जीवन की ढलान में पेंशन की टेंशन: प्रो. सुरेश शर्मा, लेखक नगरोटा बगवां से हैं

प्रो. सुरेश शर्मा ,लेखक नगरोटा बगवां से हैं By: प्रो. सुरेश शर्मा, लेखक नगरोटा बगवां से हैं Oct 22nd, 2020 12:07 am

कर्मचारी किसी भी सरकार व संगठन के लिए एक संपत्ति होता है। वह किसी भी दृष्टिकोण से व्यवस्था पर बोझ नहीं होता। सेवाकाल में वह अपने संगठन के लिए मेहनत, परिश्रम, समर्पण, निष्ठा, कर्मठता, कटिबद्धता तथा खून-पसीना बहाकर काम करता है। जिस तरह वह पूरी जवानी सरकार और संगठन के लिए लगाकर त्याग करता है, उसी तरह उस सरकार व संगठन को भविष्य के बुढ़ापे में उसका सहारा बनना चाहिए ताकि वह गरिमापूर्ण जीवन जी सके और बुढ़ापे में उसे कोई चिंता न सताए…

सन् 2003 तक सेवानिवृत्ति के उपरांत पेंशन को कर्मचारी के भविष्य की सुरक्षा की गारंटी माना जाता था। सेवानिवृत्ति तक एक सरकारी कर्मचारी अपने बच्चों की शिक्षा, शादी-विवाह, गृह निर्माण, कर्जों आदि से मुक्त होकर अपने तीर्थ-व्रत व दान-धर्म करने के बारे में सोचता था। सेवानिवृत्ति पर मिलने वाले धन से वह निवेश के साथ सामाजिक जिम्मेदारियां निभाता था। महीने के बाद पेंशन की राशि उसे चिंता व तनावमुक्त रखती थी। सेवानिवृत्त कर्मचारी आनंद, संतोष एवं गरिमापूर्ण जीवन जीता था। जीवन में विपरीत परिस्थिति तथा स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं से निपटने के लिए उसके पास पर्याप्त धन होता था। उसे किसी भी प्रकार की सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा की चुनौती नहीं होती थी।

सेवानिवृत्ति के बाद उसे कोई एक्सटेंशन या कोई और काम-धंधा करने का व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक दबाव नहीं होता था। वर्तमान में देश तथा प्रदेश में उच्च शिक्षा का प्रतिशत बढ़ने से बेरोजगारी भी बढ़ी है। सरकारी उपक्रम में नौकरी की संभावनाएं बहुत कम हो चुकी हैं। तीस से पैंतीस वर्ष तक की आयु में बहुत ही संघर्ष के उपरांत नौकरी मिलने पर कम से कम तीन वर्ष तक कॉन्ट्रैक्ट पर कार्य करना पड़ता है। ऊर्जा और शक्ति से भरी जवानी व्यवस्था के नाम करने के बाद अट्ठावन वर्ष पूरा होते ही उसे सेवानिवृत्त कर दिया जाता है। इसके बारे में कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की आयु में भी कई विरोधाभास हैं। कोई सामाजिक सुरक्षा या पेंशन न होने के कारण कर्मचारी अधर में लटक कर ठगा सा रह जाता है। इस कारण सरकारी क्षेत्र में नौकरी करने का आकर्षण भी लगभग समाप्त हो चुका है।

वर्तमान में कुछ समय से प्रिंट मीडिया तथा डिजिटल मीडिया से पुरानी पेंशन व्यवस्था की बहाली के लिए बैठकों, प्रदर्शनों, सांकेतिक धरनों तथा ज्ञापनों के माध्यम से प्रदेश एवं देश के कर्मचारियों का दुख-दर्द तथा दबी टीस मुखर तथा प्रखर हो रही है। इस दिशा में कर्मचारियों द्वारा कई प्रदेशों के उच्च न्यायालयों में सामाजिक सुरक्षा गारंटी की कई जनहित याचिकाएं भी दर्ज की जा चुकी हैं। पेंशन उम्रभर सरकारी अथवा गैर सरकारी क्षेत्र में संगठित व असंगठित क्षेत्र में निष्ठा, लग्न व मर-मर कर काम करने के उपरांत सेवानिवृत्ति के पश्चात मिलने वाली वह मासिक आय है जिसे जीवन की ढलान में सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। जीवन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा अपने कार्य क्षेत्र को न्योछावर करने के पश्चात जीवन के अंतिम पड़ाव में असुरक्षित भविष्य की चिंता से ग्रस्त होना उसके लिए बहुत ही दुखदायी एवं कष्टप्रद है। हमारे जीवन मूल्यों में उस बैल को भी किसान मरते दम तक बिना हल चलवाए खूंटे पर ही पालता है जिसने अपना पूरा जीवन उसके परिवार एवं खेती को ही समर्पित कर दिया हो। जिस बैल के दम पर उस किसान का परिवार व आर्थिक स्थिति निर्भर करती है, वह किसान उस बैल के अंतिम सांस तक साथ खड़ा रहता है।

