संपादकीय

देश की राजधानी दिल्ली में लॉकडाउन लागू करना पड़ा है। इसके अलावा महाराष्ट्र, उप्र, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तराखंड, गुजरात आदि राज्यों में भी लॉकडाउन है अथवा नाइट कफ्र्यू जारी है। शब्दावली भिन्न हो सकती है, लेकिन कोरोना वायरस के बेकाबू संक्रमण के कारण तालाबंदी और घरबंदी ही एकमात्र विकल्प शेष रह गया

रेमडेसिविर इंजेक्शन का खूब शोर मचा है। इंजेक्शन को लेकर मारामारी मची है, लिहाजा दवा के सौदागरों ने महामारी की आपदा के दौरान भी जमाखोरी और कालाबाज़ारी जारी रखी है। सरकार का दावा है कि रेमडेसिविर की कमी नहीं है। जमाखोरी और कालाबाज़ारी करने वालों के खिलाफ  रासुका की धारा के तहत कार्रवाई की जाएगी।

भाजपा के वरिष्ठ नेता शांता कुमार वही कह रहे हैं, जो देश के अधिकांश नागरिक कह रहे हैं, फिर भी सियासत के चूल्हे ठंडे नहीं हो रहे। शांता कुमार ने आस्था और राजनीतिक भीड़ के साथ-साथ सामाजिक महफिलों पर प्रश्न उठाते हुए ऐसी तमाम गतिविधियों पर अंकुश लगाने की मांग की है। यह मांग प्रदेश

अंततः माननीय उच्च न्यायालय ने वे निर्देश दिए हैं, जिनसे आमतौर पर हिमाचल की सरकारें बचकर निकल जाती रही हैं। यह बदलते मीडिया की औकात से जुड़ा प्रश्न हो सकता है और यह भी कि शिमला की गलबहियों में पलते पत्रकारों के बीच कितनी कलगियां नकली हैं, इसकी भी पूछताछ हो सकती है। अदालत तक

प्रख्यात मेडिकल शोध-पत्रिका ‘द लैंसेट’ ने एक विश्लेषण प्रकाशित किया है, जिसका निष्कर्ष है कि कोविड-19 का संक्रमण हवा के जरिए तेजी से फैलता है और दूर तक संक्रमित कर सकता है। बूंदों (डॉपलेट्स) से उतनी तेजी से संक्रमण नहीं फैलता। उस थ्योरी को खारिज कर दिया गया है। ‘लैंसेट’ का विश्लेषण ब्रिटेन, कनाडा और

अंततः सोलन शहर के ताले खुले और कांग्रेस की चिडि़या बाहर निकली। सफेद धुली हुई, पंख खोलती हुई। नगर निगम चुनाव का अंतिम पिंजरा खुला और सोलन के पहले महापौर पूनम ग्रोवर तथा उप महापौर के रूप में राजीव कौड़ा मिल गए। हम इसे राजनीतिक जीत-हार के बीच नागरिक फासलों का हिसाब लगाएं, तो पता

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 55 घंटे का वीकेंड कर्फ्यू लगाया गया है। राजस्थान में भी यही निर्णय लिया गया है। नाइट कर्फ्यू पहले से ही जारी है। कर्फ्यू की अवधि को छोड़ कर शेष दिन खुले रहेंगे, क्योंकि आम आदमी की आजीविका और कुल मिलाकर देश की अर्थव्यवस्था की चिंता भी अहम सवाल है। आम

कब तक धूल भरे बादल से बारिश की उम्मीद करते, उनके रोजनामचे में शिकायत मौसम के गायब होने की है। यह स्थिति कोरोना वन से टू तक बिखरी व्यवस्था की है और जहां रोते-बिलखते मंजर के आंसू पौंछने का एहसास कराने की व्यथा भी है। सामने दिखाई दे रहा है कि सारे देश के बिगड़ते

पहला दृश्य झारखंड की राजधानी रांची के सदर अस्पताल का है। पिता के शव के पास एक बेटी चीत्कार कर रही थी- ‘कोई डॉक्टर नहीं आया…बार-बार चीखती रही, तब भी कोई नहीं आया…पार्किंग में ही मेरे पापा की मौत हो गई। मंत्री जी! क्या आप मेरे पिता को लौटा सकते हैं? आपको सिर्फ  वोट चाहिए,