स्वतंत्रता आंदोलन में साहित्य का योगदान

स्वतंत्रता आंदोलन को अहिंसक बनाए रखने के गांधी के संकल्प के कारण भारत में आजादी की अधिकतर लड़ाई कलम ले लड़ी गई। यह कलम ही थी जिसने जनमानस को सचेत किया। आजादी में कलम के योगदान को समर्पित यह अंक... यह सभी जानते हैं कि 15 अगस्त 1947 को हमारा…

आजादी की लड़ाई में मीडिया की भूमिका

स्वतंत्रता आंदोलन में मीडिया की प्रखर भूमिका रही है। अनेक पत्र-पत्रिकाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए जनता को तैयार किया जिससे आजादी का आंदोलन जन आंदोलन बन गया... भारत की स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम 1857 में शुरू हुआ। इसे 1857 की क्रांति के…

मानव जीवन के हर पहलू को छूता है ‘चिह्ड़ू-मिह्ड़ू’

मेरी किताब के अंश : सीधे लेखक से किस्त : 4/भाग-दो ऐसे समय में जबकि अखबारों में साहित्य के दर्शन सिमटते जा रहे हैं,  ‘दिव्य हिमाचल’ ने साहित्यिक सरोकार के लिए एक नई सीरीज शुरू की है। लेखक क्यों रचना करता है, उसकी मूल भावना क्या रहती है,…

वासंती-वासंती बना दें

कविता वे माहिया मैं चैत की लाल टहनी सी कच्ची कोंपल, नाजुक-नाजुक शर्मिली सी ये सांवली सी धूप मां के आंचल सी ममतामयी तपिश देती बहकी-बहकी हवा किसी अच्छी पड़ोसन सी भली लगती हौले-हौले चलती हरियाली बचपन की किसी प्यारी सखी सहेली सी खुशबू…

मूक तपस्वी का मूल्यांकन

पुस्तक समीक्षा व्यवस्था और समाज को सही दिशा में गतिशील बनाए रखने में संगठनों की भूमिका हमेशा से अहम रही है। लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में तो संगठनों की भूमिका और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि इस व्यवस्था में जनमत का स्थान सर्वोपरि…

हिमाचली भाषा का स्वरूप एवं दिशाएं

अमरदेव आंगिरस -गतांक से आगे... पहली नवंबर, 1966 को जब भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हुआ तो पंजाब से पहाड़ी क्षेत्र कांगड़ा, ऊना, कुल्लू, कंडाघाट-कसौली क्षेत्र आदि हिमाचल में मिलाए गए। कांगड़ा पुराने हिमाचल की तुलना में विस्तृत…

जब ट्रक ड्राइवर ने परमार के साथ लिया पंगा …

संस्मरण डा. यशवंत सिंह परमार यह वर्ष 1966 की बात है। मैं फल अनुसंधान केंद्र बागथन में तैनात था, जो प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री डा. वाईएस परमार का गृह क्षेत्र है। उनका वहां पर एक घर, फार्म तथा प्लांटेड पीच ओकार्ड था। इस अनुसंधान केंद्र को…

जी न सकने के बहाने

विराम मरने से पहले जीने को तवज्जोह न दे सकना हमारी विडंबना है। मरने के बाद जो जीवन है, उसको खंगालने के सभी उपाय करने पर तुले हैं। मुट्ठी में रेत भरी है, लेकिन हीरे समझ संजोने में जुटे हैं। कर सकने की हर संभावना को घंटियों की प्रतिध्वनियों…

मैथिली शरण गुप्त

मैथिलीशरण गुप्त (जन्म-3 अगस्त, 1886, झांसी; मृत्यु-12 दिसंबर, 1964, झांसी) खड़ी बोली के प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि थे। महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से इन्होंने खड़ी बोली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया और अपनी कविता के द्वारा खड़ी बोली को…

हिमाचली भाषा को संरक्षण की सख्त जरूरत : भगतराम मंडोत्रा

ऐसे समय में जबकि अखबारों में साहित्य के दर्शन सिमटते जा रहे हैं, ‘दिव्य हिमाचल’ ने साहित्यिक सरोकार के लिए एक नई सीरीज शुरू की है। लेखक क्यों रचना करता है, उसकी मूल भावना क्या रहती है, संवेदना की गागर में उसका सागर क्या है, साहित्य में उसका…

गटर व गंध में पड़ा महान हास्य उर्दू शायर

है बड़ सबसे बड़ा शायर कोई उनसे पूछा तो ये बोले जामई अपने मुंह से मैं भला कैसे कहूं हूं दूसरे नंबर पे हैं इकबाल भी हर भाषा के साहित्य में हंसोड़ कवि होते हैं और उर्दू में भी हैं। यूं तो उर्दू में सबसे बड़े हास्य कवि मुश्ताक अहमद…

हिमाचली भाषा का स्वरूप एवं दिशाएं

अमरदेव आंगिरस -गतांक से आगे... लोअर महासू या शिमला से निचली बोलियों में बाघल (अर्की) रियासत की बाघली बोली का क्षेत्र क्योंथली की तरह ही या कहें इससे अधिक ही व्यापक क्षेत्र है। 36 वर्गमील ऐतिहासिक रियासत बघाट का क्षेत्र ही जब इतना व्यापक…

खूंटे से बंधे की यात्रा

विराम किसी खूंटे से बंधे रहकर की गई यात्रा उस दूरी तक ले जा सकती है जितनी बड़ी रस्सी है। कोल्हू के बैल को ताउम्र चलाते रहिए, हजारों मील की थकावट के बाद भी मंतव्य नहीं मिलेगा। आप मानसिक तौर पर किसी विशेष आदर्श या वैचारिक आग्रहों के कथित धनी…

कविता

बस जलती हुई बस सिसक कर पूछ रही है मेरा कसूर तो बताओ दंगा, आंदोलन, बंद सबका शिकार मैं ही क्यों? मैं तो सबको सही मुकाम तक पहुंचाती हूं फिर मेरी यात्रा और जीवन खत्म क्यों कर दिया जाता है? मेरी छोटी बहन एंबुलेंस ने क्या कसूर किया था?…

अपने कदमों पर साहित्य

एसआर हरनोट शिमला में एक लहर सी उठी और साहित्य चलकर मंजिल तक पहुंचने का सबब बन गया। सहज आयोजनों की एक नई परिपाटी में परिभाषित होते हस्ताक्षर अब सरकारी तंत्र की कुंडली नहीं ढूंढ रहे, तो स्वाभाविक मंजिलें नजदीक आ रही हैं। प्रदेश के बहुआयामी…