एक अध्ययन के अनुसार अगले तीस वर्षों में भारत में करीब पचास प्रतिशत सेवानिवृत्त कर्मचारी कोई न कोई छोटा-मोटा धंधा कर रहे होंगे जिनमें डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर व अच्छे-अच्छे पदों से रिटायर हुए ऑफिसर भी शामिल होंगे। सन् 2015 में लागू अटल पेंशन योजना, तत्पश्चात प्रधानमंत्री श्रमयोगी मानधन योजना आदि का लाभ भी इन योजनाओं में पंद्रह-बीस वर्षों तक निवेश करने के बाद ही मिलेगा। वर्तमान में कार्यरत युवा कर्मचारी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के प्रबंधन के साथ-साथ अपने भविष्य, बच्चों की पढ़ाई, शादी, नौकरी, मकान तथा धन निवेश के लिए चिंतित हैं। सेवानिवृत्ति के पश्चात जीवन यापन व धन निवेश धन के लिए चिंताएं उसके माथे पर देखी जा सकती हैं।

उसके ऊपर बच्चों की चिंताएं, वृद्ध माता-पिता का भरण-पोषण, स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं तथा अचानक सुख-दुख की परिस्थितियों को निपटने के लिए मानसिक दबाव रहता है। इन कर्मचारियों की श्रेणी में समाज का मध्यम वर्ग है जिस पर रिटायरमेंट के बाद आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। यह मानसिक तनाव एवं दबाव कर्मचारियों को नौकरी के साथ-साथ कोई अन्य व्यवसाय तथा सेवानिवृत्त होने के पश्चात कोई काम-धंधा करने के लिए मजबूर करता है। उम्र के जिस पड़ाव में व्यक्ति को आराम कर गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहिए, उस उम्र में वर्तमान में चालीस प्रतिशत सेवानिवृत्त कर्मचारी काम-धंधा कर रहे हैं।

जीवन के अधेड़ एवं अंतिम चरण में काम कर रहे यह बुजुर्ग आम तौर पर अपने सामाजिक अधिकारों से वंचित होकर तनाव, दबाव, चिंता तथा मानसिक रोगों का शिकार हो रहे हैं। दुनिया के कई देशों में पेंशन, सामाजिक सुरक्षा, जीवन सुरक्षा व इनकम स्पोर्ट आदि का प्रावधान है। ये देश विकास के साथ-साथ मनुष्य के जीवन को अपनी संपत्ति मानकर उसकी रक्षा की जिम्मेदारी लेते हैं। भारत में हम वृद्धों के अधिकारों, उनके पालन-पोषण, स्वास्थ्य एवं उनकी गरिमा को बनाए रखने की बात तो करते हैं, लेकिन हमारी नीतियां बिल्कुल इसके विपरीत हैं। कर्मचारी किसी भी सरकार व संगठन के लिए एक संपत्ति होता है। वह किसी भी दृष्टिकोण से व्यवस्था पर बोझ नहीं होता।

सेवाकाल में वह अपने संगठन के लिए मेहनत, परिश्रम, समर्पण, निष्ठा, कर्मठता, कटिबद्धता तथा खून-पसीना बहाकर काम करता है। जिस तरह वह पूरी जवानी सरकार और संगठन के लिए लगाकर त्याग करता है, उसी तरह उस सरकार व संगठन को भविष्य के बुढ़ापे में उसका सहारा बनना चाहिए ताकि वह गरिमापूर्ण महसूस करे सके। उसे किसी भी प्रकार की मानसिक चिंता व किसी प्रकार का सामाजिक दबाव न हो। सेवानिवृत्त कर्मचारी का बुढ़ापा आर्थिक रूप से संपन्न होना चाहिए ताकि वह बहुत ही सम्मान और स्वाभिमान से अपना जीवन व्यतीत कर सके। उसे उम्र के अंतिम पड़ाव में मजबूर होकर किसी के आगे हाथ न फैलाने पड़ें। जीवन की ढलान में सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारी को पेंशन की टेंशन नही होनी चाहिए।

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