विश्व गुरु की शिक्षा, शिक्षक व शिष्य संस्कृति: प्रताप सिंह पटियाल, लेखक बिलासपुर से हैं

प्रताप सिंह पटियाल, लेखक बिलासपुर से हैं By: प्रताप सिंह पटियाल, लेखक बिलासपुर से हैं Sep 16th, 2020 7:05 am

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक बिलासपुर से हैं

आज भी देश के बडे़ शिक्षण संस्थानों के दीक्षांत समारोहों में काले गाउन की मौजूदगी लार्ड मैकाले की उस विदेशी परंपरा की याद दिलाती है जिसने भारतीय शिक्षा की सबसे पुरानी व विकसित व्यवस्था की रीढ़ को ध्वस्त करने में मुख्य भूमिका निभाई थी। इसी कारण आज देश में शिक्षा एक बडे़ बिजनेस का रूप ले चुकी है। अत्यधिक फीस बढ़ोत्तरी से कई प्रतिभाएं महंगी शिक्षा ग्रहण करने में असमर्थ हैं…

किसी भी देश का भविष्य उसकी युवाशक्ति होती है तथा उस युवावेग के बेहतर भविष्य की बुनियाद सर्वप्रथम प्रारंभिक शिक्षा पर निर्भर करती है। देश में शिक्षा नीति पर समय के अनुसार बदलाव होता आया है और अब 34 वर्षों बाद देश में नई शिक्षा नीति लागू होने जा रही है। 2020 की इस शिक्षा नीति के अनुसार भारतीय भाषाओं पर ज्यादा फोकस होगा। भारत में पांच सितंबर को शिक्षक दिवस तथा यूनेस्को द्वारा 1994 से पांच अक्तूबर को अंतरराष्ट्रीय टीचर्स डे के रूप में मनाया जाता है, मगर भारत में गुरु पूर्णिमा प्राचीन काल से गुरु-शिष्य की समृद्ध संस्कृति व मुकद्दस रिश्ते का प्रतीक रही है। बेशक आज दुनिया के कई बडे़ देशों में कई विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थान मौजूद हैं, मगर भारत प्राचीन काल से विश्व में शिक्षा का सर्वश्रेष्ठ केन्द्र रहा है। गुरुकुल उस अनुशासनात्मक शिक्षण पद्धति की उत्कृष्ट प्रणाली थी। भारत की उस पुरातन शिक्षा व्यवस्था व संस्कृति के संचालक ऋषि मुनि तथा कई आचार्य हमारे धर्म के ध्वजवाहक भी रहे हैं।

भारतीय शिक्षा क्षेत्र में हजारों वर्ष पुरानी गुरु-शिष्य की समृद्ध परम्परा उन्हीं गुरुकुलों की देन है। उस संस्कृति का सदैव यही संदेश था कि गुरु के सान्निध्य में तथा उसी के प्रत्यक्ष निरीक्षण में शिक्षा अर्जित करके ही शिष्य में उच्च आदर्शों व संस्कारों का विकास संभव है। भारतीय धर्म ग्रंथों में महर्षि भारद्वाज, संदीपनी, वाल्मीकि, कण्व, धौम्य तथा द्रोणाचार्य जैसे महान् आचार्यों के गुरुकुलों तथा प्रकृति से सराबोर उनके प्रसिद्ध आश्रमों का जिक्र मिलता है। मगर वैदिक आचार्य शौनक ऋषि को भारत में हजारों वर्ष पुरानी  गुरु-शिष्य परंपरा के विस्तार का श्रेय दिया जाता है।

शौनक ऋषि पांडव पौत्र जनमेजय के सर्पसत्र यज्ञ के प्रमुख पुरोहित भी थे। उनके गुरुकुल में कई हजार शिष्य मौजूद थे जिसके वे कुलपति थे। इस वर्ष 21 जून को योग दिवस के अवसर पर नीदरलैंड की रक्षा मंत्री ‘ऐंक बिजलेवल’ ने विश्व को योग के रूप में शानदार तोहफा देने के लिए भारत का शुक्रिया अदा किया। ऐंक के अनुसार योग सशस्त्र बलों में मानसिक शांति व संतुलन बनाने में महत्त्वपूर्ण है। वर्तमान में योग को संयुक्त राष्ट्र सहित दुनिया के लगभग सभी देश अपना रहे हैं। उस योग के जनक तथा योगसूत्र संहिता के रचयिता महर्षि पतंजलि थे। शल्यचिकित्सा का पहला अध्याय महार्षि सुश्रुत के नाम से शुरू होता है। शल्य चिकित्सा के ज्ञान से भरा सुश्रुत संहिता ग्रंथ उन्हीं की देन है। आयुर्वेद के सिद्धांतों पर आधारित ‘चरक संहिता’ आचार्य चरक की रचना थी। दुनिया में जॉन डॉल्टन (1766-1844) व राबर्ट ओपनहाइमर को आधुनिक युग के न्यूक्लियर वैज्ञानिकों के रूप में जरूर जाना जाता है, मगर वास्तव में परमाणु सूत्र के जनक महर्षि कणाद थे जिन्होंने हजारों वर्ष पूर्व परमाणु सिद्धांतों की रचना कर डाली थी।

