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संपादकीय


राजनीतिक हाजिरी के युद्ध

भाजपा संगठन का परिचय हमेशा बेहतर ढंग से होता है और इसी अंदाज में चंबी मैदान का भगवा धरातल काफी विस्तृत व्याख्या करता रहा। हिमाचली चुनाव में भाजपा का आगाज हालांकि पहले ही हो चुका है, लेकिन कांगड़ा परिक्रमा में अरुण जेटली का सान्निध्य मिला, तो नारे अवश्य ही शीतकालीन प्रवास पर आई सरकार के कान तक भी पहुंचे होंगे। इसलिए चंबी मैदान का मूड सरकार की नीयत व नीतियों को कोस कर भी अशांत रहा तथा सारी तोपें मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के अस्तित्व के खिलाफ शोले उगलती रहीं। भाजपा की जीत का मूलमंत्र भी यही है कि कांग्रेस वीरभद्र विहीन हो जाए और कमोबेश यही सियासी युद्ध पिछले एक दशक की राजनीतिक पैरवी माना जाएगा। जाहिर है हिमाचल में भाजपा के सांस्कारिक उदय का एक लंबा इतिहास है और इसके साथ ही चार सरकारों का रिपोर्ट कार्ड भी नत्थी है, अतः पांचवें फलक पर परीक्षण की जटिलताएं भी कम नहीं हैं। इसे हम एक इत्तफाक नहीं मान सकते कि जब भाजपा का त्रिदेव हुंकारा सुनिश्चित हुआ, तभी कांगड़ा के प्रवास पर मुख्यमंत्री पहुंचे, अलबत्ता यह मानना पड़ेगा कि इस समय प्रदेश राजनीति की सबसे बड़ी हाजिरी यहीं लग रही है। त्रिदेव सम्मेलन की हिमाचली परिपाटी में भाजपा अपने कुनबे को एकत्रित व संगठित कर रही है और यह एक तरह से आंतरिक शक्ति और आत्म विश्लेषण की खुरदरी जमीन भी है। बेशक अपने आधार पर भाजपा की मौलिकता में, केंद्र के रुतबे का प्रसार चंबी मैदान पर देखा गया और यह भी कि देश के वित्त मंत्री पार्टी की माटी और पार्टी की धरती पर खड़े हुए। ऐसे में हिमाचल की निगाहें आने वाले केंद्रीय बजट पर रहेंगी और यह एक सत्य है कि प्रदेश सियासत करता  है, लेकिन आर्थिक संसाधन केंद्र देता है। हालांकि त्रिदेव सम्मेलन में हिमाचल की भावी आशाओं का अलख नहीं सुना गया, फिर भी सांसद शांता कुमार द्वारा चंबा के सीमेंट प्लांट का जिक्र एक फरियाद की मानिंद प्रदेश के जज्बे का इजहार है। देखना यह होगा कि जब चंबी रैली का आक्रोश लूट कर मुख्यमंत्री वीरभद्र अपने कार्यक्रमों में उदारता की चांदी बांटते रहे, तब केंद्र के वित्त मंत्री के पास इसके जवाब के लिए कितना विशाल बजट और हिमाचल का हिसाब होता है। हम भाजपा की दृष्टि में कहां खड़े हैं, यह आने वाला केंद्रीय बजट बताएगा। फिलहाल मुख्यमंत्री की घोषणाओं से उपजी आशा-आशंका और राजनीतिक कयास व किस्सों के बीच मुकाबला जारी है। इसलिए त्रिदेव की परिक्रमा में सजे पंडाल सबसे अधिक एक व्यक्ति को ललकारते रहे और यहीं से निकली चुनावी कसरतें सीधे वीरभद्र सिंह के अखाड़े से मुखाबित हैं। वीरभद्र सिंह के खिलाफ आरोपों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि हर वक्ता को कोई न कोई निशाना साधना था, लेकिन कांगड़ा की सरकारी घोषणाएं राजनीति की सबसे बड़ी जंग निर्धारित कर रही हैं। अतीत और भविष्य के बीच चंबी का सम्मेलन भाजपा के सामर्थ्य और समर्थन की तस्वीर जैसा रहा और जहां हर तकरीर के साथ रणनीतिक कौशल भी शामिल रहा। खास तौर पर कार्यकर्ताओं के लिहाज से पंजाब के साथ लगते इस हिमाचल में भाजपा की शक्ति का परिचय और दस्तूर स्पष्ट हुआ। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती के मुताबिक अगर जीत-हार का अंतर चार फीसदी मतों का ही है, तो पार्टी की मेहनत का संगठनात्मक जोश काफी कुछ कर सकता है। कांग्रेस के भीतर अपने दबाव और अशांति हो सकती है, लेकिन भाजपा की रणनीति में वीरभद्र सिंह से टकराना सबसे बड़ी चुनौती है। चुनाव से पूर्व कांगड़ा क्षेत्र में वीरभद्र सिंह सरकार के मायने वर्तमान शीतकालीन प्रवास में निरंतर बढ़े हैं और अब जबकि बात दूसरी राजधानी तक पहुंच गई, तो इसके सियासी बिंदुओं को भाजपा नजरअंदाज नहीं कर सकती, क्योंकि सबसे बड़ा चुनावी महाभारत यहीं होगा।

