कोरोना ने बिगाड़ा मानसिक स्वास्थ्य: डा. वरिंदर भाटिया, कालेज प्रिंसिपल

डा. वरिंदर भाटिया By: डा. वरिंदर भाटिया, कालेज प्रिंसिपल Oct 21st, 2020 12:08 am

2019 में जारी नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट कहती है कि दिहाड़ीदार मजदूरों और विवाहित महिलाओं के बाद बेरोजगारों और छात्र-छात्राओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ी है। पिछले साल हर रोज 38 बेरोजगार और 28 छात्र-छात्राओं ने खुदकुशी की। ये आंकड़े बेकाबू होते हालात बयां करते हैं। 2019 में कुल 139123 लोगों ने आत्महत्या की, जिनका रिकॉर्ड दर्ज हुआ। इन 139123 लोगों में से 10.1 फीसदी यानी कि 14051 लोग ऐसे थे जो बेरोजगार थे। बेरोजगार लोगों की आत्महत्या का यह आंकड़ा पिछले 25 सालों में सबसे अधिक है। 2018 में आत्महत्या करने वाले बेरोजगार लोगों की संख्या 12936 थी। अब जब देश में लाखों लोग अपनी आमदनी खो चुके हैं, तब जिंदगी से हताश लोगों की मनोदशा क्या होगी, यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है…

कोरोना से पैदा हुई आर्थिक तंगी से इस समय देश की बहुसंख्या प्रभावित है। परिवार के खर्चे,  इलाज का बोझ, दो वक्त की रोटी और जिंदगी की अनेक जरूरी चीजों के लिए जुगाड़ करना आजकल कठिन हो गया है। ताजा खबर है कि पंजाब के फरीदकोट में एक शख्स ने अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ आग लगाकर जान गंवा ली। खबरों के मुताबिक आर्थिक तंगी के चलते शायद यह कदम उठाया गया। ऐसी अनेक खबरें पिछले कई महीनों से सुर्खियों का हिस्सा हैं। इन घटनाओं का एक मुख्य कारण देश में कोरोना जनित आर्थिक तंगी और अन्य कारणों से अनेक लोगों का बिगड़ता मानसिक स्वास्थ्य भी है। पिछले कुछ समय में पूरी दुनिया में कोरोना के साथ-साथ ही डिप्रेशन और आत्महत्याओं के मामलों में तेजी से इजाफा हुआ है। एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल विश्व में आठ लाख और देश में 2 से 3 लाख लोग आत्महत्या करते हैं। वहीं हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति खुदकुशी करता है। भारत में हर चार मिनट में एक व्यक्ति खुदकुशी कर रहा है, लेकिन वर्तमान में चल रहे कोरोना काल में आत्महत्या के मामले दोगुने या उससे भी ज्यादा हो गए हैं। इसके तीन कारण हैं। पहला, बेरोजगारी और धंधा चौपट होने से पैदा हुई आर्थिक तंगी, दूसरा कोरोना होने का डर और तीसरा समाज से दूरी बढ़ने के कारण अकेलापन महसूस करना है।

