विचार

हम जिस तकदीर को सियासत को सौंप देते हैं, वही हमारे फैसलों के गुनाह में शरीक होती है। ऐसा नहीं कि जो नेता अपराजेय रहे, वही कद्दावर हो गए, कई बार हार कर भी मंजिलें कबूल करती हैं। हिमाचल अपने अस्तित्व से आज तक और वर्तमान से भविष्य तक जिस नेतृत्व को अंगीकार करता रहा या आइंदा देख रहा है, क्या वही सत्य है। कई झूठ भी जीत जाते हैं हमारी रजामंदी से, हमें तो अपनी राख होना भी इज्जत देता रहा। ऐसा भी नहीं कि प्रदेश में सियासत ने ही हमेशा धोखा दिया, बल्कि कई बार समाज की हसरतों ने कत्ल किए हैं। मंडी के ठाकुर कर्म सिंह के नाम से इस राज्य की तासीर बदल जाती, गर उस दौर की सूझबूझ में हुक्मरान चुनने की

कोर्ट ने सवाल किया कि कोई राज्य सरकार किसी व्यक्ति के हितों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट कैसे आ सकती है। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सीबीआई जांच का निर्देश देने वाले हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने से इनकार किया...

पुणे में एक किशोर द्वारा अपनी कार से नशा कर दो लोगों को कुचलकर मारना और फिर भी कानून द्वारा इस मामले में नरमी बरतना बहुत ही निंदनीय है, क्योंकि ऐसे में और भी ऐसे लोगों के हौसले बुलंद होंगे और वे वाहन चलाती बार लापरवाही बरतेंगे। मैं

ऐसा प्रतीत होता है कि बीबीएमबी का भी गुज्जर माफिया, अवैध खेती और अन्य गतिविधियों के प्रति मूक बने रहने के पीछे स्वार्थ है...

भीषण गर्मी पड़ रही है। सूर्य भी प्रचंड हो रहा है और मुखिया का भाषण भी आग उगल रहा है। यानी भाषण और गर्मी की दोहरी मार पड़ रही है। भाषण अटैची से शुरू होता है और अटैची पर खत्म हो जाता है। पब्लिक प्रचंड गर्मी से भी हलकान है और नेताजी के ‘राग अटैची’ की रहस्यमयी गुत्थी सुलझाने में भी नाकाम है। पब्लिक जगह-जगह पूछ रही है कि अटैची दिए गए थे तो अटैची गए कहां? जब अटैची दिए जा रहे थे तो सरकार कहां सोई थी और सरकार की सीआईडी कहां सोई थी? जब सरकार भी सोई थी और खुफिया एजेंसियां भी सोई थी, तो फिर जाग कौन रहा था? सरकार के बारे में तो माना जा सकता है कि सत्ता के नशे में चूर होकर सोई हुई थी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ डा. हेडगेवार के समय से लेकर डा. मोहन भागवत तक के काल में देश के इन्हीं सामाजिक-सांस्कृतिक मसलों से बावस्ता रहा है और प्रयास करता रहा है कि देश की राजनीति देश की समाज रचना और संस्कृति के केन्द्र बिन्दु के इर्द-गिर्द निर्मित होनी चाहिए...

इस तरह हर जिले में किसी न किसी खेल के लिए प्ले सुविधा उपलब्ध है। क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि अच्छे प्रशिक्षकों व पूर्व खिलाडिय़ों को बुलाकर शिक्षा व खेल विभाग मिलकर खेल अकादमियां खोल दें। प्रदेश के दूरदराज शिक्षा संस्थानों में भी उपलब्ध खेल

22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस दुनिया के बहुत से देशों में मनाया गया। इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण और प्रकृति के बीच एक संतुलन बनाकर रखना भी है। वर्ष 1992 में नैरोबी में जैव विविधता का सम्मेलन हुआ था। वहां पर इस दिवस को मनाने का फैसला लिया गया था। धरती पर अनेक जीव, जंतु और पेड़-पौधे हैं। ये सभी एक-दूसरे से अलग-अलग हैं, अर्थात इनमें विभिन्नता है। यह विभिन्नता ही जैव विविधता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इनमें बेशक विभिन्नता है, लेकिन एक दूसरे पर किसी न किसी रूप में निर्भर जरूर हैं। हमारा देश जैव विविधता प्रधान देश है। जैव विविधता के

चुनावी बिसात पर लड़ रहे मुद्दों के बीच हिमाचल के भ्रम भी डटे हुए हैं। चुनाव न सही कह पा रहा और न ही सुन रहा। वही दो चार अपशब्द, छह बागी पूर्व विधायक, बालीवुड की कंगना और गोदी-मोदी के बीच बंटवारे की हदें खोजता प्रचार। ये चुनाव गुजर जाएंगे, लेकिन लकीरें पीटते हमारे भविष्य के प्रश्र लंबित रह जाएंगे। प्रदेश के समाज, लोगों और सरकारों के ढर्रे को यह भ्रम सदैव रहा है कि हि