January 21st, 2017

 
 

सांप्रदायिक धु्रवीकरण की चिंता

राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) नेता एवं अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को ट्वीट कर जानना चाहा था कि आखिर गठबंधन का क्या तय किया गया? अखिलेश ने जवाब तो नहीं दिया, लेकिन अपनी रणनीति के मुताबिक, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद […] विस्तृत....

January 21st, 2017

 

शीतकालीन राजधानी के शिलालेख

शिमला की बर्फबारी के बीच सरकार के कांगड़ा प्रवास पर होना अपने आप में किसी राजधानी के सबब से कम नहीं, फिर भी मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने पत्ते खोलते हुए धर्मशाला में अपने मुकाम को नया नाम दिया। प्रतीकात्मकता का प्रभाव जीवन के हर पहलू […] विस्तृत....

January 20th, 2017

 

‘मोदी कांग्रेस’ में परिवारवाद !

बुजुर्ग कांग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी भाजपा में शामिल हुए। यह जितनी बड़ी खबर थी, उतनी ही हास्यास्पद और सवालिया भी। लेकिन मीडिया में छीछालेदर के बाद सूत्रों के जरिए खबर आई कि तिवारी नहीं, उनके बेटे रोहित शेखर भाजपा में शामिल हुए हैं। अलबत्ता […] विस्तृत....

January 20th, 2017

 

सिद्धू की नई पिच

लगातार मुलाकातों और अटकलों के बाद अंततः नवजोत सिंह सिद्धू कांग्रेस में शामिल हो गए। बीते चार-पांच दिनों में उनकी कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकातें हुईं और राहुल ने माला पहनाकर सिद्धू को कांग्रेस का हिस्सा बना दिया। दरअसल सिद्धू सोच-विचार के स्तर पर […] विस्तृत....

January 19th, 2017

 

कांग्रेसी रगड़ की चिंगारियां

हिमाचली राजनीति के जिस छोर पर कांग्रेस खड़ी है, वहां नायक और नेतृत्व में वजन तोला जा रहा है। हालांकि यह पहला अवसर नहीं है कि अपने ही रक्त में कांग्रेसी पहचान के कतरों को विभाजित करके देखा गया हो, इससे पूर्व भी सत्ता के […] विस्तृत....

January 19th, 2017

 

बेटा ‘दंगल’ जीता, बाप चित

राजनीति में रिश्ते बेमानी होते हैं। खून पानी हो जाता है। शाहजहां और औरंगजेब की उपमाएं दी जाने लगती हैं। मुलायम सिंह तो वैसे भी औरंगजेब को अपना आदर्श मानते थे। आज बेटा औरंगजेब साबित हो रहा है। शुक्र है कि मुलायम को शाहजहां नहीं […] विस्तृत....

January 18th, 2017

 

शाइनिंग हिमाचल के पार्टनर

हिमाचल के अनेक पक्ष बर्फ से भी ज्यादा उज्ज्वल हैं, लेकिन क्या इन उपलब्धियों के सहयोगी कभी चिन्हित हुए। क्या सरकारों ने कभी शाइनिंग हिमाचल की गरिमा में पार्टनर को पहचानने की कोशिश की। तरक्की के ढोल-नगाड़ों के बीच एक ऐसा हिमाचल है, जो खामोशी […] विस्तृत....

January 18th, 2017

 

दर्द बांटने का समय

रोहड़ू के गांव तांगणू में अग्निकांड के अनेक कारण सामने आएंगे, लेकिन राहत का पैगाम एक ही होगा और यह संभव है कि हिमाचली समाज आगे आकर इनके आंसू पोंछे। बेशक तांगणू गांव के घर छोटे और लागत में भी कमजोर रहे होंगे, लेकिन आशियाना […] विस्तृत....

January 17th, 2017

 

काली परछाई की बर्फ

बुरी बर्फ के नीचे रोमांच रोया और ऐसे सदमे की आगोश में धरती भी कांपी होगी। हिमाचल के दो युवा अपने मनोरंजन की दहलीज से बाहर निकल कर दफन हो गए, क्योंकि मौत का फरेब समझ नहीं पाए। वहां मौसम क्रूर था या प्रकृति छल […] विस्तृत....

January 16th, 2017

 
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क्या भाजपा व कांग्रेस के युवा नेताओं को प्रदेश का नेतृत्व करना चाहिए?

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