सतत विकास के लिए पर्यावरण सुरक्षा जरूरी: रोहित कुमार, लेखक करसोग से हैं

रोहित कुमार, लेखक करसोग से हैं By: रोहित कुमार, लेखक करसोग से हैं Oct 20th, 2020 12:06 am

रोहित कुमार

लेखक करसोग से हैं

एक तरफ  आबादी अपनी रफ्तार से बढ़ती जा रही है। इस आबादी और विकास का दबाव सीधे-सीधे पर्यावरण के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। विकास के लिए शहर बसाए जा रहे हैं, उद्योग बढ़ रहे हैं और खेती के लिए भी जंगल काटे जा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक हम दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाले राष्ट्र बन जाएंगे और जमीन का यह हाल है कि दुनिया के 2.4 फीसदी क्षेत्रफल पर विश्व की जनसंख्या का 18 फीसदी हमारे यहां निवास करता है। जाहिर है कि प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव तेजी से बढ़ा है। ग्लोबल वार्मिंग की समस्या को रोकने के लिए वनों और झीलों की सुरक्षा भी आवश्यक है…

प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से हो रहा दोहन भी एक प्रमुख चिंता बन गया है। जनसंख्या ज्यादा होने के कारण पृथ्वी पर प्राकृतिक संसाधनों का पुनर-भंडारण होने से पहले ही क्षरण हो रहा है। ग्लोबल वार्मिंग की समस्या कृषि उत्पादों के उत्पादन की कम दर तथा प्राकृतिक संसाधनों में होती कमी के कारण उत्पन्न हो रही है। अगर ऐसा ही रहा तो आने वाले समय में जल्द ही धरती की जनसंख्या भोजन की कमी का सामना करेगी। सतत विकास के अंतर्गत प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का प्रयास किया जाता है, जिससे उन्हें आने वाली पीढि़यों की जरूरतों को पूरा करने के लिए बचाया जा सके। सबसे जरूरी यह है कि हमें आने वाली पीढि़यों की सुरक्षा के लिए सतत विकास को इस प्रकार से बरकरार रखना है, जिससे पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सके। वर्तमान में ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण से जुड़ी कुछ मुख्य समस्याएं हैं।

ग्लोबल वार्मिंग का तात्पर्य पृथ्वी में हो रहे स्थायी जलवायु परिवर्तन, औद्योगिक प्रदूषण, पृथ्वी पर बढ़ रहे पर्यावरण प्रदूषण, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन और ओजोन परत में हो रहे क्षरण आदि कारणों से पृथ्वी के तापमान में होने वाली वृद्धि की  समस्या से है। वैज्ञानिकों ने भी इस तथ्य को प्रमाणित किया है की पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है और इसे रोकने के लिए यदि आवश्यक कदम नहीं उठाए गए तो यह समस्या और भी ज्यादा गंभीर हो जाएगी जिसके नकारात्मक प्रभाव हमारे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर होंगे। यह आम देखा जाता है कि खाद्य और कृषि उत्पादन की कमी को दूर करने के लिए इनके उत्पादन में रसायनों का उपयोग किया जाता है। यह न केवल मिट्टी की गुणवत्ता को कम करता है, बल्कि मानव स्वास्थ्य को भी नकारात्मक तरीके से प्रभावित करता है। आंकड़े बताते हैं कि सीओटू यानी प्रमुख ग्रीन हाउस गैस (जीएचजी) का उत्सर्जन करने में भारत और अमरीका में फर्क है।

