Divya Himachal Logo Mar 25th, 2017

प्रतिबिम्ब


साहित्य और पारंपरिक मीडिया बनाम सोशल मीडिया

राजकुमार शर्मा

साहित्य और पारंपरिक मीडिया अभी अपने अंतर्संबंधों को लेकर द्वंद्व में ही थे कि नए या सोशल मीडिया के आगमन ने दोनों को सिरे से हिलाकर रख दिया।  जिन प्रवृत्तियों ने साहित्य और पारंपरिक मीडिया के संबंधों में दरारें पैदा की थीं, उन्हीं प्रवृत्तियों ने पारंपरिक मीडिया और नए या सोशल मीडिया में दीवारें खड़ी कर दीं, विशेषकर फेसबुक ने। अब तो पारंपरिक मीडिया ने भी फेसबुकिया ढर्रा अपना लिया है। सोशल मीडिया में फेसबुक अपनी परिभाषाएं स्वयं तय कर रहा है। अगर आपको इस मंच पर ‘सर्इव’ करना है तो अति के साथ खड़ा होना पड़ेगा। आप ‘नार्मल’ या संतुलित होंगे तो हाशिए से भी बाहर धकेल दिए जाएंगे। विडंबना है कि खबरों का भविष्य फेसबुक तय कर रहा है। पारंपरिक मीडिया को भी अपने नए सहोदर के हिसाब से कदम बढ़ाने पड़ रहे हैं। आम पाठक बाजार की वृत्ति और प्रवृत्ति दोनों को पकड़ने में पिछड़े जा रहे हैं। सामाजिक सरोकार और मूल्य बीते जमाने की बातें हो गई हैं। ऐसे में साहित्य की अस्मिता को लेकर चिंतन बढ़ना चाहिए था, लेकिन दुर्भाग्य कि साहित्य अब बाजार के दलदल में धंसता जा रहा है। साहित्यकारों को बिना नींव ऊपर जाने के लिए सीढि़यां चाहिए। ऐसी ऊंचाई जहां किसी लिफ्ट से ऊपर चढ़ा तो जा सकता है, लेकिन उसके बाद समय की खाई में गिरने के बाद कोई नामलेवा भी नहीं रहता। कुछ साल पहले तक पारंपरिक मीडिया की कई कृतियां या निर्माण साहित्य का अंग बने, लेकिन अब ऐसे इक्का-दुक्का उदाहरण ही सामने आ रहे हैं।

पारंपरिक मीडिया की विधा रेडियो ने साहित्य के संवर्धन और संरक्षण में अहम भूमिका निभाई है। आजकल आकाशवाणी देश भर के गांवों में जाकर लोकगीत रिकार्ड कर रहा है। इन गानों को पहले स्थानीय बोली में लिपिबद्ध किया जा रहा है; फिर हिंदी तथा अंग्रेजी में। आकाशवाणी देश के महान साहित्यकारों और संगीतकारों के कार्यक्रम, साक्षात्कार तथा उन पर आधारित कार्यक्रम रिकार्ड करता है। इस तरह की तमाम रिकार्डिंग उसके पास मौजूद है। पिछली सदी के अस्सी के दशक में दूरदर्शन पर मशहूर सीरियल मिर्जा गालिब, भारत एक खोज, महाभारत, रामायण वगैरह आजकल व्यक्तिगत संग्रह के लिए भी उपलब्ध हैं। यह सारा कार्य शोध के बाद ही संपन्न किया जाता है।

   – पिछले 35 वर्षों से प्रसार भारती में कार्यरत वरिष्ठ रंगकर्मी राजकुमार शर्मा वर्तमान में आकाशवाणी, शिमला में सहायक स्टेशन कार्यक्रम के पद तैनात है। उन्हें देश के विभिन्न रेडियो स्टेशन पर कार्य करने का अनुभव है। उन्होंने कई रेडियो रूपक,नाटक तथा अन्य साहित्यिक फीचर का निर्माण किया है।

March 20th, 2017

 
 

सिनेमा में सार्थक पहल अभी बाकी

डा. देवकन्या ठाकुर दुनिया भर में फिल्मकारों ने महान साहित्यकारों की कृतियों से प्रेरित होकर कई बेहतरीन फिल्में रची हैं। हमारा फिल्म उद्योग उतना ही पुराना है जितना साहित्य से प्रेरित फिल्मों का निर्माण। भारत की पहली मूक फिल्म राजा हरिश्चंद्र पौराणिक कथा से प्रेरित […] विस्तृत....

