बीपीएल चयन पारदर्शी बनाने की जरूरत: सतपाल सिंह सत्ती, अध्यक्ष, प्रदेश वित्त आयोग

सतपाल सिंह सत्ती, अध्यक्ष, प्रदेश वित्त आयोग By: सतपाल सिंह सत्ती, अध्यक्ष, प्रदेश वित्त आयोग Sep 22nd, 2020 6:08 am

सतपाल सिंह सत्ती

अध्यक्ष, प्रदेश वित्त आयोग

प्रदेश सरकार, जिला प्रशासन व अन्य संबंधित विभागों को एक सुझाव रहेगा कि जहां-जहां भी नए नियमों के तहत बीपीएल का चयन हुआ है, इनके चयन की समीक्षा बाहरी एजेंसियों से करवाई जाए। उस एजेंसी में न तो कोई स्थानीय पंचायत प्रतिनिधि हो, न ही स्थानीय अधिकारी, न ही कोई स्थानीय कर्मचारी इसका हिस्सा हो। इसमें सभी सदस्य पूरी तरह से बाहरी जिलों से हों और उनकी जानकारी पूरी तरह गोपनीय हो। वह बिना किसी पूर्व सूचना के पंचायतों में जाकर इन परिवारों की समीक्षा करे…

पिछले दिनों समाचार आया कि 125 के करीब लोग फर्जी तरीके से बीपीएल में पाए गए जिनमें कोई अधिकारी, कोई कर्मचारी, कोई चिकित्सक, कोई खाद्य इंस्पेक्टर, कोई कालेज प्रोफेसर तो कोई शिक्षक व अन्य विभागों में कार्यरत सरकारी कर्मचारी थे। पूरा प्रदेश यह समाचार देखकर स्तब्ध था कि मोटी-मोटी पगार लेने वाले ये अधिकारी व कर्मचारी उन बीपीएल परिवारों का राशन डकार रहे थे जिन परिवारों की आधी जिंदगी तो बीपीएल में आने की जद्दोजहद में बीत जाती है। वैसे तो आए दिन समाचार पत्रों में देखने-सुनने को मिलता है कि प्रदेश के बहुत से क्षेत्रों में बीपीएल अंत्योदय परिवारों के चयन में धांधलियां होती हैं या हो रही हैं। लेकिन सरकारी नौकरी में लगे हुए लोग पहली बार पकड़ में आए और यह फर्जीवाड़ा आज से नहीं, पता नहीं कब से चल रहा था। बीपीएल, अंत्योदय का नाम सुनते हमारे मन में एक दबे-कुचले व असहाय गरीब परिवार की तस्वीर नजर आती है, लेकिन हैरानी तब होती है जब साधन संपन्न परिवार इन श्रेणियों में घुसपैठ कर लेते हैं और इस पूरी प्रक्रिया में जिन पंचायत प्रतिनिधियों के ऊपर इन वर्गों के चयन की जवाबदेही तय की जाती है, वे ही इस भ्रष्टाचार में शामिल हो जाते हैं।

कुछ रसूखदार भी जोर-जबरदस्ती से खुद को गरीब साबित करने से पीछे नहीं हटते। लेकिन हद तो तब बेहद हो गई जब सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों के बीपीएल में शामिल होने की बात सामने आई। सरकार व प्रशासन द्वारा हर बार अपनी तरफ से इनमें पारदर्शिता लाने के भरसक प्रयास किए जाते हैं। इसी कड़ी में प्रदेश में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के नेतृत्व में बनी सरकार ने बीपीएल परिवारों के निष्पक्ष चयन के लिए मौजूदा नीति में कुछ बदलाव भी किए हैं, जैसे बीपीएल के लिए पात्र परिवार एक तो आयकरदाता न हो, बीपीएल के लिए पात्र परिवार की वेतन, पेंशन, मानदेय, मजदूरी आदि से 2500 रुपए मासिक से अधिक आय न हो, परिवार का कोई भी सदस्य सरकारी, गैर सरकारी नौकरी में नियमित या अनुबंध पर कार्यरत न हो। वहीं अलग होने वाले परिवार को अगले तीन साल तक बीपीएल परिवार में शामिल नहीं किया जाएगा। बावजूद इसके ये सरकारी नौकर कैसे बीपीएल में घुस आए? ऐसा नहीं कि इन्होंने दर्जनों महीनों का राशन ही डकारा होगा। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इन्होंने इसी बीपीएल के फर्जीवाड़े के आधार पर सरकारी नौकरी भी हासिल की होगी। जब नियम साफ हैं कि बीपीएल के चयन में एकल महिलाएं जो विधवा हैं, तलाकशुदा हैं या परिवार में पृथक रूप से रह रही हैं, उन्हें भी बीपीएल सूची में शामिल करना होगा।

