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दखल


बरसात को कितना तैयार हिमाचल

प्रदेश में हर साल बरसात कहर बनकर  टूट पड़ती है। मूसलाधार बारिश-बादल फटने के अलावा भू-स्खलन से भी जान-माल का नुकसान होता है। बरसात से पहले हर बार प्रशासन तैयारियां करता है, लेकिन कुदरत के आगे सारे इंतजाम धराशायी हो जाते हैं। अभी बरसात सिर पर है तो मानसून से निपटने के लिए कितना तैयार है हिमाचल, बता रहे हैं स्टेट ब्यूरो चीफ सुनील शर्मा…

बरसात हिमाचल में कहर न बरपा सके, लिहाजा सरकार ने विभागीय स्तर पर समीक्षा कर दी है। सचिव स्तर के सभी अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि फील्ड में मानसून से पहले व्यवस्था चाक-चौबंद होनी चाहिए।  मुख्य सचिव वीसी फारका ने सभी महकमों के आला अफसरों की बैठक कर मानसून पूर्व तैयारियों की जहां समीक्षा की, वहीं उन्होंने सभी उपायुक्तों को एहतियाती कदम उठाने के निर्देश देते हुए संबंधित विभागों को 135 करोड़ रुपए की राशि जारी की। मुख्य सचिव ने सभी  विभागों को मानसून से पूर्व नालों व जल स्रोतों से गाद निकालने, जल स्रोतों से पानी की निकासी को सुनिश्चित बनाने तथा बाढ़ संभावित मैदानों से अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए। मुख्य सचिव ने उपायुक्तों को पर्यटकों-ट्रैकरों तथा आम लोगों में एहतियाती कदम उठाने के लिए बरती जाने वाली आवश्यक सावधानी के बारे में जागरूक करने संबंधी दिशा-निर्देश पर्चे वितरित करने को कहा है। इसके अलावा जल विद्युत परियोजनाओं को पानी छोड़ने से पहले जानकारी देने के निर्देश दिए। इसके अलावा सड़क, चिकित्सा, दूरसंचार व्यवस्था को चाक-चौबंद रखने के निर्देश दिए गए हैं। अतिरिक्त मुख्य सचिव राजस्व ने  जिला आपात  संचालन केंद्रों के नियंत्रण कक्षों को क्रियाशील बनाने तथा नित्यप्रति नुकसान की रिपोर्ट तत्काल से प्रस्तुत करने की आवश्यकता पर बल दिया।

किस विभाग को कितना पैसा

आपदा प्रबंधन निधि तथा राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया निधि से उपायुक्तों तथा संबंधित विभागों को 63.23 करोड़ रुपए की राशि जारी की है। इसमें लोक निर्माण विभाग को 25 करोड़ रुपए, सिंचाई एवं जनस्वास्थ्य विभाग को पांच करोड़, विद्युत बोर्ड को दो करोड़, कृषि व बागबानी विभागों को 1.2 करोड़ रुपए की राशि सहित कुल 35 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं। उन्होंने कहा कि उपायुक्तों को तत्काल राहत, अनुग्रह राशि, पेयजलापूर्ति तथा शहरी स्थानीय निकायों को सहायता के लिए 28.23 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं।

व्हाट्सऐप पर रखें तालमेल

मुख्य सचिव ने उपायुक्तों को संबंधित हितधारकों को सूचना के आदान-प्रदान तथा बेहतर समन्वय के लिए व्हाट्सऐप समूह सृजित करने की सलाह दी। मौसम संबंधी जानकारी मीडिया में आम जन के लिए नियमित रूप से दी जानी चाहिए। दूरभाष सेवा प्रदाताओं को राज्य में सैलानियों के प्रवेश पर उनके मोबाइल पर प्राकृतिक व मानव प्रभावी आपदाओं के बारे आवश्यक एसएमएस संदेश जारी करने को कहा। श्री फारका ने स्वास्थ्य विभाग को महामारी तथा जल जनित रोगों की रोकथाम के लिए तत्काल आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए।

