फारूक की सांसदी निरस्त हो: फिरोज बख्त अहमद, स्वतंत्र लेखक

फिरोज बख्त अहमद By: फिरोज बख्त अहमद, स्वतंत्र लेखक Nov 28th, 2020 12:08 am

फिरोज बख्त अहमद

स्वतंत्र लेखक

भारत में इन जघन्य आतंकी हमलों पर फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती या गुलाम नबी आजाद ने कभी टिप्पणी नहीं की। समस्या फारूक अब्दुल्ला एंड कम्पनी में यह रही कि ये गरीब और अनपढ़ कश्मीरियों के वोट लेकर मुटियाते रहे और बेचारी जनता अंधे कुएं में गिरती रही। यही नहीं, ये गद्दार राजनेता दरिद्र जनता को न केवल सत्ता हथियाने के लिए बतौर वोट बैंक इस्तेमाल करते रहे, बल्कि इनको भारत के विरुद्ध वरगलाते भी रहे। अब समय आ गया है जब अदालत को स्वयं संज्ञान लेते हुए फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए…

हाल ही में सांसद फारूक अब्दुल्ला ने एक देशद्रोही बयान दिया है जिसमें उन्होंने कहा कि वे कश्मीर को चीन के द्वारा आजाद कराकर दफा 370 हटवाएंगे। सभी भारतीय फारूक के इस पागलपन से स्तब्ध  रह गए। इससे पूर्व भी फारूक अब्दुल्ला ने देशद्रोह की बातें कही हैं। यह समझ में नहीं आता कि जिस व्यक्ति को भारत ने बनाया हो, जिसको सभी सुविधाएं भारत ने दी हों, जिसके परिवार ने न जाने क्या-क्या फायदे भारत सरकार से उठाए हैं, वह आज चीन का राग अलाप रहा है। लानत भेजता है लेखक और भारत के मुस्लिम कि भारत की ज़मीन पर ऐसा गद्दार पैदा हो गया। लेखक भारत सरकार से प्रार्थना करता है कि फारूक अब्दुल्ला की संसद की सदस्यता रद की जाए और उन्हें चीन के शिनजियांग प्रांत में किसी मुस्लिम डिटेंशन कैंप में ठूंस दिया जाए जहां वे अपने चीनी चहेतों के साथ लोटते-पोटते रहें। फारूक ने 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस समय तारीफ  की थी जब उन्होंने कश्मीर में जबरदस्त सैलाब आने पर सेना द्वारा हजारों उन्हीं कश्मीरियों की जान बचाई थी जो उन्हें कोसते चले आ रहे थे। गद्दी के भूखे इन कश्मीरी नेताओं ने आम कश्मीरी का जीना हराम कर रखा है। जब कुछ समय पूर्व 575 कश्मीरी युवाओं ने भारतीय सेना में स्थान पाया तो क्या फारूक और महबूबा के मुंह में ताले लग गए थे?

जब 12 वर्षीय कश्मीरी बच्ची तजम्मुल हुसैन ने विश्व किकबॉक्सिंग का सोने का तमगा भारत की झोली में डाला तो क्या फारूक और मुफ़्ती को सांप सूंघ गया था? जब क्रिकेटर रसूल परवेज़ और समद ने आईपीएल में कारनामे दिखाए तो ये दोनों कहां थे? जब कश्मीरी फुटबॉलर बासित अहमद और मुहम्मद असरार रेन्बार ने स्पेन की ला लीगा में सोसिदाद दीपोर्तिवा क्लब के लिए चुने गए तो फारूक और महबूबा कहां थे? फारूक  को यह भी याद रखना चाहिए कि सत्ता में आने के बाद उन्होंने लगातार दो दिवाली त्योहार कश्मीर में ही मनाए।

