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आस्था


शनि के कोप से बचाती है शनि अमावस्‍या

ज्येष्ठ महीने की अमावस्या, शनिदेव की उत्पत्ति की तिथि है। शनिदेव की जयंती के दिन  विधि-विधान  के साथ उनका पूजन करने से जीवन में आने वाली विभिन्न कठिनाइयों का शमन होने लगाता है और सफलता मिलने लगती है…

शनि के कोप से बचाती है शनि अमावस्‍याaशास्त्रों के अनुसार ज्येष्ठ माह की अमावस्या को शनिदेव की उत्पत्ति हुई थी, इसीलिए इस दिन शनि जयंती मनाई जाती है। माना जाता है कि इस दिन शनिदेव की पूजा करने से शनि के कोप का भाजन बनने से बचा जा सकता है, यदि पहले से ही कोई शनि के प्रकोप को झेल रहा है तो उसके लिए भी यह दिन बहुत ही कल्याणकारी हो सकता है। इस दिन विधि-विधान के साथ श्रद्धापूर्वक शनिदेव का पूजन करने से शनि की कृपा होती है।

पूजन विधिः

शनिदेव का पूजन भी शास्त्रीय तरीके अन्य देवी-देवताओं के समान ही किया जाता है। सर्वप्रथम, प्रातःकाल उठकर शौचादि से निवृत्त होकर स्नानादि से शुद्ध हो जाएं। लकड़ी के एक पाट पर काला वस्त्र बिछाकर उस पर शनिदेव की प्रतिमा या तस्वीर या फिर एक सुपारी रखकर उसके दोनों और शुद्ध घी व तेल का दीपक जलाकर धूप जलाएं। शनि देवता के इस प्रतीक स्वरूप को पंचगव्य, पंचामृत, इत्र आदि से स्नान कराएं। इसके बाद अबीर, गुलाल, सिंदूर, कुमकुम व काजल लगाकर नीले या काले फूल अर्पित करें।

इमरती व तेल में तली वस्तुओं का नैवेद्य अर्पण करें। इसके बाद श्रीफल सहित अन्य फल भी अर्पित करें। पंचोपचार पूजन के बाद शनि मंत्र का कम से कम एक माला जप भी करना चाहिए। माला जपने के पश्चात शनि चालीसा का पाठ करें व तत्पश्चात शनि महाराज की आरती भी उतारनी चाहिए। शनि देव की पूजा करने के दिन सूर्योदय से पहले शरीर पर तेल मालिश कर स्नान करना चाहिए। शनि मंदिर के साथ-साथ हनुमान जी के दर्शन भी जरूर करने चाहिए। शनि जयंती या शनि पूजा के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इस दिन यात्रा को भी स्थगित कर देना चाहिए।  किसी जरूरतमंद गरीब व्यक्ति को तेल में बने खाद्य पदार्थों का सेवन करवाना चाहिए।  गाय और कुत्तों को भी तेल में बने पदार्थ खिलाने चाहिए। बुजुर्गों व जरूरतमंदों की सेवा और सहायता भी करनी चाहिए। सूर्यदेव की पूजा इस दिन न ही करें तो अच्छा है। शनिदेव की प्रतिमा या तस्वीर को देखते समय उनकी आंखों में नहीं देखना चाहिए। शनिदेव के प्रकोप से मुक्ति के लिए भगवान शिव की पूजा-अर्चना भी विशेष सहायक होती है। अतः इस दिन यदि भूतभावन भगवान शिव का किसी मंदिर में जाकर दर्शन -पूजन करें।

शनिदेवःपरिचय एवं प्रभाव

शनिदेव,भगवान सूर्य तथा छाया के पुत्र हैं। इन्हें कर्मफल दाता माना है। यह अपना कार्य पूरी निष्पक्षता और समर्पण के साथ करते हैं। उनके निर्णय में कोई दया भाव नहीं दिखता, इसीलिए इनकी गिनती क्रूर ग्रहों में की जाती है। शनि के अधिदेवता प्रजापति ब्रह्मा और प्रत्यधिदेवता यम हैं। इनका वर्ण कृष्ण है और यह गिद्ध की सवारी करते हैं। फलित ज्योतिष के अनुसार शनि को अशुभ माना जाता है व 9 ग्रहों में शनि का स्थान सातवां है। यह एक राशि में तीस महीने तक रहते हैं तथा मकर और कुंभ राशि के स्वामी माने जाते हैं। शनि की महादशा 19 वर्ष तक रहती है। शनि की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी से 95 गुना ज्यादा मानी जाती है। माना जाता है कि इसी गुरुत्वबल के कारण हमारे अच्छे और बुरे विचार चुंबकीय शक्ति से शनि के पास पंहुचते हैं और उनका कृत्य अनुसार परिणाम भी जल्द मिलता है। यदि आप सद्कर्म करते हैं, किसी के साथ बुरा व्यवहार नहीं करते, किसी के साथ अन्याय नहीं करते, किसी पर कोई जुल्म अत्याचार नहीं करते, तो आपको शनि से डरने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि शनि का दंडविधान कर्मों पर ही आधारित है।

2017 में कब है शनि जयंती

शनि जयंती पूरे उत्तर भारत में पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह की अमावस्या को मनाई जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह तिथि 25 मई को है। वहीं दक्षिणी भारत के अमावस्यांत पंचांग के अनुसार शनि जयंती वैशाख अमावस्या को मनाई जाती है। संयोगवश उत्तर भारत में ज्येष्ठ अमावस्या को शनि जयंती के साथ-साथ वट सावित्री व्रत भी रखा जाता है।

शनि जयंती तिथि – 25 मई 2017

अमावस्या तिथि आरंभ – 05:07 बजे (25 मई 2017

अमावस्या तिथि समाप्त – 01:14 बजे (26 मई 2017)

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