीनेट में बहुमत के नेता मिच मॅक्कोमेल का कहना है राष्ट्रपति पद के अभियान ने एक ऐसा राजनीतिक वातावरण बना दिया था कि इस सत्र में टीपीपीए को पारित कराना वस्तुतः असंभव हो गया है। सदन के स्पीकर और रिपब्लिकन नेता पॉल डी रियान, जिन्होंने फास्ट ट्रैक विधेयक तैयार करने में मदद की थी, का कहना है कि इस बात का कोई कारण नजर नहीं आता कि इस सुस्ती भरे सत्र में टीपीपी को मतदान के लिए प्रस्तुत किया जाए, क्योंकि हमारे पास इसे पारित कर जीतने के लिए मत नहीं हैं। इस बीच सदन में छह रिपब्लिकन सीनेटरों ने अगस्त के प्रारंभ में ओबामा को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि इस सत्र में वह टीपीपी विधेयक लाने का प्रयास न करें। हालांकि ओबामा के लिए तस्वीर धुंधली नजर आ रही थी। उन्होंने कहा था कि चुनाव संपन्न हो जाने के बाद वह कांग्रेस को टीपीपी के पक्ष में मतदान करने के लिए मनवा लेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि बहुत से लोग सोचते थे कि वे सदन से फास्ट ट्रैक विधेयक पारित नहीं करवा पाएंगे, परंतु वे गलत साबित हुए। कांग्रेस को अपने पक्ष में लेने के लिए ओबामा को दक्षिण व वाम दोनों पक्षों को भरोसे में लेना पड़ा, जो कि टीपीपीए में कुछ विशिष्ट मुद्दों जैसे जैविक औषधियों पर एकाधिकार तथा आईएसडीएस (निवेशक-राष्ट्र विवाद निपटारा) को शामिल करवाना चाहते थे। उन्हें संतुष्ट करने के लिए ओबामा को उन्हें भरोसा दिलवाना पड़ा, जो वे चाहते थे, उसे किसी न किसी तरह से प्राप्त किया जा सकता था, भले ही वह टीपीपीए का वैधानिक हिस्सा न भी हो।

वह इसे द्विपीक्षय समझौतों के माध्यम से पाने का प्रयास करेंगे या इस बात पर जोर देंगे कि कुछ देश टीपीपीए के प्रावधानों से इतर जाकर कुछ अतिरिक्त करें। वैसे भी टीपीपीए के दायित्वों को पूरा कर पाने के लिए अमरीका का प्रमाणन एक जरूरी शर्त है। कांग्रेस को खुश करने के लिए ओबामा टीपीपीए की कुछ विशिष्ट धाराओं पर सैद्धांतिक रूप से पुनः बातचीत भी कर सकते थे, लेकिन अन्य टीपीपी देशों को यह विकल्प अस्वीकार्य हो सकता था।

गत वर्ष जून में मलेशिया ने टीपीपीए की किसी भी धारणा पर पुनः समझौते से इनकार कर दिया था। तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय व्यापार  एवं उद्योग मंत्रालय की महासचिव डा. रेबेका फातिमा स्टामारिया का कहना है कि अमरीकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों ने भले ही इस तरह के संकेत दिए थे, लेकिन टीपीपीए पर पुनः वार्ता का प्रश्न ही नहीं उठता। सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली हसिन लूंग ने अपनी हालिया वाशिंगटन यात्रा के दौरान टीपीपीए के किसी भी हिस्से पर पुनर्विचार की संभावना को सिरे से नकारते हुए कहा था कि भले ही कुछ सांसद ऐसा चाहते हों यह संभव नहीं है। जनवरी में कनाडा के व्यापार मंत्री क्रिस्टिया फ्रीलेंड ने कहा था कि टीपीपी पर पुनर्वाता संभव नहीं है। जापान ने भी पुनर्वाता की संभावना को नकार दिया है। 12 देशों ने इसी वर्ष फरवरी में समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं और इसे लागू करने के लिए दो वर्षों का समय दिया है। सैद्धांतिक तौर पर देखें तो यदि इस वर्ष टीपीपी लागू नहीं हो पाता है तो अमरीकी राष्ट्रपति अगले वर्ष इसे संसद से पारित करवा सकते हैं, लेकिन ऐसा हो पाने की संभावना अत्यंत क्षीण है। अतएव टीपीपीए को इसी अलसाए सत्र में ही पारित करवाना होगा  अन्यथा यह हमेशा के लिए चर्चा से बाहर हो जाएगा। गौरतलब है कि नाटकीय ढंग से मुक्त व्यापार समझौतों के खिलाफ कम से कम उस अमरीका में जनमत बना है,जिसने व्यापार मुक्त व्यापार समझौतों की शुरुआत की थी।

विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं? निःशुल्क रजिस्टर करें !

