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लोकतंत्र को बचाइए

(जग्गू नौरिया, जसौर, नगरोटा बगवां ) टेबल थपथपा कर पगार बढ़ाए, वह नहीं चाहिए, बलात्कारियों को जो बचाते, वह नहीं चाहिए। बांटता रहा दरियां-परातें बन समाजसेवी कोई, वह बगुला भी सत्ता में कतई न चाहिए। बैठकर विपक्ष में चुप रहा, न वह गूंगा चाहिए,…

धनतेरस की धूम

(रमेश सर्राफ धमोरा, झुंझूनू ) हमारे देश में सर्वाधिक धूमधाम से मनाए जाने वाले त्योहार दीपावली का प्रारंभ धनतेरस से हो जाता है। लोग इसी दिन से घरों की लिपाई-पुताई प्रारंभ कर देते हैं। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन ही धन्वंतरि का जन्म…

और यह भी…

(शगुन हंस, योल, कांगड़ा ) आचार संहिता से पहले बंटी रेवडि़यों का हाल देखो कि करसोग बहुतकनीकी संस्थान का उद्घाटन मुख्यमंत्री ने शिमला में बैठकर वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए ही कर दिया। खास यह कि उद्घाटन पट्टिका समय पर नहीं बनी, तो कागजों को…

शब्दवृत्ति

विषकन्या (डा. सत्येंद्र शर्मा, चिंबलहार, पालमपुर ) जोड़ा बिछुड़ा हंस का, टूट गया अब साथ, संन्यासी नित मांगता, विषकन्या का हाथ। चली बांटने नियति, अब पहरे की सौगात, गिनी सलाखें सौ दफा, नहीं कट रही रात। रानी पसरी दुर्ग में, सेवक, पहरेदार, रोट…

हां … मै महाजन हूं

राजाओं के फाइनांसर पहाड़ी राज्य के नाम से विख्यात हिमाचल प्रदेश के विकास में महाजन समुदाय का अहम योगदान है। इस समुदाय की भागीदारी से हिमाचल तरक्की के लंबे डग भर रहा है। महाजन समुदाय की उपलब्धियां बता रहे हैं  अमन अग्निहोत्री... रियासत काल…

गौरी लंकेश से सीखें पत्रकार

कुलदीप नैयर लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं यह सच है कि गौरी को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से कई बार पूर्व चेतावनियां मिलती रहीं और अंत में उन्हें भयावह सच्चाई झेलनी भी पड़ी। हालांकि उनके कदम मौत के आगे भी डगमगाए नहीं। इसमें पत्रकारों के लिए एक सबक…

बचकानी हरकत

(डा. राजन मल्होत्रा, पालमपुर ) हाल ही में भारत-आस्ट्रेलिया के दरम्यान संपन्न हुई टी-ट्वेंटी शृंखला एक-एक से बराबर रही। भारत ने शृंखला का पहला मैच जीत लिया, तो उस जीत के खूब जश्न मनाए गए। जीत का जश्न मनाने में कुछ गलत भी नहीं है। उसके बाद…

दस मिनट की अखबार घंटों की मेहनत

सुरेश कुमार लेखक, योल, कांगड़ा से हैं मीडिया का मतलब अगर ढंग से जाना जाए तो यही है कि रोज कुआं खोदो और रोज पानी पियो। रोज खबर ढूंढनी पड़ती है, रोज जोखिम उठाना पड़ता है। दोस्त कम हो जाते हैं, दुश्मन बढ़ने लगते हैं। धमकियां भी मिलने लगती हैं…

गौरव पर गरीबी की चोट

(शशि राणा, कलोहा ) हम इक्कीसवीं सदी में जीते हुए भारत के डिजिटल होने का सपना देख रहे हैं। यह हर भारतीय के लिए गौरव की बात है। वहीं हमारे देश का एक वर्ग ऐसा भी है, जिसे दो वक्त की रोटी के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। उस वर्ग का नाम…

दीपों का त्योहार

(नंदकिशोर परिमल, गुलेर, देहरा ) दीपों का है त्योहार दिवाली, बच्चों का है शृंगार दिवाली। वर्ष भर इंतजार कराए, खुशियां अपार अपने संग लाए दिवाली। सबके मन में नया संचार यह भरती, स्वच्छता का पाठ पढ़ाए दिवाली। हर इक के मन में लड्डू फूटें, मुबारक…

‘अश्लीलता का अड्डा’ सोशल मीडिया

बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट में सोशल मीडिया को लेकर गंभीर चिंता जताई गई। न्यायिक पीठ का अब मानना है कि इसकी निरंकुशता पर लगाम जरूरी हो गई है। दरअसल ‘सोशल मीडिया’...इन शब्दों का इस्तेमाल करते हुए भी घिन आती है। यह एक निरंकुश और बदनाम चेहरा है।…

सुरंग ने खोली आंख

पहाड़ की प्रगति को संबोधित करना आसान नहीं, फिर भी हिमाचल ने अपनी व्यथा से बाहर निकलने का हमेशा प्रयास किया है। ऐसे में जबकि रोहतांग सुरंग के दोनों छोरों से प्रगति को रोशनी मिल गई, तो अंदाजा लगाना आसान है कि इसके मायने कितने कबायली  घरों को…

अभिव्यक्ति के लिए कीमत चुकानी पड़ती है

लिखना, अक्षर-अक्षर जुगनू बटोरना और सूरज के समकक्ष खड़े होने का हौसला पा लेना, इस हौसले की जरूरत औरत को इसलिए ज्यादा है क्योंकि उसे निरंतर सभ्यता, संस्कृति, समाज और घर-परिवार के मनोनीत खांचों में समाने की चेष्टा करनी होती है। कुम्हार के चाक…

बात हक की गजल के पर्दे में

भावाभिव्यक्ति मानव मात्र की चाहत भी है और ज़रूरत भी। कवि-लेखक एक सजग सचेत निरीक्षक होता है जो जीवन के तमाम खट्टे-मीठे कटु अनुभवों को, जो उसे निरंतर उद्वेलित करते रहते हैं, उन दृश्यों को जो उसके हृदय को आलोडि़त कर जाते हैं, को आत्मसात् करता…

खुद को खुद की नजर से देखा जाए

घर, परिवार समाज और परिवेश प्रोत्साहित ही करता है, आंतरिक आत्मविश्वास और संबल माता-पिता से प्राप्त होता है। रिश्तों और दोस्ती में नकारात्मक लोगों को हटाना प्रत्येक स्त्री को आना चाहिए। अवांछनीय खरपतवार को हटाकर जीवन की क्यारी को सुंदर बनाना,…
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