वर्ष 1976 में ‘यूनेस्को’ ने भारत के महान् गणितज्ञ व खगोलशात्री आर्यभट्ट की 1500वीं जयंती मनाई थी। देश में आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान संस्थान इसी भारतीय वैज्ञानिक के नाम पर रखा है। अब सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि प्राचीन काल से भारत में शिक्षा का स्तर व महत्त्व कितना था। देश में सार्वजनिक पुस्तकालयों की शुरुआत अंग्रेज हुकूमत के दौर से मानी जाती है, लेकिन भारत में 700 ईस्वी पूर्व ‘तक्षशिला’ को विश्व की प्रथम यूनिवर्सिटी होने का गौरव प्राप्त है, जहां चिकित्सा शास्त्र के साथ कई अन्य विषयों पर पढ़ाई होती थी। भारत के सुप्रसिद्ध विद्वान राजनीति, कूटनीति, रणनीति व अर्थशास्त्र के महान् परोधा आचार्य चाणक्य उसी तक्षशिला विश्वविद्यालय के शिष्य व शिक्षक थे जिनके द्वारा रचित ग्रंथों का विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

भारत के सदियों पुराने नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला, वल्लभी, सोमपुरा, शारदापीठ तथा पुष्पगिरी जैसे विश्वविख्यात शिक्षा केन्द्रों में हमारे आचार्यों द्वारा रचित हजारों पुस्तकों से सुसज्जित विशाल पुस्तकालय भी मौजूद थे। मगर विचारणीय विषय यह है कि जिस देश में पुरातन से सरस्वती जी को विद्या की देवी माना जाता है, जहां हजारों वर्ष पूर्व वेद, पुराण व उपनिषदों की रचना हो चुकी थी, पाणिनी, चाणक्य, आर्यभट्ट, शंकराचार्य व दुनिया में भारतीय युवावेग का परचम फहराने वाले स्वामी विवेकानंद जैसे विद्वानों के देश में आज युवाओं की योग्यता को परिभाषित करने के लिए आरक्षण का सहारा दिया जाता है। वर्तमान में देश का कोई विश्वविद्यालय विश्वस्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में असमर्थ है। देश की कई योग्य प्रतिभाएं शिक्षा के लिए विदेशों का रुख कर रही हैं। आज भी देश के बडे़ शिक्षण संस्थानों के दीक्षांत समारोहों में काले गाऊन की मौजूदगी लार्ड मैकाले की उस विदेशी परंपरा की याद दिलाती है जिसने भारतीय शिक्षा अध्ययन की सबसे पुरानी व विकसित व्यवस्था की रीढ़ को ध्वस्त करने में मुख्य भूमिका निभाई थी।

इसी कारण आज देश में शिक्षा एक बडे़ बिजनेस का रूप ले चुकी है। कोचिंग सेंटरों में लाखों रुपए की फीस तथा निजी शिक्षण संस्थानों में अत्यधिक फीस बढ़ौतरी से कई प्रतिभाएं महंगी शिक्षा ग्रहण करने में असमर्थ हैं। सरकारों को स्कूल फीस की एक सीमा निर्धारित करनी होगी। शिक्षा क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश 82.80 प्रतिशत साक्षरता दर के साथ देश में केरल के बाद दूसरे पायदान पर काबिज है। मगर राज्य के कुछ कॉलेज नैक से मान्यता लेने के लिए लिजिबल नहीं हुए हैं और ज्यादातर ए ग्रेड की पहुंच से दूर हैं। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा के बुनियादी ढांचे व गुणवत्ता में सुधार हो तो उच्च शिक्षा में यकीनन परिवर्तन होगा। बहरहाल आज देश की सड़कें, चौक चौराहे व शिक्षण संस्थान जिसके भी नाम पर हों, मगर भारत को समृद्धि व वैभव के शिखर पर पहुंचाने वाले देश की राष्ट्रीयता के प्रतीक हमारे ऋषि मुनि थे जिनके कड़े तप, उपासना व अनुभवों द्वारा रचित ग्रंथों में निहित ज्ञान से आधुनिक विज्ञान मदद लेता आया है। शिक्षा क्षेत्र में उनके वैश्विक योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वर्तमान में भारत की उस पुरातन शिक्षा प्रणाली का अनुसरण करने की जरूरत है जिसमें राष्ट्र धर्म को अधिमान मौजूद था।

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