वर्ष 2019 में ग्लोबल बर्डन ऑफ डिसीज नामक इंटरनेशनल हेल्थ आर्गेनाइजेशन भी अपने सर्वे में बताता है कि भारत में हर चार मिनट में एक व्यक्ति खुदकुशी कर रहा है। बता दें कि 2018 में यही आंकड़ा 1 लाख 34 हजार लोगों द्वारा खुदकुशी करने का था। मतलब साफ है कि मानसिक तनाव में लोगों में खुदकुशी करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। खुदकुशी करने वालों से ज्यादा खुदकुशी की कोशिश करने वालों की तादाद बहुत ही ज्यादा है। सुसाइड प्रिवेंशन इंडिया फाउंडेशन का कोविड-19 क्लूज ऑनलाइन सर्वे बताता है कि भारत में आत्महत्या की दर वैसे भी वैश्विक औसत से 60 प्रतिशत से भी ज्यादा है। कोरोना के बाद से देश में खुद को चोट पहुंचाने, अपनी मौत की चाहत रखने और खुद की जान लेने की प्रवृत्ति में कई गुना वृद्धि हुई है। बीमारी के भय और जिन आर्थिक विषमताओं का सामना लोगों को करना पड़ा है, उससे कई लोगों ने खुद को मारने के बारे में सोचा या कोशिश कीष। साथ ही 71 फीसदी लोगों में कोरोना के बाद मरने की इच्छा बढ़ गई।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण की 2016 में सरकारी रिपोर्ट कहती है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य से 15 करोड़ भारतीय जूझ रहे हैं, जबकि सेवाएं सिर्फ  तीन करोड़ भारतीयों को मिल रही हैं। कोरोना काल के इन 6 महीनों में देश की 70 फीसदी से भी ज्यादा आबादी किसी न किसी रूप में मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी मानता है कि भारत में कोरोना काल के दौरान मानसिक अवसाद से ग्रसित लोगों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ गई है। लांसेट पत्रिका में 2018 में प्रकाशित शोध कहता है कि विश्व की कुल जनसंख्या में भारतीय महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 18 फीसदी है, जबकि स्त्री आत्महत्याओं के मामले में यह हिस्सेदारी 36 फीसदी है। 2018 में एक लाख 34 हजार लोगों ने खुदकुशी की थी, जबकि 2019 में यह संख्या बढ़कर 2 से 3 लाख के बीच हो गई। विशेषज्ञों का मत है कि हर पांचवां भारतीय किसी न किसी तरह के मानसिक अवसाद से ग्रस्त है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम बजट कम होता जा रहा है। वर्ष 2018 में इसके लिए 50 करोड़ के प्रावधान को 2019 में घटा कर 40 करोड़ रुपए कर दिया गया, जबकि 2017 में ही कार्यक्रम को लागू करने के लिए 95 हजार करोड़ रुपए रखे गए थे। मतलब बहुत छोटा हिस्सा भी इस पर खर्च नहीं किया जा रहा है। 2019 में जारी नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट कहती है कि दिहाड़ीदार मजदूरों और विवाहित महिलाओं के बाद बेरोजगारों और छात्र-छात्राओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ी है। पिछले साल हर रोज 38 बेरोजगार और 28 छात्र-छात्राओं ने खुदकुशी की। ये आंकड़े बेकाबू होते हालात बयां करते हैं। 2019 में कुल 139123 लोगों ने आत्महत्या की, जिनका रिकॉर्ड दर्ज हुआ।

इन 139123 लोगों में से 10.1 फीसदी यानी कि 14051 लोग ऐसे थे जो बेरोजगार थे। बेरोजगार लोगों की आत्महत्या का यह आंकड़ा पिछले 25 सालों में सबसे अधिक है। 2018 में आत्महत्या करने वाले बेरोजगार लोगों की संख्या 12936 थी। अब जब देश में लाखों लोग अपनी आमदनी खो चुके हैं, तब जिंदगी से हताश-निराश लोगों और उनके परिवारों की मनोदशा कितनी गंभीर अवस्था में होगी, यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। इसके बावजूद जिंदगी से भागना कोई हल नहीं है। रात के बाद सवेरा होना लाजिमी है। क्यों न ऐसा यकीन रखें कि कोरोना की रात खत्म हो जाएगी। इसके साथ ही कोरोना की महामारी के बाद वर्तमान में देश की बड़ी आबादी को एक बेहतर मानसिक स्वास्थ्य की जरूरत है। हमारे लिए बेहतर है कि सोशल मीडिया की अफवाहों पर बिल्कुल भरोसा न करें।

पहले सत्य जांचें। जीवन से हारने से बड़ी कायरता कोई नहीं होगी। जीना छोड़ने का विचार एक तात्कालिक संकट है, जिसे सही समय पर मदद मिलने से टाला जा सकता है। हम सब सामाजिक स्तर पर मेल-मुलाकात के जरिए आपस में यह विश्वास पैदा करें कि अनिश्चितता से भरा कैसा भी समय हो, गुजर जाएगा। एक गुजारिश है कि कोरोना जनित कारणों से आर्थिक रूप से परेशान लोगों के सहारे के लिए सरकार, समाज, संगठन और हम सब मिलकर काम करें। अपने आसपास के लोगों की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक सहायता के लिए सम्पन्न लोग सामने आएं। कमजोर और मुश्किलों का सामना कर रहे लोगों की मदद करें। यही एक रास्ता महत्त्वपूर्ण है। निःसंदेह कोरोना के कारण परेशान कोई व्यक्ति आपको डिप्रेशन में दिखे तो आप कंधे पर हाथ रख कर कह सकते हैं, ‘दोस्त, ये भी वक्त है, जो गुजर जाएगा।’ कोरोना संकट के इस दौर में हमें एक-दूसरे की पूरी मदद करनी है तथा कमजोर लोगों को सहारा देना है। ऐसा करके हम इस संकट का सामना आसानी से कर पाएंगे और यह मुश्किल दौर गुजर जाएगा।

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