March 20th, 2017

 

प्रभाष जोशी

प्रभाष जोशी का जन्म मध्य प्रदेश के शहर इंदौर के निकट स्थित बड़वाहा में हुआ था। प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट पत्रकार थे, जो गांव, शहर, जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर न […] विस्तृत....

March 20th, 2017

 

सहज है साहित्य और मीडिया में थोड़ी असहजता

सचिन संगर साहित्य से प्रेरणा पाने वाले मीडिया तथा साहित्य के रिश्तों में थोड़ी असहजता स्वाभाविक है, कुछ उसी तरह जैसे बाप-बेटे के प्यार भरे रिश्ते में। लेकिन समस्या तब आन खड़ी होती है जब मीडिया, साहित्य होने की कोशिश करता है और साहित्य, मीडिया। […] विस्तृत....

March 20th, 2017

 

आंखों में धूल लेकिन सीने में जलन नहीं

मीडिया के लिए न शब्द किसी रुके हुए जल की तरह है और न ही किसी ठहराव में रुकना इसे पसंद है, जबकि इसी शब्द की महिमा किसी साहित्यकार के पास बदल जाती है। वह चाहे तो साहित्य की कमान में, शृंगार के साथ शब्द […] विस्तृत....

March 20th, 2017

 

साहित्य और मीडिया पर उपभोक्ता संस्कृति का ग्रहण

सुमित शर्मा आज की उपभोक्ता संस्कृति में उपभोक्ता राजा कहलाता है। यह बात दीगर है कि राजा है कौन? उपभोक्ता या बाजार तथा उसे संचालित करने वाले कारपोरेट। पहले उपभोक्ता को लुभाने के लिए मीडिया का सहारा लिया जाता था और उसका भागी बनता था […] विस्तृत....

March 20th, 2017

 

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

मुरारी शर्मा के संपादकत्व में प्रतिबिंब के पोस्टमार्टम के बहाने टिप्पणी आवश्यक जान पड़ती है। हिमाचल प्रदेश में दिव्य हिमाचल दैनिक अपने जन्म से लेकर आज तक निरंतर साहित्य कला संस्कृति का पक्षधर तो है ही साथ में संवेदना, सत्य-न्याय, जल-जंगल-जमीन जंतुओं का रक्षक, जन […] विस्तृत....

March 20th, 2017

 

प्रभावों के बीच

नवनीत शर्मा विशुद्ध पारिभाषिक सारांशों से बचते हुए यह सभी मानेंगे कि साहित्य और मीडिया दोनों अपने समय और समाज के दर्पण हैं। इस नाते दोनों की प्रकृति और प्रवृत्ति एक सी लगती है। साहित्य धीमा चलता है लेकिन उसका असर जहां तक वह पहुंच […] विस्तृत....

March 13th, 2017

 

स्तरीय साहित्य रचना साहित्यकारों का दायित्व

नासिर युसुफजई साहित्य समाज का आईना होता है, जो अपने समय के समाज का इतिहास, कला एवं संस्कृति का सच्चा स्वरूप दर्शाता है। यह अभिव्यक्ति का श्रेष्ठ माध्यम भी है।  ाहित्य प्रायः समाचार-पत्रों, साहित्यिक पत्रिकाओं, संग्रहों और रचनाकारों की पुस्तकों के माध्यम से पाठकों तक […] विस्तृत....

March 13th, 2017

 

कारपोरेट संस्कृति से हाशिए पर सरकता साहित्य

मीडिया और साहित्य को मैं एक दूसरे का पूरक मानता हूं यानी एक ही सिक्के के दो पहलू। मीडिया कर्मी और साहित्यकार दोनों का समाज की नब्ज पर हाथ रहता है। समाज के भीतर क्या कुछ पल रहा है, दोनों इसकी टोह लेते रहते हैं। […] विस्तृत....

March 13th, 2017

 
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