विचार

अटल टनल  बनने से पहले यही स्नो कटर रोहतांग और कोकसर तक सड़क पर गिरी लगभग दो मंजिला बर्फ की तहों को साफ करते थे। शिमला, मनाली, किन्नौर, लाहुल और स्पीति जैसी जगहों पर सर्दियों में स्नो मैनेजमेंट के लिए अति आधुनिक उपकरणों का प्रयोग करना होगा ताकि बर्फबारी से हो रही मुश्किलों को आसान

महीना की पहले अचानक हमारे मुहल्ले के कुत्तों के साथ एक नया कुत्ता कहीं से आकर और रोटी ढीस जुड़ गया। वैसे मैंने तो उसे उसकी बदतमीज हरकतों को देख पहली झलक में ही जान लिया था कि यह कुत्ता किसी मुहल्ले का कुत्ता नहीं। किसी और ही टाइप का है। मन किया, इसे रोटी

26 जनवरी के राष्ट्रीय पर्व पर कवि हरिवंश राय बच्चन की एक कविता की इन पंक्तियों में लिखा है कि ‘कठिन नहीं होता है बाहर की बाधा को दूर भगाना, कठिन नही होता है बाहर के बंधन को काट हटाना, गैरों से कहना क्या, मुश्किल अपने घर की राह सिधारे।’ हमारे देश में कई राष्ट्रीय

विडंबना है कि उप्र में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, लेकिन बात पाकिस्तान और उसके संस्थापक आका जिन्ना की हो रही है। आम आदमी के सरोकारों पर मुद्दे बुलंद किए जाने चाहिए। रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा, किसान और गन्ने, बिजली, सड़क, पानी, जन-कल्याण आदि के स्थानीय सवालों पर राजनीतिक दलों को कटघरे में खड़ा

पूर्ण राज्यत्व दिवस की लोरी में सुकून की नींद तो ली जा सकती है और घोषणाओं की उदारता में वर्तमान सरकार के रंग भी देखे जा सकते हैं। पल भर के लिए भूल जाएं कि ये घोषणाएं कितनी महंगी और खर्च से भरी हुई हैं, लेकिन एक बड़े वर्ग की अरदास में सरकार की ओर

अतः यदि इस 37000 रुपए प्रति सच्चे छात्र की रकम को प्रदेश के सभी छात्रों यानी सरकारी एवं प्राइवेट स्कूल दोनों में पढ़ने वाले छात्रों में वितरित किया जाए तो प्रत्येक छात्र पर उत्तर प्रदेश सरकार लगभग 20000 रुपए प्रति वर्ष खर्च रही है। सुझाव है कि चुनाव के इस समय पार्टियां वायदा कर सकती

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा दिल्ली के दिल में लगी, यही तो है भारत की आत्मा का जागरण… भारत क्या है, जब यह सवाल खड़ा होता है तो सहज में ही हिमालय पर्वत से लेकर हिंद महासागर तक फैले हुए भू-भाग पर दृष्टि जाती है। जब हिमालय से समुद्र पर्यन्त नज़र दौड़ाते हैं तो

मसला शराब का जहर बनने तक सीमित होता, तो उसके अंजाम में एक घटनाक्रम का अफसोस, आक्रोश और आक्रंदन होता, लेकिन यहां तो पूरी फितरत ही तबाही के आगोश में रची बसी है। यह मसला जहरीली शराब के सरगना, सप्लायर या उपभोक्ता के बीच का तंत्र नहीं, बल्कि अमानवीय कृत्यों की पनाह का बन चुका

‘यह दुर्भाग्य रहा कि आज़ादी के बाद देश की संस्कृति और संस्कारों के साथ ही अनेक महान व्यक्तियों के योगदान को मिटाने का काम किया गया। स्वाधीनता संग्राम में लाखों लाख देशवासियों की तपस्या शामिल थी, लेकिन उनके इतिहास को भी सीमित करने की कोशिशें की गईं। आज आज़ादी के दशकों बाद देश उन गलतियों