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कागजों से धरातल तक पहुंचे मनरेगा

अनुज कुमार आचार्य

लेखक, बैजनाथ से हैं

ग्रामीण स्तर पर छोटे-छोटे कार्यों द्वारा विकास को बढ़ावा देने के लिए मनरेगा एक महत्त्वपूर्ण योजना है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जो खामियां इसमें देखने को मिल रही हैं, उनमें स्थानीय पंचायतों द्वारा समाज के कुछ खास वर्गों को विभिन्न योजनाओं का लाभ देने से वंचित रखा जा रहा है। ऐसा भी पाया गया है कि कई पंचायतों के प्रतिनिधियों ने आपसी मिलीभगत से काम में लगे व्यक्तियों की वास्तविक संख्या से अधिक जॉब कार्ड्ज को बनाया, ताकि अधिक फंड्ज हासिल किए जा सकें। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने भी मनरेगा के क्रियान्वन में कई बड़ी कमियों को रेखांकित किया है…

हिमाचल प्रदेश में कुछ समय पहले केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के उच्चाधिकारियों की टीम ने मनरेगा कार्यों का निरीक्षण किया और 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के तहत प्रदेश की सभी ग्राम पंचायतों को पहली किस्त के रूप में 156.30 करोड़ रुपए भी जारी किए गए। वह रकम पंचायत वार सभी पंचायतों के बैंक खातों में जमा भी करवा दी गई थी। सभी ग्राम पंचायतें इस राशि को वर्ष 2017-18 के लिए अनुमोदित ग्राम पंचायत विकास योजनाओं के अंतर्गत स्वीकृत कार्यों पर व्यय करेंगी। 25 अगस्त, 2005 को भारत में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत ग्रामीण परिवारों के बेरोजगार वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से इस योजना की शुरुआत की गई थी। इस अधिनियम को ग्रामीण लोगों की क्रय शक्ति को बढ़ाने के उद्देश्य से भी शुरू किया गया था। बेल्जियम में जन्मे और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में सेवारत अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज की इस परियोजना के पीछे महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। इस योजना के अंतर्गत ग्रामीण संपर्क तंत्र, तटबंधों का निर्माण, पौधा रोपण, बाढ़ नियंत्रण, जल संरक्षण एवं जल संचयन, परंपरागत जल स्रोतों का जीर्णोद्धार, नहर सिंचाई, ग्रामीण पेयजल, ग्रामीण स्वच्छता और तालाबों की खुदाई इत्यादि कार्यों को सिरे चढ़ाया जा रहा है। कहना न होगा कि इस योजना के जरिए प्रदेश में ग्रामीण अधोसंरचना का उल्लेखनीय विकास हुआ है। जिस पंचायत के लोगों ने गंभीर होकर मनरेगा के पैसे का इस्तेमाल करके निर्माण कार्य को अंजाम दिया, वहां उसके सकारात्मक परिणाम साफ देखे जा सकते हैं। योजना के तहत बने तालाबों, रास्तों, डंगों आदि का लोग आज लाभ ले रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में मनरेगा योजना 12 जिलों के सभी 78 विकास खंडों और ग्राम पंचायतों में चलाई जा रही है।

