संपादकीय

हिमाचल में दर्पणतोड़ प्रतियोगिता में फंसी राजनीति को शायद यह भ्रम है कि यहां एक दूसरे पर कीचड़ फेंक कर उज्ज्वल हुआ जा सकता है। इसे हम सियासी रंगड़ भी मान सकते हैं, जो काटने को दौड़ रहे हैं। विरोध की अति में भी शब्दावली की शालीनता का अर्ज किया है, अगर गुस्सैल रहे या

सिरमौर में कांग्रेस के नक्षत्र जिस खुर्दबीन से देखे गए, वहां पार्टी ने खुद को सहेजा जरूर है। दरअसल पार्टी की बाहरी व आंतरिक कार्ययोजना अगर एक तरह का संदेश देने में सक्षम होगी, तो किसी भी चुनौती में मलाल नहीं होगा। कम से कम सिरमौर के लटके-झटकों में फंसी कांग्रेस ने सामने देखने की

महाराष्ट्र के महानाटक का मंच पर पूरी तरह से खुलना अभी शेष है, लेकिन जो दृश्य देखे गए हैं, उनमें मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का पराजय-बोध स्पष्ट है। इसका ठोस प्रमाण यह है कि वह और उनका परिवार मुख्यमंत्री आवास ‘वर्षा’ से बोरिया-बिस्तर बांध कर अपने पैतृक घर ‘मातोश्री’ लौट आए हैं। मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम के

साहित्य के उत्सव में शरीक होना ही अपने आप में जनसंवाद का धरती से स्पर्श है, लेकिन यहां तो साहित्य का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन था, इसलिए लेखकों की परिधि में सारे स्रोत और विषयों के आंगन में मेहमाननवाजी का ओज देखा गया। शिमला के लिए आयोजन की रौनक और साहित्य की छत से टपकते मशविरे गुनगुनाते

शिवसेना में शिवसैनिकों ने ही बग़ावत की है। इतने व्यापक स्तर पर यह पहला विद्रोह है। इस राजनीतिक बग़ावत की पूरी संभावनाएं थीं। महाविकास अघाड़ी के शिल्पकार नेता एवं एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को आगाह किया था कि मंत्री और विधायक इस कदर चिंता और गुस्से में हैं कि वे विद्रोह

हिमाचल का शिक्षा विभाग अगर सर्कस के करतब दिखाना भी शुरू कर दे, तो इसकी प्रासंगिकता बढ़ जाएगी। अपने अनेक फैसलों खास तौर पर वार्षिक छुट्टियों की घोषणा को लेकर यह विभाग सर्कस ही तो कर रहा है। सर्कस शो का अंतिम पहर और भी रोमांचक है जब घोषित शैड्यूल के मुताबिक 21 जून से

कांग्रेस ने पहली बार प्रधानमंत्री मोदी को गाली नहीं दी है। यह बदजुबानी ही नहीं, बददुआ भी है। गाली देने का सिलसिला 2007 में शुरू हुआ था, जब मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं दूर-दूर तक नहीं थीं। अलबत्ता वह गुजरात के मुख्यमंत्री जरूर थे। 2007 चुनाव-वर्ष था। विधानसभा के चुनाव होने थे। गोधरा कांड

एक छोटे से राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लगातार दौरे अपनी करवटों में सबसे बड़ा आशीर्वाद दे रहे हैं, तो मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर इस श्रेय के पात्र माने जाएंगे। ये रिश्ते राज्य से कहीं ऊपर एक मुख्यमंत्री की गणना कर रहे हैं, तो हिमाचल समझ सकता है कि असल में हो क्या रहा। हर

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में सिखों के एक पवित्र गुरुद्वारे पर फिदायीन हमले ने डरावना सच साकार कर दिया कि अफगानिस्तान अब भी आतंकवाद का केंद्रीय अड्डा है। तालिबान द्वारा हुकूमत कब्जाने के करीब 10 महीने बाद भी आतंकी हमले जारी हैं। मध्यकालीन मानसिकता के तालिबान, दरअसल, अल्पसंख्यकों और औरतों के प्रति दुश्मनी और नीचा