हिमाचली मीडिया ने बढ़ाए हिंदी के पाठक

हिमाचल प्रदेश हिंदी भाषी राज्य है। यहां के निवासी साधारणतः हिंदी में ही संवाद करते हैं। इससे यहां के हिंदी मीडिया को हिमाचल में फलने-फूलने का अवसर मिला है। हिंदी की लोकप्रियता भी बढ़ी है। यह आम बोल-चाल की भाषा बन गई है। एक समय था जब प्रदेश में जालंधर, चंडीगढ़ व दिल्ली से समाचारपत्र आते थे।

उन्हीं को लोग पढ़ते थे। तब वह हिमाचली मीडिया नहीं कहा जाता था, वह केवल मीडिया था। धीरे-धीरे बाहर के प्रदेशों में छपने वाले हिंदी अखबारों ने हिमाचल की तरफ मुंह मोड़ा। इन अखबारों ने यहां के जनमानस का मनोविज्ञान समझते हुए वह सब परोसना शुरू कर दिया, जो पाठक चाहते थे। फिर यह हिमाचली मीडिया हो गया।

यूं चंडीगढ़ से छपने वाले अखबार जनसत्ता ने सबसे पहले अगस्त 1993 में दो पृष्ठों की हिमसत्ता जनसत्ता के बीच में ही देनी शुरू कर दी थी। पूरे हिमाचल प्रदेश को हिंदी का कोई अखबार जब अलग से दो पृष्ठ देने लगा तो उसे पाठकों ने हाथों-हाथ लिया। उसके बाद ‘दिव्य हिमाचल’ ने यह प्रयोग किया, जिसे अपार सफलता मिली। प्रदेश में हिंदी पत्रकारिता निखरने लगी है। वह लोकप्रियता के शिखर छूने लगी है। आम गली-मोहल्लों, गांव-कस्बों और हाट-बाजारों की खबरें छपने लगी हैं।

आम आदमी मीडिया में अपना नाम प्रकाशित होते देख खुशी से झूमने लगा है। हिमाचली मीडिया तरक्की के रास्ते पर बढ़ने लगा है। अब हिमाचली मीडिया में हिंदी के प्रयोग व संदर्भ की चर्चा भी होने लगी है। हिंदी प्रेमियों के लिए यह खुशी की बात है। हिमाचली मीडिया  में हिंदी के लेखक व कवि छपने लगे हैं। उनको नई पहचान मिली है। यहां के समीक्षक व आलोचक हिंदी साहित्यकारों की रचनाओं की समीक्षाएं करने लगे हैं। हिंदी में साहित्यिक पत्रकारिता का विमर्श भी शुरू हो गया है।

आज हिमाचली मीडिया में हिंदी छाई हुई है। अंग्रेजी के समाचारपत्र पढ़ने वालों को भी तब तक चैन नहीं आता है, जब तक वे हिंदी की अखबार नहीं पढ़ लें। यह बहुत बड़ा बदलाव है। इसे हिंदी के सुखद भविष्य का संकेत भी कहा जा सकता है। हिमाचली मीडिया ने हिंदी के पाठकों की संख्या बढ़ाई है।

उनमें सोचने-समझने व बहस-मुबहस करने का जुनून पैदा किया है। दूर गांव में बैठा व्यक्ति भी सड़क किनारे की किसी दुकान तक जब चल कर आए और अखबार पढ़ने की अपनी भूख को शांत करे, तो इसे हिमाचली मीडिया द्वारा लाया गया बदलाव ही कहा जाएगा। जब हिमाचली मीडिया की बात होगी तो साथ में राष्ट्रभाषा हिंदी की बात भी होगी।

इस बातचीत में हिंदी का संदर्भ तो आएगा ही। हिमाचली मीडिया है तो उसमें हिंदी संदर्भ विशेष रूप से सामने आता है। हिमाचली मीडिया ने हिंदी में नए प्रयोग भी किए हैं। कई आंचलिक शब्द, मुहावरे व लोकोक्तियां अब हिंदी की थाती बन गए हैं। इससे हिंदी शब्दकोष में विविधता आई है और आंचलिक शब्द राष्ट्र भाषा की छत्रछाया में अपनी पहचान बड़ी करते नजर आ रहे हैं।

-कुलदीप चंदेल, बिलासपुर

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