इन नदियों-खड्डों का हो तटीकरण

सुकेती, स्वां, सीर, पब्बर, छौंछ खड्डों के तटीकरण की सख्त आवश्यकता है। इन सभी की फेहरिस्त में से स्वां के तटीकरण का कार्य अभी भी अधूरा पड़ा है, जबकि अन्य  में डीपीआर तो बनी हैं, मगर वित्तीय अभाव में ये सिरे नहीं चढ़ पा रही हैं।

सिल्ट की दिक्कत

हर साल बरसात के दौरान नदियों में सिल्ट बढ़ती है, जंगलों में अवैध कटान के चलते और प्रोजेक्ट निर्माण के साथ-साथ अवैज्ञानिक खनन, सड़कों के अंधाधुंध अवैज्ञानिक निर्माण, ब्लास्टिंग से दरकते पहाड़ों की वजह से भू-क्षरण व भू-स्खलन की दर बढ़ती जा रही है। इन सब कारणों से नदियों व खड्डों में सिल्ट समस्या बढ़ जाती है।

नहीं बनीं ग्राम आपदा प्रबंधन समितियां

आपदा प्रबंधन से जुड़े विशेषज्ञों ने उस विलेज डिजास्टर मैनेजमेंट कमेटी को गठित करने का फैसला लिया था, जिसकी परिकल्पना उन्होंने ही कुछ वर्षों पहले की थी। मगर किन्हीं कारणों से यह सिरे नहीं चढ़ पाई थी।  दो वर्ष पहले किन्नौर के पूह से इस विलेज मॉडल की शुरुआत की गई। वहां आपदा प्रबंधन से जुड़े विशेषज्ञों द्वारा इस कमेटी का गठन किया गया था। इसमें सेना के स्थानीय रिटायर्ड अधिकारी, जवान व स्थानीय लोग शामिल किए गए हैं। स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ पुलिस व अन्य अर्द्धसैनिक बलों के उच्चाधिकारी भी इसमें शामिल किए गए हैं।  प्रदेश के हर संवेदनशील क्षेत्र के गांवों में इस तरह की कमेटियों को गठित करने की यह मुहिम किन्नौर के पूह से शुरू तो की गई थी। मगर अन्य जिलों में यह साकार रूप नहीं ले सकी।  हिमाचल में भी अन्य राज्यों की ही तर्ज पर राज्य में दो निगरानी एजेंसियां हैं। एक मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में स्टेट डिजास्टर मैनेमेंट अथारिटी, दूसरी स्टेट एग्जीक्यूटिव कमेटी, जिसकी अध्यक्षता चीफ सेक्रेटरी करते हैं। जिलों में यह कार्य डीसी की अध्यक्षता में होता है। हैरानी की बात है कि कभी भी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया गया कि प्रोजेक्ट प्रबंधकों ने ऐसे कोई कदम उठाए हैं या नहीं, जबकि वर्ष 2000 और 2004 में सतलुज में आई बाढ़ व पाराछू के तांडव के बाद यह अनिवार्य होना चाहिए था।

प्रदेश के संवेदनशील जिले

शिमला, कुल्लू, किन्नौर, चंबा और कांगड़ा जिला अति संवेदनशील है। यहां हर बरसात में लाखों का नुकसान हो जाता है।

सबसे बड़ी खामियां

किसी भी प्रदेश में आपदा प्रबंधन के लिए एमर्जेंसी आपरेशन सेंटर, स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फोर्स, कम्युनिकेशन सिस्टम और अर्ली वार्निंग सिस्टम आवश्यक रहते हैं, मगर हिमाचल में ये सब हैं ही नहीं।

