
भारत आज विश्व के सबसे तेजी से शहरीकरण करने वाले देशों में शामिल है। आर्थिक विकास, औद्योगीकरण, सेवा क्षेत्र के विस्तार और ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर निरंतर हो रहे पलायन ने...
कोई आज तक नहीं बता पाया कि दूल्हे की सजावट में तलवार का क्या काम, फिर भी साहसी दूल्हा किसी फतह के मुगालते में शादी में तलवार को अपना प्रतीक मान लेता है। शादी सफल होने की गारंटी, पति के...
कांगड़ा के राजनीतिक नेतृत्व के पिछड़ेपन के लिए यहां के नेताओं का भोलापन, पहचान का संकट, आपसी मेलभाव तथा स्वीकार्यता की कमी मानी जा सकती है। कांग्रेस के नजरिए से कांगड़ा को सत्ता...
सडक़ पर चलना कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर व्यक्ति का बुनियादी अधिकार है। यदि भारत को वास्तव में मानव-केंद्रित विकास की दिशा में आगे बढऩा है, तो पैदल यात्रियों की सुरक्षा तय करनी होगी...
अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव एवं विहिप के उपाध्यक्ष चंपत राय बंसल को, अंतत:, इस्तीफा देना पड़ा। अनिल मिश्रा ने भी ट्रस्ट सदस्य के तौर पर इस्तीफा दे दिया है।
पहाड़ी कविता संग्रह ‘जणेत’ सुरेंद्र मिन्हास कहलूरी की 15वीं पुस्तक है। जणेत का माहौल बनाते हुए कवि के भाव देखिए, ‘हारी-फारी पुज्जी जणेत कुड़मा रे गांवा/होई गौरी थी सन्ज धारा पर पड्छांवा/स्कूले रे मैदाने च मेच कुरसियां थी रखूरी/तड़ोई कुसियां जणेत थी बड़ी थकुरी/ल्याये कुडिय़ा वाले गर्म चाह कने मठयाई/पुक्ख थी लगुरी सारेयां जिक्की-जिक्की खाई/चले सारे पंडिता सौगी करने जो मिलणी/बापू, मामा, भाई, ताऊ री हुई छैल मिलणी।’ वोटर का कत्र्तव्य बताते हुए कवि ‘बोट जरूर पाओ लोको’ नामक कविता में कहता है, ‘वोट पाणे जरूर जायों मेरे पैण-पाई/घरे नी रवे कोई बी दादी-ताई/मना री वाजा ते सारे वोट पायो/जेड़ा खरा लगदा तिस्सा ई जतायो।’ इस संग्रह में 108 कविताएं संकलित हैं। काव्य संग्रह लेखन में कवि की गहराई एवं चिंतन के साथ-साथ मातृभाषा एवं स्थानीय बोली के प्रति प्रेम व सम्मान को भी दर्शाता है। कवि ने समसामयिक विषयों और रोजमर्रा के जीवन में जो अनुभव किया, उसी विषय पर कविताएं लिखी गई हैं, जैसे कि जणेत, फोरलेना रा फेरा, करसाणा री जिन्द, मुआ स्याला, बोट मींजो पायों आदि।
अनूप सेठी की चयनित कविताओं का गुलदस्ता ‘समकाल की आवाज’ बन कर पेश हुआ है। कुल 56 कविताओं के आंचल में दुनिया भर के जज्बात, लेकिन पहाड़ की महक, यादों के झरोखे और एहसास लिए कवि बादलों की तरह समुद्र से पर्वत तक की दुनिया समेट लेता है। अपनी धाराओं-धारणाओं के कवि प्रकृति के लंबे कैनवास पर काम करते हैं। इनकी कविताएं कूची बन जाती है, जब पहाड़ की सफेदी से मुंबई के तट पर सागर सा लिखते हैं, ‘आएगी सीढिय़ों से धूप, बंद द्वार देखकर लौट जाएगी, खिडक़ी में हवा हिलेगी, सिहरेगा नहीं रोम कोई, पर्दों को छेडक़र उड़ जाएगी, पहाड़ी मोड़ों को चढक़र रुकेंगी बसें, टकटकी लगा के देखेगी नहीं कोई आंख!’ जिंदगी की उड़ान में त्रासदियों के घरौंदे भी कभी जमीन की शून्यता को नहीं भूलते। कविता अपनी मिलकीयत के लिए जब
यह कहानी कश्मीर में आतंकवाद पर केंद्रित है। घाटी से जबरन निकाले गए समुदाय विशेष के लोग सहायता शिविरों में रह रहे हैं। वहां पर रिलीफ के लिए अक्सर लंबी-लंबी कतारें लगी रहती हैं। समुदाय विशेष की बेटियों से रेप होते हैं, उन्हें मार दिया जाता है। कहानी का नायक एक युवक है जो अपनी मां के साथ शिविर में रहता है। वह अपनी मां के पूछने पर मां को आश्वासन देता है कि हम जल्द ही अपने घरों में लौट जाएंगे। क्या यह सपना पूरा हुआ या नहीं, यह जानने के लिए पढ़ें इससे आगे की कहानी...
क्या हम, आप और देश के करोड़ों लोग ‘भारतीय’ हैं? क्यों...यह सवाल क्यों उठना चाहिए? यकीनन हम ‘भारतीय’ हैं, लेकिन जीवन के किसी मोड़ पर आप को कहा जाए कि ‘भारतीयता’ साबित करो, तो आप क्या करेंगे? असमर्थ और असहाय महसूस करेंगे, क्योंकि यह बेहद पेचीदा मामला बन गया है। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट महज एक यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं है। यह व्यवस्था 1967 से जारी है, जब पासपोर्ट कानून बनाया गया था। सर्वोच्च अदालत भी 2006 और 2013 में दो महत्वपूर्ण फैसले सुना चुकी है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं है। 2013 में