साथ ही गंभीर बीमारियों से पीडि़त व्यक्ति जैसे कैंसर पीडि़त का परिवार, किडनी से संबंधी बीमारी के मरीजों के परिवार एवं ऐसे परिवार जिनका कोई सदस्य 70 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगता से पीडि़त हो, उन्हें बीपीएल चयन में तरजीह दी जाएगी। लेकिन साथ ही अगर इन चार श्रेणियों में आने वाला परिवार चौपहिया वाहन रखता है तो वह भी बीपीएल के लिए अपात्र होगा। फिर भी यह फर्जीवाड़ा कैसे? पिछली सरकार ने पूरे प्रदेश में ऐसे गरीब परिवार जो बीपीएल और अंत्योदय की श्रेणी में आते हैं, उनके घरों के बाहर बीपीएल, अंत्योदय की पट्टिका लगाने का जो निर्णय लिया था, उससे भी बहुत से अपात्र लोग बेनकाब हुए और बहुतों ने शर्म के मारे अपना नाम इन सूचियों से कटवा लिया था। इन बीपीएल घरों में लगे एयरकंडीशनर मानो यह सवाल दाग रहे हों कि गरीबी का असली मजा जो इस ठंडी हवा में है, वह धूप में मजदूरी करने में कहां? एक सवाल अभी भी बना हुआ है कि बीपीएल के चयन के लिए सरकार व प्रशासन द्वारा मापदंड तो निर्धारित कर दिए गए, लेकिन क्या इन्हें स्थानीय स्तर पर लागू भी किया जाता है या जाएगा? कुल मिलाकर देखा जाए तो बहुत सी कल्याणकारी योजनाएं हैं जो गरीबों के लिए बनी हैं, परंतु यदि उन तक पहुंचे। हमारी पंचायत नामक संस्थाएं जिसे हम आए दिन और अधिकार देने की बात करते हैं, अभी मौजूदा अधिकारों का ही ईमानदारी से निर्वाह नहीं कर पा रही हैं। जब तक पंचायत प्रतिनिधियों की जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जाती तब तक इन नियमों का होना, न होना बराबर है। प्रदेश सरकार, जिला प्रशासन व अन्य संबंधित विभागों को एक सुझाव रहेगा कि जहां-जहां भी नए नियमों के तहत बीपीएल का चयन हुआ है, इनके चयन की समीक्षा बाहरी एजेंसियों से करवाई जाए।

 उस एजेंसी में न तो कोई स्थानीय पंचायत प्रतिनिधि हो, न ही स्थानीय अधिकारी, न ही कोई स्थानीय कर्मचारी इसका हिस्सा हो। इसमें सभी सदस्य पूरी तरह से बाहरी जिलों से हों और उनकी जानकारी पूरी तरह गोपनीय हो। वह बिना किसी पूर्व सूचना के पंचायतों में जाकर इन परिवारों की समीक्षा करे और यदि कोई धांधली नजर आए तो सीधे पंचायत प्रतिनिधियों व जो परिवार गलत तथ्यों को पेश कर बीपीएल की सूची में आया है, उस पर कानूनी कार्रवाई करने के साथ ही जुर्माने व सजा का भी प्रावधान होना चाहिए। यह बात सत्य है कि सरकार व जिलाधीश हर पंचायत में इनके चयन के समय मौजूद नहीं रह सकते, सिवाए एक पर्यवेक्षक को नियुक्त किए, लेकिन जो नियम प्रशासन द्वारा बनाए गए हैं वे नियम सही ढंग से लागू हो पाए या नहीं, इसकी गारंटी भी सुनिश्चित होनी चाहिए। राशनकार्ड अलग बनवाने के लिए भी सरकार को कुछ ठोस नियम बनाने चाहिए। जब तक नियमों को निष्पक्षता से लागू करने-करवाने का नियम भी लागू नहीं हो जाता, तब तक सब नियम बेमानी हैं। प्रदेश के लोगों को भी इंसानियत के तौर पर एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से सोचना चाहिए कि जो सुविधाएं बीपीएल आदि वर्गों के लिए हैं, उसके लिए वे कैसे पात्र हो सकते हैं। इस तरह ऐसी हेराफेरी पर रोक लगाई जा सकती है।

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