विचार

हमारे देश को आजाद कराने के लिए बहुत से देशभक्तों ने अपना सब कुछ, यहां तक कि जान भी कुर्बान कर दी। ऐसे ही देशभक्तों में महात्मा गांधी जी का नाम सर्वोपरि है। सोमवार 30 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि है। इस अवसर पर पूरा देश उनको आदरांजलि देगा। महात्मा गांधी का विचार था कि सत्य

वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण संसद में बजट पेश करेंगी, तो वह कई आयामों से महत्त्वपूर्ण होगा। वह मोदी सरकार की ‘अग्नि-परीक्षा’ भी हो सकता है, क्योंकि इसी साल जम्मू-कश्मीर समेत 10 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। 2024 में 18वीं लोकसभा के लिए चुनाव होंगे। इस साल जहां चुनाव

हम भाग्यशाली हैं कि ‘गांधी’ भारत में पैदा हुए, जिन्होंने अपने जीवन आदर्शों से मानव जीवन को नए आयाम दिए। अहिंसा, सत्य, स्वदेशी, असहयोग व स्वराज जैसे नए व अनूठे मंत्र दिए। गांधी आज भारत की ही नहीं, पूरी मानवता की अमूल्य धरोहर हैं। उन्हें गए 75 वर्ष जरूर हो गए हैं, पर उनके जीवन

जरूरी नहीं अभद्र लोग बेशर्म भी हो जाएं या हर बेशर्म को अभद्र होने का मौका मिल जाए। अभद्रता और बेशर्मी में अजीब सी प्रतिस्पर्धा सदियों से रही है। हर युग ने जिन्हें कबूल कर लिया, वे भद्र हो गए, इसलिए हमारे देश में स्वीकार्य होना खुद को भद्र बनाना है। अचानक एक दिन मोबाइल

पुन: हिमाचल के सरकारी होटलों में पंचकर्म उपचार की परिपाटी जोड़ी जा रही है और इस तरह मेडिकल टूरिज्म के खाके में आशाजनक हलचल महसूस की जा सकती है। आयुष मंत्री हर्षवर्धन सिंह चौहान ने इस दिशा में प्रारंभिक कदम उठाते हुए हिमाचल को पंचकर्म उपचार का डेस्टिनेशन बनाने की हर संभावना को संबोधित किया

साहित्य की निगाह और पनाह में परिवेश की व्याख्या सदा हुई, फिर भी लेखन की उर्वरता को किसी भूखंड तक सीमित नहीं किया जा सकता। पर्वतीय राज्य हिमाचल की लेखन परंपराओं ने ऐसे संदर्भ पुष्ट किए हैं, जहां चंद्रधर शर्मा गुलेरी, यशपाल, निर्मल वर्मा या रस्किन बांड सरीखे साहित्यकारों ने साहित्य के कैनवास को बड़ा

व्यक्तियों के प्रभाव से अपनी सुविधा के अनुसार नियमों में परिवर्तन न हो, अन्यथा व्यवस्था में अराजकता व व्यवधान पैदा होता है… स्थानांतरण किसी भी अधिकारी-कर्मचारी के व्यावसायिक जीवन की एक सामान्य प्रक्रिया है। सरकार के अधीन किसी विभाग में कार्यरत अधिकारी या कर्मचारी का ही स्थानांतरण होता है अन्यथा अपना व्यक्तिगत काम-धंधा, दुकान, उद्योग

आश्चर्य की बात यह है कि राजनीतिक दल जहां अन्य स्वतंत्रता सेनानियों पर दावेदारी को लेकर विवादों में घिरे रहते हैं, वहीं भगत सिंह की शहादत को मुद्दा बनाने से कतराते रहे हैं। दरअसल राजनीतिक दलों के नेताओं को अंग्रेजी शासन व्यवस्था के खिलाफ ब्रिटिश संसद में बम फोड़ कर अपनी आजादी की मांग करने

एक विज्ञापन मुझे पटाने लगा है। भक्तिशाली विज्ञापन में मॉडलिंग की हुड़दंगी फिल्मों के खलनायक ने, जिन्होंने हीरो से खूब झाड़ू और झाड़ खाई। झाड़ू बेचने वाली कम्पनी अनुभवी है। दिल चाहता है झाड़ू को झाड़ू न लिखकर झाड़ूजी लिखूं। अच्छी, प्रभावशाली चीजों के नाम के साथ जी लिखना और बोलना सभ्य संस्कृति है। विज्ञापन