May 22nd, 2017

 
 

जरूरी है अन्न के सदुपयोग का संस्कार

जरूरी है अन्न के सदुपयोग का संस्कार(किशन चंद चौधरी) लेखक, सद्द बरग्राम, कांगड़ा से हैं भोजन की बर्बादी रोकने के लिए लोगों के आचार-विचार, व्यवहार में बदलाव लाने से ही हमारी वास्तविक जीत संभव होगी। देश को समृद्ध बनाना है, तो हमें इन बातों पर अमल करना होगा। देश परमाणु शक्ति […] विस्तृत....

May 22nd, 2017

 

रचनात्मक राजनीति के तीन साल

रचनात्मक राजनीति के तीन सालडा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति को बदलने और महात्मा गांधी के उपरांत पहली बार उसे फिर से सामाजिकता और रचनात्मकता से जोड़ने की पहल की है। शायद कुछ लोगों को ध्यान होगा कि […] विस्तृत....

May 20th, 2017

 

सरकारी अनदेखी के शिकार चित्रकार

सरकारी अनदेखी के शिकार चित्रकारलेखराम ठाकुर लेखक, सुंदरनगर, मंडी से हैं हिमाचल प्रदेश में उच्चकोटि के चित्रकार हैं, जो मूल रूप से हिमाचली हैं। इनके चित्रों की शैली राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के चित्रकारों की शैलियों के समकक्ष और उत्कृष्ट है, परंतु प्रदेश की गलत एवं चित्रकार विरोधी नीतियां […] विस्तृत....

May 20th, 2017

 

कश्मीर में कल्पना और नवाचार की जरूरत

कश्मीर में कल्पना और नवाचार की जरूरतप्रो. एनके सिंह लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं भीड़ को यह महसूस कराया जाना चाहिए कि अराजकता उसके हित में नहीं है और इसके कारण उन्हें जनधन की भयंकर हानि उठानी पड़ सकती है। उन्हें इस बात का एहसास कराया जाना […] विस्तृत....

May 19th, 2017

 

हैंडबाल को हाथोंहाथ लेता हिमाचल

हैंडबाल को हाथोंहाथ लेता हिमाचलभूपिंदर सिंह लेखक, राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक हैं देखते हैं हिमाचल हैंडबाल को प्रशासन तथा प्रशिक्षण की यह जोड़ी कितनी ऊंचाई तक ले जाती है, जहां इस वर्फ के प्रदेश की संतानें अधिक से अधिक बार तिरंगे को ऊपर उठाने में अपना योगदान देती हैं। खिलाड़ी […] विस्तृत....

May 19th, 2017

 

अभी अप्रासंगिक नहीं हुए केजरीवाल

अभी अप्रासंगिक नहीं हुए केजरीवालपीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं राजनीति में सबको आश्चर्यचकित कर देने वाले एक और शख्स ऐसे हैं, जिनके जिक्र के बिना राजनीति की रणनीति की चर्चा अधूरी रहेगी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने राजनीति की परिभाषा बदल […] विस्तृत....

May 18th, 2017

 

आग बुझाने के जमीनी रास्ते

आग बुझाने के जमीनी रास्तेकिशोरी लाल कौंडल लेखक, सेवानिवृत्त वनाधिकारी हैं जंगलों में आगजनी के दौरान महत्त्वपूर्ण सहयोग करने वाले वन कर्मियों, ग्राम पंचायतों और व्यक्ति विशेष को प्रदेश स्तर पर सम्मानित किया जाना चाहिए। वन रक्षकों के पदों को बढ़ाना चाहिए और प्रोत्साहित करना चाहिए। मात्र सेटेलाइट से […] विस्तृत....

May 18th, 2017

 

फिजूलखर्ची को न मिले पनाह

फिजूलखर्ची को न मिले पनाहगुरुदत्त शर्मा लेखक, शिमला से हैं प्रदेश के आधे से ज्यादा सरकारी उपक्रम घाटे में चल रहे हैं और सभी निगमों, बोर्डों का घाटा अब तक वर्ष (2015-16) में 3167 करोड़ तक पहुंच गया है। निरंतर रुग्णता की ओर अग्रसर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के […] विस्तृत....

May 17th, 2017

 

‘आप’ की उल्टी गिनती

‘आप’ की उल्टी गिनतीललित गर्ग लेखक, स्वतंत्र पत्रकार हैं आप एवं केजरीवाल के पतन का मुख्य कारण नकारात्मक, अवसरवादी, स्वार्थी और झूठ पर आधारित राजनीति है। इसका एक बड़ा कारण अपने स्वार्थ एवं सत्ता की भूख भी है। राष्ट्र की मजबूती के लिए संकल्पित होने का ढोंग करने […] विस्तृत....

May 17th, 2017

 
Page 1 of 41712345...102030...Last »

पोल

क्या कांग्रेस को हिमाचल में एक नए सीएम चेहरे की जरूरत है?

View Results

Loading ... Loading ...
 
Lingual Support by India Fascinates