न सेंसरयुक्त कैमरे, न खोजी कुत्ते

विशेषज्ञों के मुताबिक किसी भी आपदा के वक्त सबसे पहले जमीन के ऊपर घायल लोगों को बचाने की व प्राथमिक उपचार जुटाने की जद्दोजहद रहती है। दूसरे चरण में मकानों के अंदर फंसे वे लोग होते हैं, जिनके बारे में जानकारी ही नहीं रहती कि वे जीवित हैं या घायल। इन सबकी जांच के लिए सेंसर्ज व सेंसरयुक्त कैमरा आवश्यक होता है, जो हिमाचल के किसी भी विंग या एजेंसी के पास है ही नहीं। यहां तक कि आपदा से जुड़े किसी भी विंग के पास खोजी कुत्ते भी नहीं हैं।

विभागीय प्लान तक तैयार नहीं

आपदा प्रबंधन की मजबूती के लिए राज्य सरकार ने प्रदेश के विभिन्न महकमों को आपदा प्रबंधन प्लान तैयार करने के निर्देश दे रखे हैं, मगर किसी भी महकमे ने अब तक चुस्ती नहीं दिखाई है।

अर्ली वार्निंग सिस्टम के लिए अभी और वक्त लगेगा

मौसम विभाग के निदेशक मनमोहन सिंह का कहना है कि प्रदेश में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने में अभी वक्त लगेगा। इसके लिए कार्रवाई चल रही है।

लोक निर्माण विभाग प्रशासन जिम्मेदार

किसी भी आपदा के दौरान जिला प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है। चूंकि जिला आपदा प्रबंधन समितियां उपायुक्त की ही अध्यक्षता में गठित होती हैं। जिनमें लोक निर्माण, आईपीएच, स्वास्थ्य, विद्युत, पुलिस व गृह रक्षा विभाग के अधिकारी शामिल रहते हैं। सड़कें खोलने की जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग के सुपुर्द रहती है।  बरसात के दौरान सरकार पहले ही अधीक्षण अभियंता व अधिशाषी अभियंता स्तर के अधिकारियों को निर्देश जारी कर देती है कि कहीं भी यदि सड़क अवरुद्ध हो, तो उसे युद्ध स्तर पर कार्य करते हुए 24 घंटे के अंदर खोला जाए। संवेदनशील इलाकों में ज्यादा मशीनरी मुहैया करवाई जाती है।

हिमाचल को हर साल 1000 करोड़ की चपत

हिमाचल में बरसात हर वर्ष कहर बरपाती है। हिमाचल में औसतन 1000 करोड़ का नुकसान हो जाता है। बादल फटने की घटनाओं से ही अकेले 300 से 400 करोड़ का नुकसान होता है। मिसाल के तौर पर पिछले वर्ष 858 करोड़ का नुकसान आंका गया। केंद्र सरकार को इसकी रिपोर्ट भेजी गई। केंद्रीय राहत दल हिमाचल भी आया, मगर हिमपात के सीजन में गिनती के स्थानों के दौरे करने के बाद यह दल सीधे दिल्ली लौट गया। हालांकि हिमाचल में इस दल ने लोगों से भी बात की। नुकसान की रिपोर्ट भी ली, मगर केंद्र भरपाई नहीं कर पाया। केंद्र सरकार हर साल औसतन 150 से 200 करोड़ की ही भरपाई करती है, वह भी लेटलतीफी से। पिछले वर्ष प्रदेश को 858 करोड़ का नुकसान हुआ। बरसात ने 40 लोगों को लील लिया। किए गए आकलन के अनुसार लोक निर्माण विभाग को 595 करोड़ का नुकसान हुआ। आईपीएच को 151 करोड़, विद्युत को 70 करोड़, कृषि एवं बागबानी को 27 करोड़, जबकि हाउसिंग को 15.27 करोड़, पीडब्ल्यूडी को खासी चपत सहनी पड़ी।  राजस्व विभाग की तरफ से जिला स्तर पर जो आकलन किया गया, उसके मुताबिक शिमला को 124 करोड़, सोलन को 28.60 करोड़, सिरमौर को 17.87 करोड़, किन्नौर को 10 करोड़, लाहुल-स्पीति को तीन करोड़, मंडी को 93.29 करोड़, बिलासपुर को 28.70 करोड़, हमीरपुर को 32.53 करोड़, ऊना को 23.86 करोड़, कांगड़ा को 180 करोड़, चंबा को 36.10 करोड़, कुल्लू को 17.15 करोड़ के नुकसान का आकलन किया गया था।

