संपादकीय

आज 26 जनवरी है…भारत का 72वां गणतंत्र दिवस! स्वतंत्र भारत के संवैधानिक और जनवादी प्रारूप का दिवस! ‘पूर्ण स्वराज्य’ के संकल्प को सार्थक करने का दिवस! और भारत की अखंड संप्रभुता, शौर्य, सम्मान और सम्पन्नता के वैश्विक प्रदर्शन का  दिवस! कितना महान और प्रेरणादायी है यह राष्ट्रीय पर्व? जो दिवस विविध और संपूर्ण राष्ट्र को

पूर्ण राज्यत्व की आधी सदी के साहसिक मुकाम पर हिमाचल जश्न मना सकता है, लेकिन इस यात्रा के नायकों को स्मरण करने का कर्ज हमेशा रहेगा। पूर्ण राज्यत्व तक पहुंचे राज्य ने बेशक अपने मायने गढ़ लिए, लेकिन मानवीय अपेक्षाओं ने जिस राजनीति को ओढ़ लिया उसके सदके भविष्य का संघर्ष अभी पूरी तरह समझा

मौका नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती का था। उनकी स्मृति, योगदान और स्वतंत्रता संग्राम के पुराने अध्याय और प्रसंग खोले गए। सवाल भी उठाए गए कि नेताजी को ‘राष्ट्रनायक’ का अधूरा सम्मान क्यों दिया जाता रहा है? आज़ाद हिंद फौज के जीवित जांबाजों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ का दर्जा क्यों नहीं दिया जाता रहा

चुनावों की फेहरिस्त में जनता की आस्था व अनुराग का ठिकाना हम स्थानीय निकायों की बनती-बिगड़ती तस्वीर में देख सकते हैं। हम दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी करके लौटी, रोहड़ू की लोहरकोटी की प्रधान अवंतिका के रूप में राजनीति के प्रति नई आस्था का श्रीगणेश कर सकते हैं या उन तमाम युवाओं को स्वीकार कर

कृषि के तीनों विवादास्पद कानूनों को डेढ़ साल के लिए स्थगित करने का सरकारी प्रस्ताव भी किसानों ने खारिज कर दिया। साझा समिति का गठन भी उन्हें कबूल नहीं है। किसानों ने अपनी अडि़यल मांग फिर दोहराई है कि कानून निरस्त करने से कम कुछ भी उन्हें स्वीकार नहीं। सभी फसलों पर लाभकारी न्यूनतम समर्थन

योजनाओं में विधायकों की प्राथमिकताओं का प्रदर्शन जिस तरह से हो सकता है, उससे कहीं भिन्न जमीनी हकीकत का संताप नजर आता है। मुद्दा यहां केवल जनप्रतिनिधियों के कामकाजी मूल्यांकन या जनता के समक्ष किए गए वादों का नहीं, बल्कि उस परिपाटी का है जो बार-बार प्रदेश की भूमिका को बदल देती है। बेशक मुख्यमंत्री

अमरीका में राष्ट्रपति जोसेफ  आर. बाइडेन और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने अपने कार्यभार संभाल लिए हैं, लिहाजा अब नए युग की शुरुआत हो गई है। यह युग कई अर्द्ध-तानाशाही प्रवृत्तियों, मंसूबों, लोकतंत्र और संविधान पर प्रहारों और गोरे-काले, अमीर-गरीब की विभाजनकारी खाइयों को पार करके दिखा है। यकीनन यह उम्मीदों, एकता और उजालों की कहानी

सवाल पर्यटन को बजट देने से भी कहीं अधिक बजट में पर्यटन को देखने का है। प्रदेश अपने अगले चरण में बजटीय आंख से न केवल भविष्य को देखेगा, बल्कि पूरा एक साल कोविड में गंवाने के दंश भी हटाएगा। ऐसी ही परिस्थितियों की फांस में तड़प रहे पर्यटन व्यवसायियों की वित्त विभाग के अतिरिक्त

यह कोई परी-कथा की पटकथा नहीं थी। यह आकस्मिक, संयोगवश अथवा तुक्का भी नहीं था। सभी कीर्तिमान विरोधी टीम के पक्ष में थे। कंगारू अपने देश में, खासकर गाबा के मैदान पर 1988 से अजेय रहे थे। गाबा में टीम इंडिया ने पराजयों की निरंतरता ही झेली थी। इस बार भी व्याख्याएं ऐसी ही की