सरोज परमार का कलम से अटूट नाता

सरोज परमार किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। सरोज परमार के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का विश्लेषण करना ठीक वैसे ही है, जैसे कोई आहिस्ता से नदी की लहरों का स्पर्श करते हुए गहरे समुद से रू-ब-रू हो पाए। सरोज परमार का व्यक्तित्व बहुआयामी है। इन्होंने…

लाशों के बीच शब्द ढूंढते मीडिया का अपना सच

नूरपुर के मलकवाल में गत सोमवार को बस हादसे में मारे गए 27 लोगों में शामिल चार से 15 साल की आयु के 23 बच्चों के आकस्मिक निधन ने पूरे प्रदेश को हिलाकर रख दिया है। यह ऐसा दुःखद समाचार था, जिसके मिलते ही हर आदमी सुन्न होकर रह गया। शायद ही कोई…

अयोध्या सिंह उपाध्याय

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (जन्म-15 अप्रैल, 1865, मृत्यु-16 मार्च, 1947) का नाम खड़ी बोली को काव्य भाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने वाले कवियों में बहुत आदर से लिया जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में 1890 ई. के आस-पास अयोध्या सिंह…

कविता

गुलाम तुम गुलाम हो बंदिशें भी हैं पर बेडि़यां नहीं काम का खिलौना है हर कोई गलती करना अधिकार नहीं तुम्हारा स्वतंत्रता मुझे नहीं मालूम!!! देश तो आजाद है पर फैसला कानून भी नहीं लेता तो मेरी क्या मजाल! मैं और तुम तो गुलाम हैं…

माखन लाल चतुर्वेदी : राष्ट्रीयता को काव्य का कलेवर बनाया

माखन लाल चतुर्वेदी (जन्म-4 अप्रैल, 1889 बावई, मध्य प्रदेश; मृत्यु-30 जनवरी, 1968) सरल भाषा और ओजपूर्ण भावनाओं के अनूठे हिंदी रचनाकार थे। इन्होंने हिंदी एवं संस्कृत का अध्ययन किया। ये कर्मवीर राष्ट्रीय दैनिक के संपादक थे। इन्होंने स्वतंत्रता…

रिपोर्टिंग में गंभीरता का खत्म होना चिंताजनक

आज के वैश्विक गांव या अत्याधुनिक युग में सूचनाओं तथा समाचारों का प्रवाह बहुत तेज गति से हो रहा है। तमाम खबरों से निरंतर अपडेट रहने को ही आज जागरूकता की कसौटी माना जाता है। ये खबरें एक-दूसरे तक मौखिक रूप, रेडियो, टीवी, समाचार पत्रों, इंटरनेट…

वट वृक्ष को ढूंढते

अपनी कुशलता के लिए शारीरिक सौष्ठव कभी भी पर्याप्त नहीं रहा। मनस कौशल की नींव पर ही तन सौंदर्य का प्रासाद सुंदर हुआ करता है। आप तन के बूते पर मन की बात कभी नहीं कर सकते। मन के आधार से तन के आकार को गढ़ा जा सकता है। झ्र झंडे की ऊंचाई के लिए…

लेखन के सामाजिक सरोकारों पर साहित्यकारों का मंथन

आयोजन लेखन क्या महज खुद को खुश करने के लिए है या उसका सामाज के प्रति भी कोई दायित्व है? इस विषय पर हमीरपुर के हमीर भवन में एक साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी इरावती पत्रिका और राष्ट्रीय कवि संगम के बैनर में हुई और देश और…

राहुल सांकृत्यायन

महापंडित राहुल सांकृत्यायन (जन्म 9 अप्रैल, 1893; मृत्यु 14 अप्रैल, 1963) को हिंदी यात्रा साहित्य का जनक माना जाता है। वह एक प्रतिष्ठित बहुभाषाविद थे और 20वीं सदी के पूर्वार्ध में उन्होंने यात्रा वृत्तांत तथा विश्व-दर्शन के क्षेत्र में…

डा. पीयूष ने हिमाचली भाषा को दिया नया कलेवर

डा. पीयूष गुलेरी हिंदी तथा हिमाचली भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार हैं। डॉ. गुलेरी ने आधुनिक हिमाचली भाषा को साहित्यिक स्वरूप देने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने सन् 1969 में ‘मेरा देश म्हाचल’ शीर्षक से काव्य-संग्रह प्रकाशित करवाकर राज्य में…

आठवीं अनुसूची की दौड़ में ‘हिमाचली भाषा’एक कदम और चली

भाषा किसी भी व्यक्ति एवं समाज की पहचान का एक प्रमुख घटक तथा उसकी संस्कृति की सजीव संवाहिका होती है। देश में प्रचलित भाषाएं, बोलियां ही हमारी संस्कृति, उत्कृष्ट ज्ञान, परंपराओं व साहित्य को अक्षुण्ण बनाए रखती हैं। भिन्न-भिन्न भाषाओं में…

माखन लाल चतुर्वेदी

माखन लाल चतुर्वेदी (जन्म- 4 अप्रैल, 1889 बावई, मध्य प्रदेश; मृत्यु- 30 जनवरी, 1968) सरल भाषा और ओजपूर्ण भावनाओं के अनूठे हिंदी रचनाकार थे। इन्होंने हिंदी एवं संस्कृत का अध्ययन किया। ये कर्मवीर राष्ट्रीय दैनिक के संपादक थे। इन्होंने…

कविता

गुलाम तुम गुलाम हो बंदिशें भी हैं पर बेडि़यां नहीं काम का खिलौना है हर कोई गलती करना अधिकार नहीं तुम्हारा स्वतंत्रता मुझे नहीं मालूम!!! देश तो आजाद है पर फैसला कानून भी नहीं लेता तो मेरी क्या मजाल! मैं और तुम तो गुलाम हैं…

महादेवी वर्मा : रच डाला अनुभूतियों का छायावादी काव्य

महादेवी वर्मा (जन्म : 26 मार्च, 1907, फर्रूखाबाद - मृत्यु : 11  सितंबर, 1987, प्रयाग) हिंदी भाषा की प्रख्यात कवयित्री हैं। महादेवी वर्मा की गिनती हिंदी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभ सुमित्रानंदन पंत, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकांत…

कविता

...अकड़न... अब भगवान नहीं लोग विज्ञान की बातें करते रातों को नींद नहीं दिन को आहें भरते बैठे बिठाए मशीनी काम करते कभी कमर कभी घुटने कभी गर्दन अकड़ते घर अपना देकर किराए पर खुद किराए के घर में रहते -कश्मीर सिंह गांव व डाकघर रजेरा …