
‘शहर जैसे गांव’ से पहले ‘गांव को गांव जैसे’ बने रहने की संगत, सद्भावना, शिष्टाचार, आर्थिकी व सामुदायिक भावना का संरक्षण करना चाहिए। पर्वतीय राज्य की आचार संहिता से बाहर शहर अगर चार कदम चल रहे हैं, तो गांव चालीस चल रहे हैं। ऐसे में शहर जैसे गांव की परिभाषा में कई शर्तें, सुविधाएं, व्यवस्था, नियोजन, आर्थिकी, अधोसंरचना और विश्वास की कसौटियां शिरकत कर सकती हैं। मुख्यमंत्री ने नेरवा में अग्निशमन चौकी का लोकार्पण पर जो कहा, कमोबेश वही सब इलेक्ट्रिक बसों के रूटों के आबंटन में सामने आ रहा है। प्रदेश के कई वक्तव्य गांव में सिद्ध होते हैं, लेकिन कृषि व बागबानी के सबूत पूरे हिमाचल की देखरेख नहीं करते। जब पालमपुर में कृषि और सोलन में बागबानी विश्वविद्यालय बसे थे, तो आशाएं गांव की दोपहर को जगाती थीं। सेब से लदी टहनियां आत्मसम्मान के गीत गाती थीं। उधर बिलासपुर-ऊना की मक्की अपनी मूंछों को ताब देती थी, तो कांगड़ा का धान महक घोलता था। कभी उत्पादन की चर्चा में हर हिमाचली चूल्हा आत्मनिर्भर होने का दंभ भरता था, लेकिन क्या आज गांव का खेत और खड्ड का घराट बचा। गांव तक खुल गए रिटेल स्टो
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस और विपक्षी दल ही संसद में हंगामा करते हैं। जब भाजपा विपक्ष में थी, तब भी यही हाल था। भाजपा के सांसद संसद में जमकर हंगामा करके संसद को ठप कर देते थे। सारे दल इस लिहाज से एक जैसे नजर आते हैं। सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह है कि संसद में अरबों रुपए बर्बाद करके जो हंगामा किया जाता है, वह देश के लोगों की भलाई के नाम पर होता है। इससे बेहतर तो यही है कि इस धन राशि को सीधे विकास कार्यों में खर्च किया जाता...
आजादी तब सार्थक होगी जब गरीब बीमारी के कारण कर्ज में न डूबे, युवा रोजगार के लिए अपना घर छोडऩे को मजबूर न हो, किसान अपनी फसल के उचित मूल्य के लिए संघर्ष न करे और किसी बच्चे की प्रतिभा संसाधनों के अभाव में दम न तोड़ दे...
मुल्क के परम सम्माननीय, सर्वशक्तिमान और अदृश्य तंत्र महाराज, स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर एक आजाद गण का आपको कोटि-कोटि नमन! 15 अगस्त फिर आ गया है। तिरंगा फहरेगा, देशभक्ति के गीत बजेंगे, शहीदों को याद किया जाएगा और हमें बताया जाएगा कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के आजाद नागरिक हैं। यह अलग बात है कि भाषण खत्म होते ही आम आदमी अपनी जेब टटोलकर पूछता है- तरक्की आखिर गई तो गई कहां? महाराज, एक सवाल पूछूं- क्या सचमुच हम आजाद हैं? हमारे पुरखों ने अंग्रेजों से आजादी इसलिए मांगी थी कि कोई विदेशी हुकूमत उन पर हुक्म न चलाए। उन्हें क्या मा
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक बार फिर भारत को सिंधु जल समझौते के मुद्दे पर धमकी देने की कोशिश की है। उनका कहना है कि पाकिस्तान के हिस्से के पानी में कोई कमी करने या उसे रोकने की कोशिश हुई तो पाकिस्तान इसका मुंहतोड़ जवाब देगा। साथ ही उन्होंने कश्मीर पर पाकिस्तान के पुराने रुख को दोहराते हुए कहा कि इस मुद्दे पर उनका देश कभी पीछे नहीं हटेगा। अपने भाषण में उन्होंने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की प्रशंसा करते हुए यह दावा भी किया कि उनके नेतृत्व में पाकिस्तान ने भारत को पराजित किया। पाकिस्तान आज भी वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर रहा। उसे भारत से पानी तभी मिलेगा, जब वह भारत में फैलाए जा रहे आतंकवाद का हिसाब देगा।
पाकिस्तान के लोग भी अब यह समझने लगे हैं कि अरब और तुर्क उनको अपने बराबर का मुसलमान नहीं समझते, बल्कि वे उन्हें अपना गुलाम ही मानते हैं। सैयद अपनी लडक़ी की शादी किसी बड़े से बड़े देसी मुसलमान से भी नहीं करेंगे। उनके लिए देसी मुसलमान एक प्रकार के अछूत हैं। देसी मुसलमानों की जड़ भारत में है, न कि अरब में। पाकिस्तान में बलोच, पश्तून और सिन्धी अब इसको जान गए हैं। भारत का देसी मुसलमान भी एटीएम के शिकंजे से निकलने के लिए चेतन हो गया है...
