धृष्टता के लिए क्षमा मित्र!

By: अशोक गौतम Oct 28th, 2020 12:06 am

अशोक गौतम

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जैसे ही मुझे सरकार द्वारा मित्र को आनन-फानन में मारने की खबर सोशल मीडिया पर वायरल होती दिखी, मैंने बिन एक पल गंवाए मित्र शोक का जश्न मनाते फेसबुक खोली और अपने मौसरे को विनम्र श्रद्धांजलि देते मुस्कुराते टकाटक लिखा- ‘चार वेदों के ज्ञाता, पुराण पुरुष परम मित्र को विनम्र श्रद्धांजलि। मेरी यही कामना कि सरकार सादर उन्हें अपने चरणों में जगह दे और उनके परिवार के इधर-उधर बिखरे बंधु-बांधवों को इस असीम दुख को सहन करने की नकली शक्ति। ओम् शांति! ओम् शांति! ओम् शांति!’ अभी मैं फेसबुक पर उन्हें फेसबुकभीनी श्रद्धांजलि टाइप कर हटा ही था कि किसी ने स्वर्गलोक से जोरदार ठहाका लगाया। वह ठहाका सचमुच कोरोना से भी अधिक डराने वाला था। मित्र को जलाए जाने के बाद दूसरा इतना जोरदार ठहाके वाला कौन? ‘ये क्या नीचता कर दी तुमने मित्र होकर भी फेसबुक प्रेमी? तुम्हारे हाथ में फेसबुक है तो इसका मतलब ये तो नहीं हो जाता कि…’।

मैं और किसी का मित्र? हम तो जिसके भी हुए, मतलब के मित्र ही हुए दोस्तो हर जन्म में। ठहाकेदार आवाज कुछ जानी तो बहुत कुछ अनजानी लगी तो गेस करते-करते कुछ-कुछ पहचान सा गया कि हो न हो, ये तो कुछ देर पहले जबरदस्ती दिवंगत कराए अपने परम मित्र की सी आवाज है। अब अगला प्रश्न ये था कि ऐसे-ऐसे काम करने के बाद भी बंदे स्वर्गलोक में सेटल हुए तो कैसे? मित्रो! कहीं ऐसा तो नहीं कि हम जैसों को स्वर्ग भेजने के लिए अब नियम-कायदे बदले गए हों ताकि मरने के बाद हम जैसे वहां रहेंगे तो यहां तो कुछ अमन-चैन रहेगा? फिर भी मैंने श्योर से डेड श्योर होने के लिए स्वर्ग से आती आवाज से साठ के दिल पर हाथ धरे आधा डरते हनुमान चालीसा पढ़ते स्वर्ग की ओर मुंह कर पूछ ही लिया, ‘कौन?’ ‘मैं तुम्हारे खास दोस्त की आत्मा मित्र! हद हो गई ! जबरदस्ती मरने-मारने का नाटक करने के दूसरे घंटे ही भूल गए?

 कमाल है, जिंदा जी तो बड़े लंगोटिए बने फिरते थे?’ ‘ओह मित्र तुम! ये तो हद हो गई! मरने के तुरंत बाद जिंदा वाले से भी गजब का ठहाका लगा तुमने तो सच में अपने दोस्त को डरा ही दिया था। तुम्हें जल जलाकर, तुम्हारे संस्कार से बचा पी पिलाकर शासन प्रशासन अभी घर भी नहीं पहुंचा है और एक तुम हो कि…मान गए गुरु!’ ‘मैं अभी भी मजे में पूरा का पूरा जिंदा हूं दोस्त! इसलिए दोस्त होने के नाते तुम्हें प्यार से वार्निंग दे रहा हूं कि कानून व्यवस्था से लकदक समाज में जो मन में आए खुल्ले से करना, पर मुझे श्रद्धांजलि देने की गुस्ताखी कभी मत करना।’ ‘मतलब? तो कुछ देर पहले मैंने सोशल मीडिया पर वर्चुअली किसे जलाते देखा था?’ ‘वह तो तुम ही जानो। मित्र! मेरे जैसों की जड़ें हर समाज में इतनी गहरी हैं कि वे मुझ जैसों को साल के बदले पल-पल जलाते-जलाते थक जाएंगे, पर मैं जलते-जलते नहीं थकूंगा। मैं सब जगह मौजूद था. मौजूद हूं और मौजूद रहूंगा। और हर बार मैं स्वर्गलोकी होने के बाद भी मृत्युलोक का ही असली नागरिक रहूंगा।’ ‘तो अब क्या चाहते हो बंधु?’ मैं मारे मित्र के गुस्से के आगे साष्टांग हुआ। ‘हे मेरे दोस्त! तत्काल मुझे दी अपनी श्रद्धांजलि वापस लो वर्ना फिर मत कहना कि दोस्त ने चेतावनी दिए बिना अटैक किया’, कह मित्र ने स्वर्गलोक से एक बार फिर जोर का ठहाका लगाया तो मैंने आव देखा न ताव, अपनी टाइम लाइन से मित्र के दहन के बाद उससे सच्ची सहानुभूति दर्शाने वाली श्रद्धांजलि क्षमा याचना सहित तुरंत डिलीट कर दी।

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