5 जुलाई, 2017 की स्थिति के अनुसार प्रदेश में 12 लाख, 2 हजार जॉब कार्ड्ज जारी किए गए थे और इनके अंतर्गत 22 लाख 41 हजार वर्कर्ज पंजीकृत थे। इनमें भी एक्टिव वर्कर्ज की संख्या नौ लाख  69 हजार थी। मनरेगा कार्यों में पारदर्शिता बनी रहे, इसके लिए ऑनलाइन शिकायत करने की व्यवस्था है, तो वहीं 1077 नंबर पर सिटीजन हेल्पलाइन भी है। हिमाचल प्रदेश में मनरेगा के तहत पंचायतों में चल रहे निर्माण कार्यों की निगरानी अब सेटेलाइट के माध्यम से की जा रही है और इसके लिए निर्माण कार्य पूरा होने के बाद उस कार्य की ‘जिओ टैगिंग’ की जा रही है। इसके लिए ‘भुवन’ नाम का एक सॉफ्टवेयर भी तैयार किया गया है। इस प्रकार विश्लेषण किया जाए तो आप पाएंगे कि ग्रामीण स्तर पर छोटे-छोटे कार्यों द्वारा विकास को बढ़ावा देने के लिए मनरेगा एक महत्त्वपूर्ण योजना है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जो खामियां इसमें देखने को मिल रही हैं, उनमें स्थानीय पंचायतों द्वारा समाज के कुछ खास वर्गों को विभिन्न योजनाओं का लाभ देने से वंचित रखा जा रहा है। ऐसा भी पाया गया है कि कई पंचायतों के प्रतिनिधियों ने आपसी मिलीभगत से काम में लगे व्यक्तियों की वास्तविक संख्या से अधिक जॉब कार्ड्ज को बनाया, ताकि अधिक फंड्ज हासिल किए जा सकें। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने भी मनरेगा के क्रियान्वन में कई बड़ी कमियों को रेखांकित किया है।  हिमाचल प्रदेश में भी मनरेगा के तहत कई योजनाओं को स्वीकृत कर उनको क्रियान्वित किया जा रहा है, लेकिन ऐसा भी देखने में आ रहा है कि जनसाधारण से जुड़े कई कार्यों की पूर्णता को लेकर लापरवाही बरती जा रही है और कई कार्यों को सीमेंट न मिलने जैसा मामूली बहाना बनाकर आधा-अधूरा छोड़ दिया जा रहा है।

पंचायत प्रशासन की इस चालाकी से अंततः किरकिरी सरकार की हो रही है, जबकि होना तो यह चाहिए कि विभागीय अधिकारी सभी प्रकार के मनरेगा कार्यों की निगरानी करें और फील्ड में जाकर चल रहे कार्यों का निरीक्षण कर जिम्मेदार पंचायत प्रतिनिधियों से जवाब तलबी करें। मनरेगा योजना के अंतर्गत बेहतरीन कार्य निष्पादन हेतु वर्ष 2007-08 से रोजगार जागरूकता पुरस्कार, मनरेगा प्रबंधन में उत्कृष्टता हेतु जिला पुरस्कार आदि भी दिए जा रहे हैं, जो कि प्रशंसा का विषय है। लेकिन मनरेगा योजना बिना भेदभाव के अपनी संपूर्णता एवं समग्रता में पंचायतों में निवास करने वाली अधिकतम आबादी को लाभान्वित करे, इसकी भी ठोस व्यवस्था उच्चाधिकारियों को सुनिश्चित करनी होगी। अकेली मनरेगा योजना ग्रामीण ढांचे के विकास, रोजगार के अवसर से लेकर गांवों से शहरों की ओर बढ़ते पलायन को रोकने में काफी हद तक सफल रही है। यहां दावे के साथ कहा जा सकता है कि अगर यह योजना ठीक से संचालित हो, तो गरीबी मिटाने का महात्मा गांधी का सपना पूरा होने से कोई नहीं रोक सकता। लेकिन योजना का दुखदायी पहलू यह है कि यह कागजी तौर पर तो पूरी तरह सफल है, जबकि यथार्थ के धरातल पर यह अपने मकसद से आज भी कोसों दूर खड़ी है। अभी देश-प्रदेश के कई जिले ऐसे हैं, जहां इस योजना से जुड़ी घोर अनियमितताएं सामने आ रही हैं। खासकर इसमें भ्रष्टाचार का जो इतिहास रहा है, उस पर गौर करने की जरूरत है। कई लोग इसे अपनी अर्थव्यवस्था में मजबूती लाने के उपाय की तरह देख रहे हैं, लेकिन कई ऐसे भी हैं जिनका प्रयास है कि इसे पूरी तरह पंगु बना दिया जाए। ऐसे में इन विरोधी तत्त्वों से सख्ती से निपटते हुए यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो इस अकेली योजना में गांवों की सूरत बदलने की क्षमता है।

September 13th, 2017

 
 

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