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प्रतिबिम्ब


बाबू गुलाबराव

बाबू गुलाबराय भारत के प्रसिद्ध साहित्यकार, निबंधकार और व्यंग्यकार थे। वह हमेशा सरल साहित्य को प्रमुखता देते थे, जिससे हिंदी भाषा जन-जन तक पहुंच सके। उनकी दार्शनिक रचनाएं उनके गंभीर अध्ययन और चिंतन का परिणाम हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में शुद्ध भाषा तथा परिष्कृत खड़ी बोली का प्रयोग अधिकता से किया है। उन्होंने आलोचना और निबंध दोनों ही क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा और मौलिकता का परिचय दिया है…

January 16th, 2017

 
 

गजलें

हजारों दीप मैंने बुझते जलाए हैं, गिला किसका। मैंने वंदे तो क्या पत्थर हंसाए हैं ,गिला किसका। गगन जब था मुसीबत में तो टूटा इस तरह सारा, मैंने सूरज सितारे चांद बचाए हैं ,गिला किसका। मेरे आंसू ने कीमत इस तरह अदा की है, जरूरत […] विस्तृत....

January 16th, 2017

 

हिमाचली पहचान की यात्रा

हिमाचल की स्थापना 1948 में हुई। देश की आजादी की घोषणा के आठ महीनों बाद इस कार्य में तत्कालीन केंद्रीय नेताओं, प्रशासकों और स्थानीय नेताओं के योगदान को भुला नहीं सकते। उन्होंने पर्वतीय लोगों की अक्षुण्ण स्वायत्तता को तरजीह दी और इसे भारतीय परिसंघ का […] विस्तृत....

January 16th, 2017

 

लोक देवता ख्वाजा पीर

इसी प्रकार यदि कोई आप पर झूठा आरोप लगाता है, जिससे मन को कष्ट तो होता ही है, साथ में बदनामी भी होती है…तब भी इसी प्रकार लोक देवता ख्वाजा पीर के आगे फरियाद करने से आपको कुछ समय के बाद न्याय अवश्य मिलेगा। उपरोक्त […] विस्तृत....

January 16th, 2017

 

मां! मेरा बचपन लौटा दो!

मां! सुन लो करुण पुकार मेरी क्यों नहीं चुभती पीड़ा मेरी? नन्हीं परियों की कथा सुना दो मां! मेरा बचपन मुझे लौटा दो।। मां! दूध मिले, न आंचल तेरा अंधकार छाया, मुझमें घनेरा। माता कुमाता, कभी भी न होती होते उसके संतान, कभी न रोती।। […] विस्तृत....

January 16th, 2017

 

कविताएं

आहुति अंतर्मन की तुम तह खोलो, बिन सोचे बिन समझे बोलो। सोच समझ है होती छोटी, केंद्र-बिंदु तुम जरा टटोलो।। शांत-चित्त होकर हे मानव!, देखो अंदर कितने दानव। करते क्रीड़ा देते पीड़ा, काटे कैसे कामी कीड़ा। कर्णप्रिय गुंजार बहुत हैं, आकर्षण शृंगार बहुत हैं। तुझे […] विस्तृत....

January 9th, 2017

 

मजबूरी

कालेज पूरा हो गया था। राखी की शादी कुछ दिनों बाद थी। सभी दोस्तों को निमंत्रण पत्र मिल गए, सभी जाने की तैयारी के लिए खरीददारी करने लगे, लेकिन उसकी सहेली गुडि़या थोड़ी चुप सी थी। साथ तो होती पर, सबमें अकेली। घूमकर शाम को […] विस्तृत....

January 9th, 2017

 

लोक देवता ख्वाजा पीर

यही तो इन लोक-देवताओं की वास्तविकता का प्रमाण है। फिर इनसे क्षमा-याचना करके और दूध, दही, रोट, चूरमां, खीर तथा बलेई आदि देवता से संबंधित पकवान भेंट किया जाता है। तब दूध में खून आना अपने आप ही बंद हो जाता है। यदि इन लोक […] विस्तृत....

January 9th, 2017

 

सृजन की जमीन पर उम्मीदों का नववर्ष

हिमाचल में सृजन की उर्वरा जमीन पर उम्मीदों की नई कोंपलें फूटंेगी ऐसी संभावना है। साहित्य समाज का दर्पण होने के साथ-साथ अपने समय का प्रामाणिक दस्तावेज भी होता है। जो अपने समय, समाज, संस्कृति और इतिहास को भी रेखांकित करता है। हिमाचली रचनाकारों में […] विस्तृत....

January 9th, 2017

 

हिमाचली भाषा की संभावनाएं

हिमाचल प्रदेश भाषा विभाग की पहाड़ी दिवस पर आयोजित संगोष्ठियों में भी इस विषय पर बहस हुई। ‘दिव्य हिमाचल’ के प्रतिबिंब स्तंभ में इस विषय पर लेखकों के विचार पाठकों को पढ़ने-सोचने को मिले, जो इस भाषा के प्रति सामयिक चिंतन को रेखांकित करते हैं। […] विस्तृत....

January 9th, 2017

 
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