आय, विकास और प्रति व्यक्ति जीएचजी के उत्सर्जन में विकासशील देश और विकसित देशों के बीच फर्क साफ  दिख रहा है। अमरीका में 2005 के मुकाबले 2009 में सीओटू प्रति व्यक्ति का उत्सर्जन घटा है, जबकि ऑस्ट्रेलिया में बढ़ा है। 2005 में प्रति व्यक्ति अमरीका में 19.7 मीट्रिक टन सीओटू का उत्सर्जन था जिसके बाद ऑस्ट्रेलिया में 18.0 मीट्रिक टन सीओटू का उत्सर्जन होता था। 2005 में प्रति व्यक्ति सीओटू का उत्सर्जन ब्राजील (1.9), इंडोनेशिया (1.5) और भारत (1.2) ने सबसे कम किया था और चार साल बाद भी वे निचले तीन पायदानों पर बने रहे। हालांकि चिंता की बात यह रही कि भारत भी उन देशों में शामिल रहा जहां प्रति व्यक्ति सीओटू गैस का उत्सर्जन बढ़ा है। वैश्विक औसत तापमान में पहले ही 0.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है। ये व्यापक रूप से स्वीकारा गया है कि हम तेजी से दो डिग्री सेल्सियस की ओर बढ़ रहे हैं जिसके भीतर वैश्विक समुदाय खुद को सीमित करने का प्रयास कर रहा है।

तापमान का बढ़ना सीधे तौर पर ग्लेशियरों के गलने की ओर इशारा करता है और वातावरण में जो तबदीली बीते दशक में हमें भी दिखाई देती है, उसके पीछे इस वृद्धि को नकारा नहीं जा सकता। पर्यावरण की फिक्र किसी देश, उपमहाद्वीप की ही नहीं है, बल्कि इस वैश्विक समस्या का समाधान वैश्विक समुदाय ही कर सकता है। विकसित देशों के बजाय विकासशील देशों में परिवहन प्रणाली, ईंधन जैसी मूलभूत जरूरतों पर जो निर्भरता है, वही पर्यावरण की भूमिका को विकसित देशों और विकासशील देशों के बीच फर्क स्थापित कर देता है। शुरू में विकास और पर्यावरण को दो अलग-अलग अवधारणाओं के रूप में देखा जाता था, लेकिन बाद में महसूस किया गया कि ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और दुनिया को बचाए रखने के लिए इन दोनों पहलुओं पर बराबर ध्यान देने की जरूरत है। जिस बात पर प्रधानमंत्री मोदी जोर दे रहे हैं, उसके मुताबिक पर्यावरण की सुरक्षा के बगैर हो रहे विकास का दूरगामी महत्त्व नहीं है। पर्यावरण और विकास पर वैश्विक आयोग की रिपोर्ट में स्थायी विकास की परिभाषित संकल्पना ‘आवर कॉमन फ्यूचर-1987’ में स्पष्ट रूप से विकास के लक्ष्यों को पर्यावरणीय सुरक्षा से जोड़ने पर जोर दिया गया है। पर्यावरण की सुरक्षा के साथ विकास के लिए ग्रीन ग्रोथ की संकल्पना को मूर्त रूप देना होगा।

आर्थिक विकास के दौरान सरकार की चिंता बढ़ जाना निराधार नहीं है। एक तरफ  आबादी अपनी रफ्तार से बढ़ती जा रही है। इस आबादी और विकास का दबाव सीधे-सीधे पर्यावरण के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। विकास के लिए शहर बसाए जा रहे हैं, उद्योग बढ़ रहे हैं और खेती के लिए भी जंगल काटे जा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक हम दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाले राष्ट्र बन जाएंगे और जमीन का यह हाल है कि दुनिया के 2.4 फीसदी क्षेत्रफल पर विश्व की जनसंख्या का 18 फीसदी हमारे यहां निवास करता है। जाहिर है कि प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव तेजी से बढ़ा है। ग्लोबल वार्मिंग की समस्या को रोकने के लिए वनों और झीलों की सुरक्षा भी आवश्यक है। पेड़ों को तब तक नहीं काटा जाना चाहिए, जब तक बहुत ही आवश्यक न हो। इस समय हमें अधिक से अधिक वृक्षारोपण करने की आवश्यकता है। हमारी इतनी बड़ी आबादी द्वारा उठाया गया एक छोटा सा कदम भी पर्यावरण की सुरक्षा में अपना अहम योगदान दे सकता है। यह पर्यावरण संरक्षण जैव विविधता और वन्य जावों की सुरक्षा के लिहाज से भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसके अलावा पृथ्वी के प्रत्येक निवासी को ओजोन परत के क्षरण को रोकने के लिए अपनी ओर से महत्त्वपूर्ण योगदान देने की आवश्यकता है।

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