Divya Himachal Logo Sep 25th, 2017

हिंदी के प्रति कम होता अनुराग

यह सच है कि आज हिंदी भारत के अधिकांश भू-भाग में बोली जाती है, यह भी सच है कि इसे राजकीय भाषा के रूप में मान्यता मिली हुई है, इसकी पढ़ाई भी बड़े पैमाने पर हो रही है तथा इसमें काम भी अब पहले की अपेक्षा बड़े स्तर पर हो रहा है। इसके बावजूद एक टीस है कि अधिसंख्य भारतीयों की यह भाषा राष्ट्र भाषा का वह गौरव हासिल नहीं कर पाई है जिसकी यह अधिकारी है। वास्तव में आधुनिक भारत के आर्थिक व तकनीकी विकास के साथ-साथ हिंदी भाषा अपने महत्त्व को खोती चली जा रही है। सामाजिक स्तर तथा वैयक्तिक स्तर पर जहां इस भाषा की स्वीकार्यता बढ़ी है, वहीं यह दोनों स्तरों पर उपेक्षित भी होती रही है। यही कारण है कि सामाजिक पृष्ठभूमि में हिंदी के प्रति अनुराग कम होता जा रहा है।

पहले इसे दक्षिणी राज्यों में उस समय विरोध व उपेक्षा का दंश झेलना पड़ा जब इसे राष्ट्र भाषा बनाने के विकास क्रम में वहां आंदोलन उठ खड़े हुए। अब वैयक्तिक स्तर पर भी इसे कई जगह उपेक्षा का दंश झेलना पड़ रहा है। यहां तक कि उत्तरी राज्यों, जहां यह राजभाषा के रूप में मान्य है, में ही कुछ कारणों से इसे उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है। यह इसलिए हो रहा है क्योंकि कई लोगों की नजर में यह भाषा बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा नहीं करती है। इसके विपरीत वे अंगे्रजी को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि इसे पढ़ने से रोजगार मिल जाता है। इस तरह सामाजिक व वैयक्तिक, दोनों स्तरों पर हिंदी को उपेक्षा का दंश झेलना पड़ रहा है। इसी कारण यह संवैधानिक रूप से राष्ट्रभाषा का दर्जा अब तक प्राप्त नहीं कर पाई है। देखने में आता है कि आज हर कोई सफलता पाने के लिए अंग्रेजी भाषा को सीखना और बोलना चाहता है, क्योंकि आज हर जगह अंगे्रजी भाषा की ही मांग है। यह सच है, लेकिन हमें अपनी मातृभाषा को कभी नहीं भूलना चाहिए। भले ही आज अंग्रेजी भाषा का ज्ञान होना जरूरी है लेकिन सफलता पाने के लिए हमें अपनी मातृभाषा को कभी नहीं भूलना चाहिए क्योंकि हमारे देश की भाषा और हमारी संस्कृति हमारे लिए बहुत मायने रखती है। किसी भी आर्थिक रूप से संपन्न देश की राष्ट्रभाषा वहां के लोगों के साथ-साथ हमेशा तेजी से बढ़ती जाती है क्योंकि वे लोग जानते हैं कि किसी भी बाहरी देश में उनकी राष्ट्रभाषा और संस्कृति ही उनकी पहचान बनने वाली है। उसी तरह से हम भारतीयों को भी अपनी मातृभाषा को महत्त्व देना चाहिए। हिंदी भाषा ही हमारे महान प्राचीन इतिहास को उजागर करती है और वही हमारी पहचान है। देश में हर साल हिंदी दिवस मनाने की बहुत जरूरत है, यह जरूरी है कि हम अपनी मातृभाषा को सम्मान दें और हमारी अगली पीढ़ी भी विदेशी भाषा की बजाय मातृभाषा को जाने। हिंदी दिवस केवल इसलिए नहीं मनाया जाता कि वह हमारी मातृभाषा है, बल्कि इसलिए भी मनाया जाता है क्योंकि सदियों से हिंदी ही हमारी भाषा रही है और हमें इसका सम्मान करना चाहिए। हमें अपनी मातृभाषा पर गर्व होना चाहिए।

दूसरे देशों में भी हिंदी भाषा बोलते समय हमें शर्मिंदगी महसूस नहीं होनी चाहिए, बल्कि गर्व होना चाहिए। आज-कल हम देखते हैं कि भारतीय लोग हिंदी की बजाय अंग्रेजी को ज्यादा महत्त्व देने लगे हैं क्योंकि कई सरकारी संस्थानों में अभी भी अंग्रेजी में ही काम हो रहा है। इससे एक हीनभावना पैदा होती है और लोग अपनी ही भाषा से विमुख हो जाते हैं। मातृभाषा देश की धरोहर होती है, जिस तरह हम तिरंगे को सम्मान देते हैं उसी तरह हमें मातृभाषा को भी सम्मान देना चाहिए। हम खुद जब तक इस बात को स्वीकार नहीं करते तब तक हम दूसरों को इस बात पर भरोसा नहीं दिला सकते। हमें गर्व होना चाहिए कि हम हिंदी भाषी हैं। हम सब की धार्मिक विभिन्नताओं के बीच एक हमारी मातृभाषा ही है जो एकता का आधार बनती है। हिंदी दिवस एक ऐसा अवसर है जहां हम भारतीयों के दिलों में हिंदी भाषा के महत्त्व को पहुंचा सकते हैं। इस समारोह से भारतीय युवाओं के दिलो-दिमाग में हिंदी भाषा का प्रभाव पड़ेगा और वे भी बोलते समय हिंदी भाषा का उपयोग करने लगेंगे। हमें बड़े गर्व और उत्साह के साथ हर साल हिंदी दिवस मनाना चाहिए और स्कूल, कॉलेज, सोसायटी और कार्यालयों में होने वाली विविध गतिविधियों में हिस्सा लेना चाहिए ताकि हम लोगों में हिंदी भाषा के प्रति प्रेम को उजागर कर सकें और उसके महत्त्व को बता सकें। हालांकि यह सच है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेजी का दबदबा कायम ही रहेगा, फिर भी कुछ उपाय करके हम हिंदी को उसका सम्मान दिलवा सकते हैं। सबसे पहले इसे संयुक्त राष्ट्र में मान्यता मिलनी चाहिए।

विज्ञान व तकनीकी विषयों का अध्ययन हिंदी में भी शुरू किया जाना चाहिए। भारत में जिन सरकारी संस्थानों में अभी भी अंग्रेजी की अनिवार्यता बनी हुई है, वहां इसे समाप्त करना होगा। इससे हिंदी वह स्थान ले लेगी जो अभी अंग्रेजी ने ले रखा है। सामाजिक स्तर पर हिंदी को सीखने में जो हीनभावना पैदा होती है, वह भी इससे खत्म हो जाएगी। आशा की जानी चाहिए कि हिंदी के बढ़ते कदम भविष्य में नई मंजिलें चूमेंगे और इसे उसका गौरव प्राप्त होगा।

-फीचर डेस्क

September 10th, 2017

 
 

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