आज राज्य में विभिन्न खेलों सहित तेज गति के उभरते हुए खिलाड़ी व एथलीट हैं जिनको वजीफे की बहुत अधिक जरूरत है। इनके पास नौकरी नहीं है। सामान्य परिवारों से इनका संबंध है, जो हिमाचल से पलायन कर गए हैं। हिमाचल सरकार सम्मानजनक नौकरी दे तथा इन सभी एथलीटों को 2028 ओलंपिक खेलों तक वजीफा भी दे। इस स्तर पर अपना अभ्यास जारी रखने के लिए महीने में पचास हजार रुपए चाहिए होते हैं। जो नौकरी में हैं, वो तो बहुत कठिनाई से अपने वेतन से कुछ न कुछ जुगाड़ कर लेते हैं, मगर जो विद्यार्थी व बेरोजगार हैं, वे कैसे अपना अभ्यास जारी रखें, यह हिमाचल सरकार को सोचना होगा। क्या प्रदेश सरकार कुछ उपकार इन प्रतिभाशाली एथलीटों पर करेगी ताकि वे फ्री माइंड होकर अपना प्रशिक्षण जारी रख सकंे...
हैलमेट का जिस किसी ने भी आविष्कार किया हो, धन्य है। ऐसे हालात में तो इसकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है, जबकि दुर्घटनाएं दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हों। मेरे एक मित्र हैं श्यामलाल। वे सोते हैं तब भी हैलमेट लगाते हैं। मैंने पूछा, ‘अमां यार, यह क्या चक्कर है? सोते समय हैलमेट का प्रयोग समझ में नहीं आया।’ सकुचाते हुए बोले- ‘दरअसल मेरी पत्नी के हाथ नींद में भी चलते हैं। ऊपर से मुझे नींद में चलने की बीमारी अलग है।’ देख लीजिए कितना उपयोगी हुआ हैलमेट का प्रयोग। पड़ोस में जो शर्मा जी रहते हैं, वे लेन-देन का काम करते हैं। जब भी रुपयों की उगाही को निकलते हैं तो हैलमेट लगाकर जाते हैं। मैंने कहा, ‘शर्मा जी, ब्याज लेने जाते हैं तो यह हैलमेट क्यों?’ अपने सिर से हैलमेट हटाकर पांच टांके बताते हुए बोले- ‘एक ग्राहक ने उधार लिया, पैसा लौटाना तो दूर, लठ्ठ दे मारा, पूरे पांच टांके आए। उसके बाद से तो मैंने हैलमेट का प्रयोग शुरू कर दिया। अब आपको बताऊं, परसों एक ग्राहक से ऐसी ही नौबत आई तो
राहुल गांधी और अमित शाह बुनियादी तौर पर दोनों लोकसभा सांसद हैं। चूंकि राहुल विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के संसदीय दल के नेता हैं, लिहाजा उन्हें ‘नेता प्रतिपक्ष’ तय किया गया है। अमित शाह प्रधानमंत्री मोदी की कैबिनेट के सदस्य हैं और उन्हें ‘गृहमंत्री’ का दायित्व सौंपा गया है। दोनों ही नेता संसद से ‘सुप्रीम’ नहीं हैं और न ही लोकसभा उनकी बपौती है। दोनों ही संसद के प्रति जवाबदेह हैं और नियम-प्रक्रिया से बंधे हैं। दिल्ली में छात्र, युवा आंदोलन के बाद गृहमंत्री अमित शाह संसद में दिखाई नहीं दिए। संसद भवन के अपने चैंबर में उपस्थित रहना और सदन में मौजूदगी बिल्कुल विपरीत स्थितियां हैं। गृह