विचार

पीएम किसान योजना के तहत पात्र किसान परिवारों को हर चार महीने में 2000 रुपए की तीन समान किस्तों में 6000 रुपए प्रति वर्ष की सहायता प्रदान की जाती है… मोदी सरकार के आठ वर्ष अभी कुछ ही दिन पहले मई के अंतिम सप्ताह में पूरे हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज़ादी के अमृत

भाजपा-एनडीए, बीजद, वाईएसआर कांग्रेस आदि की राष्ट्रपति उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के नामांकन-पत्र दाखिल करने के साथ ही यह मानने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि देश का 15वां राष्ट्रपति प्रथम आदिवासी महिला का चेहरा ही होना चाहिए। द्रौपदी दूसरी महिला राष्ट्रपति होंगी, क्योंकि उनसे पहले प्रतिभा पाटिल ‘राष्ट्रपति भवन’ में रह चुकी हैं। मुर्मू

आज यही हो रहा है। देश में बेरोजगार युवकों ने सरकार की ‘अग्निपथ’ योजना के विरोध में उत्पात मचा रखा है। ऐसे उत्पाती माहौल में मेरा यह पूछना शायद किसी को न भी भाए, लेकिन मैं पूछना चाहती हूं कि इस तरह उत्पाती रास्ते से अपनी बात मनवाने का बीज किसने बोया? किसी जांच-पड़ताल, सलाह-मश्विरे

देश में जिस तरह से हर दिन नया मुद्दा खबरों में चर्चा का विषय बना हुआ है उनको देखते हुए परिस्थिति तथा मुद्दों का सही आकलन करने वाले बुद्धिजीवी भी संशय में हैं कि मौजूदा हालात में कौन सा विषय कितना महत्वपूर्ण है। ज्ञानवापी मस्जिद से शुरू हुई चर्चा नूपुर शर्मा के पैगंबर मोहम्मद पर

हिमाचल में दर्पणतोड़ प्रतियोगिता में फंसी राजनीति को शायद यह भ्रम है कि यहां एक दूसरे पर कीचड़ फेंक कर उज्ज्वल हुआ जा सकता है। इसे हम सियासी रंगड़ भी मान सकते हैं, जो काटने को दौड़ रहे हैं। विरोध की अति में भी शब्दावली की शालीनता का अर्ज किया है, अगर गुस्सैल रहे या

लोकतंत्र में यह कोई हैरत की बात नहीं कि कोई किसी भी राजनीतिक पार्टी का छोटा-बड़ा राजनेता पार्टी बदलता है, जब किसी राजनेता को अपनी मौजूदा पार्टी की हाईकमान की नीतियां गलत लगे तो वो पार्टी बदलने में पूर्ण रूप से स्वतंत्र होता है। लेकिन जब कोई वर्षों तक पार्टी में रहा हो और जो

भारत ने ठाकरे राजवंश का सद्य आरोपित पौधा उखाड़ दिया और वहां विचार पूंजी को लेकर राजवंशियों से प्रश्न पूछने शुरू कर दिए तो पूरा राजवंश ‘वर्षा’ छोड़कर मातोश्री में चला गया। और अब द्रौपदी मुर्मू भाजपा की ओर से भारत के राष्ट्रपति पद की प्रत्याशी होंगी। ओडीशा के सुदूरस्थ मयूरगंज जिला के पिछड़े क्षेत्र

सिरमौर में कांग्रेस के नक्षत्र जिस खुर्दबीन से देखे गए, वहां पार्टी ने खुद को सहेजा जरूर है। दरअसल पार्टी की बाहरी व आंतरिक कार्ययोजना अगर एक तरह का संदेश देने में सक्षम होगी, तो किसी भी चुनौती में मलाल नहीं होगा। कम से कम सिरमौर के लटके-झटकों में फंसी कांग्रेस ने सामने देखने की

दंगा हमारा राष्ट्रीय कार्यक्रम है। हमारे देश में यह प्रायोजित भी करवाया जाता है। वक्त जरूरत जिसको इसकी आवश्यकता होती है, वह दंगा उठा लेता है और दे मारता है देश के भाल पर। राष्ट्रवादियों ने इसे तहेदिल से अपनाया है। यह कहना भी अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि अब दंगा ही हमारी राष्ट्रीय मुख्यधारा का