संपादकीय

जम्मू-कश्मीर में आतंकियों द्वारा ‘लक्षित हत्याओं’ के मौजूदा मंजर में प्रवासी मज़दूरों का पलायन जारी है। ये मज़दूर उप्र और बिहार से कश्मीर में बीते कई सालों से आ रहे हैं। घाटी में कुछ स्थानों को तो ‘प्रवासियों का घर’ कहा जाता है। जम्मू-कश्मीर का ज्यादातर श्रम इन्हीं मज़दूरों के सहारे है। सेब के बागीचों,

हिमाचल के उपचुनावों की सतह मंडी संसदीय क्षेत्र में तय होगी, तो बार-बार सियासी शब्द अपना शृंगार कर रहे हैं। विरासत के मूल्यों पर भूचाल की स्थिति पैदा करके भाजपा ने वीरभद्र सिंह के परिवार को सुरक्षात्मक तौर तरीकों तक पहुंचा दिया है, तो यहां चुनावी शैली का घमासान नए प्रयोग कर रहा है। भाजपा

यह नारा उप्र में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने दिया है। इसी के साथ उन्होंने ऐलान किया है कि कांग्रेस विधानसभा चुनाव में 40 फीसदी टिकट महिलाओं को देगी। प्रियंका का यकीन है कि ‘महिला चालीसा’ से नफरत और धर्म की राजनीति का बोलबाला समाप्त हो सकता है। कांग्रेस महासचिव की यह घोषणा फिलहाल

खेल नीति के इंतजार में हिमाचल में खेलो इंडिया खेलो के संकल्प ही धराशायी हो जाएं, तो इस मुकाम पर हासिल क्या होगा। धर्मशाला में भारतीय खेल प्राधिकरण द्वारा तीन दशक से भी पहले से चल रहा खेलों के विकास का रथ आज धंसता हुआ नजर आ रहा है। वर्ष 1992 में आई खेल विकास

बांग्लादेशी हिंदुओं के 66 घरों पर हमले कर उन्हें तोड़ा-फोड़ा गया है, जबकि 20 से ज्यादा घर जलाकर राख कर दिए गए हैं। सोशल मीडिया पर कथित ईश-निंदा की एक पोस्ट की प्रतिक्रिया में ये सांप्रदायिक हमले किए गए। यह बांग्लादेश के विभिन्न समुदायों के स्पष्टीकरण हैं। सांप्रदायिक हिंसा में करीब 40 हिंदू घायल हुए

हिमाचल प्रदेश के उपचुनाव अपने सहज भाव को प्रचार की अति में झेलते हुए, ऐसे मुद्दों को लिख रहे हैं, जो प्रायः बहस का विषय नहीं बनते। अब कांग्रेस बनाम भाजपा के बीच विकास अड़ गया है। सवाल विपक्ष जिस लहजे में पूछता है, उससे भिन्न विकास का प्रति उत्तर सत्तारूढ़ दल दे रहा है।

क्रिकेट का रोमांच जरूरी है अथवा आतंकियों से बदला लेना अनिवार्य और अहम है। देश के गांव-घरों में तिरंगे में लिपटे ताबूत आ रहे हैं और हम क्रिकेट के चौके-छक्कों पर तालियां बजाएं! एक पूरी पीढ़ी और वर्ग का खून खौल रहा है। देश भर में आक्रोश महसूस किया जा रहा है। घरों के चिराग

क्या भारत में भुखमरी है? क्या निःशुल्क खाद्यान्न बांटने और देश में खाद्य सुरक्षा कानून होने के बावजूद भारत में लोग भूखे सोते हैं? क्या देश के बचपन की नई पीढ़ी अविकसित और बौनी-सी पैदा हो रही है? क्या उनमें खून की कमी है, नतीजतन वे अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं? ये सवाल

तबादलों में सिफारिश के धंधे पर अदालती फरमान पर सतर्क हुई हिमाचल सरकार को अंततः लक्ष्मण रेखा खींचनी ही पड़ी। शिक्षा विभाग व बिजली बोर्ड के तबादला मामलों में अदालत ने कड़े निर्देश देते हुए कर्मचारी संगठनों के दखल को गैरजरूरी पाया था और इसी तरह मंत्री-विधायकों के डीओ नोट पर ट्रांसफर मामलों को भी