प्रतियोगी पुस्तकें पढ़ना ही पसंद कर रही युवा पीढ़ी, हिंदी साहित्य से किनारा, अंग्रेजी को विशेष तवज्जो

By: -नाहन से सूरत पुंडीर की रिपोर्ट Sep 21st, 2020 11:30 am

हिंदी भाषा को आज के दौर में केवल एक औपचारिक भाषा बन कर ही  रह गई है। हालांकि हिंदी भाषा को लोग आम बोलचाल में बोलना बेहद पसंद करते हैं, लेकिन आज के युवाओं की बात करें, तो वे हिंदी के बजाय अंगे्रजी भाषा को विशेष तवज्जो देते हैं। हिंदी को केवल एक विषय समझा जाता है। हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया गया और हिंदुस्तानी होने में गर्व किया जाता है, लेकिन हिंदी भाषा बोलने में अपमान महसूस किया जाता है। लोग कहते हैं हिंदी नहीं, अंग्रेजी सिखाएंगे और अंग्रेजी सीखेंगे तो कुछ बनकर दिखाएंगे। यही कारण है कि आज के दौर में हिंदी भाषा के लिए पाठकों का रूझान कम देखने को मिल रहा है। इसी को लेकर ‘दिव्य हिमाचल टीम’ ने हिमाचल प्रदेश के साहित्यकारों और पाठकों का हिंदी भाषा के प्रति किस तरह का रुझान है, को लेकर नब्ज उनकी टटोली है। 

-नाहन से सूरत पुंडीर की रिपोर्ट

मोबाइल क्रांति ने घटाई हिंदी किताबें पढ़ने वालों की संख्या

दिव्य हिमाचल ब्यूरो — नाहन

किसी जमाने में हिमाचल के इतिहास के पन्नों की शान रहे महिमा पुस्तकालय नाहन का भले ही राज्य पुस्तकालय से दर्जा घटाकर जिला पुस्तकालय कर दिया गया हो, लेकिन अभी भी सिरमौर जिला के मुख्यालय नाहन स्थित 1926 की स्थापित महिमा पुस्तकालय की अपनी शान व इतिहास है। हिमाचल प्रदेश में महिमा पुस्तकालय नाहन का नाम अब तक प्रत्येक प्रतियोगी परीक्षाओं के दौरान भी परीक्षा का एक अहम प्रश्न होता था ऐसे में महिमा पुस्तकालय का दर्जा जिला पुस्तकालय कर दिया गया है। वर्तमान में नाहन महिमा पुस्तकालय में कुल 86602 पुस्तकों में से 45107 पुस्तकें हिंदी साहित्य से जुड़ी हुई हैं। पिछले करीब चार से पांच वर्षों की यदि बात की जाए, तो हिंदी की पुस्तकें पढ़ने वालों की संख्या में कमी आई है। इसका मुख्य कारण मोबाइल क्रांति भी माना जा रहा है। पुस्तकालय में करीब 120 ऐसी पांडुलिपियां हैं, जो रियासत काल के समय की एक विरासत हैं। हिंदी साहित्य की बात करें, तो हिंदी के प्रति युवाओं की रुचि कम हो रही है। पुस्तकालय में जितने भी पाठक आते हैं, उनमें अधिकांश युवा पीढ़ी है, जो प्रतियोगी पुस्तकों को पढ़ना पसंद करते हैं। महिमा पुस्तकालय नाहन में वर्तमान में विभिन्न श्रेणी के 3500 के करीब सदस्य हैं। नाहन के युवा साहित्यकार पंकज तन्हा का कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में क्योंकि अंग्रेजी को तवज्जो दी जाती है। यही कारण है कि युवा पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम को ज्यादा पसंद करती है। नाहन के साहित्यकार श्रीकांत अकेला का कहना है कि राष्ट्र भाषा हिंदी को प्रत्येक प्रतियोगी परीक्षा का अहम हिस्सा बनाना होगा, ताकि युवा पीढ़ी हिंदी से दूर न भागे।

बैठने की क्षमता कम

जिला महिमा पुस्तकालय नाहन की स्थापना 1926 में हुई थी। सिरमौर रियासत के तत्त्कालीन शासक ने अपनी बेटी महिमा की पुस्तकों के प्रति रुचि को देखते हुए महिमा पुस्तकालय की स्थापना की थी। पुस्तकालय फिलहाल दशकों पुराने भवन में चल रहा है। इसके चलते पाठकों के संख्या की तुलना में बैठने की क्षमता कम है। पुस्तकालय में एक नए हाल का निर्माण किया जा रहा है।

वरिष्ठ नागरिक ही पहुंच रहे

महिमा पुस्तकालय नाहन की जिला पुस्तकालय अध्यक्ष कांती सूद ने बताया कि पुस्तकालय में आने वाली युवा पीढ़ी हिंदी के प्रति कम रुचि रखती है। केवल वरिष्ठ नागरिक ही हिंदी की पुस्तकें पढ़ने के लिए मांगते हैं। पुस्तकालय में फिर भी हिंदी साहित्य की पुस्तकों का बड़ा भंडार है। युवा पीढ़ी अकसर प्रतियोगी परीक्षाओं की अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकें पढ़ना पसंद करते हैं। उन्होंने स्थानीय साहित्यकारों का भी आह्वान किया है कि वह अपनी पुस्तकें पुस्तकालय में अवश्य रखें।

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