यहां होता है क्षमता निर्माण

प्रदेश के हिप्पा, एससीआरटी सोलन में आपदा प्रबंधन के लिए क्षमता निर्माण पर आधारित कार्यशालाएं आयोजित की जाती है। हिमाचल के लिए आपदा विशेषज्ञ इन संस्थानों में अधिकारियों को प्रशिक्षित करते हैं, जबकि अधिकारी आगे स्कूलों व कालेजों के छात्रों को प्रशिक्षण देते हैं।  अतिरिक्त मुख्य सचिव राजस्व तरुण श्रीधर का कहना है कि प्रदेश में बरसात से पूर्व व्यवस्थाओं की समीक्षा की गई है। राज्य स्तर पर 24 घंटे नियंत्रण कक्ष कार्यरत है। जिला स्तर पर भी 24 घंटे काम कर रहे हैं। लोगों की मदद के साथ-साथ सूचनाओं का आदान-प्रदान इन्हीं कक्षों के माध्यम से किया जा रहा है।

पलभर में सब कुछ हो जाता है तबाह

बादल फटना यानी किसी क्षेत्र विशेष में कुछ समय तक बारिश का लगातार तेज गति से होना रहता है। इस घटना में बारिश के साथ कभी-कभी गरज के साथ ओले भी पड़ते हैं। सामान्यतः बादल फटने के कारण सिर्फ कुछ मिनट तक मूसलाधार बारिश होती है, मगर इस दौरान इतना पानी बरसता है कि क्षेत्र में बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। बादल फटने की घटना पृथ्वी से 15 किलोमीटर की ऊंचाई पर घटती है। इसके कारण होने वाली वर्षा लगभग 100 मिलीमीटर प्रति घंटा की दर से होती है। कुछ ही मिनट में 2 सेंटीमीटरसे अधिक वर्षा हो जाती है, जिस कारण भारी तबाही होती है।

…तो ऐसे कहर बरपाते हैं बादल

मौसम विज्ञान के अनुसार जब बादल भारी मात्रा में आर्द्रता यानी पानी लेकर आसमान में चलते हैं और उनकी राह में कोई बाधा आ जाती है, तब वे अचानक फट पड़ते हैं, यानी संघनन बहुत तेजी से होता है। इस स्थिति में एक सीमित क्षेत्र में कई लाख लीटर पानी एक साथ पृथ्वी पर गिरता है, जिसके कारण उस क्षेत्र में तेज बहाव वाली बाढ़ आ जाती है। इस पानी के रास्ते में आने वाली हर वस्तु क्षतिग्रस्त हो जाती है। हिमाचल के संदर्भ में देखें तो हर साल मानसून के समय नमी को लिए हुए बादल उत्तर की ओर बढ़ते हैं, लिहाजा हिमालय पर्वत एक बड़े अवरोधक के रूप में सामने पड़ता है। जब कोई गर्म हवा का झोंका ऐसे बादल से टकराता है, तब भी उसके फटने की आशंका बढ़ जाती है।

बादल फटने के कारण

हरित पट्टी के लगातार घटने, हाइडल प्रोजेक्ट्स के निर्माण के लिए पेड़ों का कटान, शहरीकरण का बढ़ना, ग्रामीण क्षेत्रों में खेती के लिए जंगलों पर दबाव, कई ऐसे कारण हैं, जिनसे बरसात के दौरान गर्म हवा क्षेत्र विशेष में बादल फटने का कारण बनती है।

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