फारूक अब्दुल्ला यदि ज़रा सा भी मुस्लिम संप्रदाय का ख्याल रखते हैं तो उन्हें पता होगा कि किस प्रकार चीन में उईगर मुस्लिमों को तबाह-ओ-बर्बाद किया जा रहा है। आज चीनी मुसलमान को न तो रोज़े-नमाज़ की छूट है, न ही वह दाढ़ी रख सकता है और न ही मुस्लिम महिलाएं बुर्का पहन सकती हैं। यही नहीं, मुस्लिम महिलाओं के बच्चों की प्रसूति के दौरान ही उनके बच्चों को मार दिया जाता है। यदि कोई मुस्लिम बच्चा पैदा हो भी जाता है तो उसका नाम मुहम्मद या अहमद रखने पर मनाही है। शिनजियांग में 10 लाख से अधिक मुस्लिमों का धर्मान्तरण कर उन्हें चीनी बौद्ध बना दिया गया है। इन डिटेंशन कैम्पों में मुस्लिम महिलाओं के बलात्कार होते हैं, मुस्लिमों के नाखून उंगलियों से खेंच लिए जाते हैं। त्योहारों की तो चीनी मुस्लिम बात ही भूल जाएं। वहां आज मुस्लिम नए मस्जिद नहीं बना सकते। बल्कि हाल में एक मस्जिद को शौचालय में परिवर्तित कर दिया गया है। किस चीन की बात कर रहे हो मियां फारूक जिनपिंग! सबसे पहले तो आपको ही उल्टा लटकाएंगे। यह तो भारत के वीर जवान ही हैं कि जिन्होंने अपनी दिलेरी से अपनी जान की बाज़ी लगाकर चीन की सेनाओं को बांध कर रखा हुआ है। वर्ना आप अपने पांच हज़ार करोड़ के बंगले से उसी तरह बाहर उठा कर फेंक दिए जाते जैसे आपने कश्मीरी पंडितों को बाहर निकलवा दिया।

भूल जाओ चीन को। कश्मीर आपके अब्बाजान का नहीं है! वैसे समझ से बाहर है यह बात कि सूफी संतों की जन्मस्थली कश्मीर में ऐसे देशद्रोही कैसे पैदा हो गए। यहां तो नूरुद्दीन वाली नन्द ऋषि ने 1377 में जन्म लिया था और आज उनकी दरगाह और खानकाह पर हिंदू और मुसलमान दोनों ही जाते हैं। ऐसे ही शाह हमदान, सैयद शर्फूदीन अब्दुर्रेह्मान, हजरत बुलबुल शाह, जैनुल आबिदीन, हजरत बुलबुल शाह और मुस्लिम महिला सूफी संत भी कश्मीर की धरती पर रहे हैं जैसे लालदेद और हब्बा ख़ातून। यहां 1989 तक सभी हिंदू-मुस्लिम चैन से रह रहे थे, मगर 1989 में जिस प्रकार से यहां आतंकवादियों ने यहां के पुश्तैनी कश्मीरियों को निकालना शुरू किया और उनका नरसंहार हुआ, उससे यह जन्नत का टुकड़ा क्षीण-क्षीण हुआ।

कश्मीर, जहां सदा से ही हिंदू-मुस्लिम लोगों में ऐसा ही मेलजोल था जैसे कि दूध और शकर। मगर इसी दौरान कुछ पाकिस्तानी राजनेताओं और रिटायर्ड फौजियों ने मिलकर कश्मीर में हमले शुरू करा दिए जिनका केंद्रबिंदु भोले-भाले नौजवानों को बहलाकर, भटकाकर और भड़काकर भारत को हताश करना था। इस जाल में काफी युवा फंस गए और पाक अधिकृत कश्मीर के आतंकियों द्वारा ब्रेनवाश किए गए। उन्हें हथियार दिए जाते और उनसे कहा जाता था कि अगर वे भारतीय सेना से लड़ते हुए मारे गए तो आपको शहादत का दर्जा मिलेगा, जन्नत के दरवाज़े पर हजरत मुहम्मद उनका स्वागत करेंगे और उन्हें 72 हूरें बतौर इनाम प्राप्त होंगी। यह ठीक है कि शहीद का यही दर्जा होता है इस्लाम में, मगर बेगुनाहों की जान लेने वाले आतंकियों को तो दोज़ख की आग में जलाया जाएगा। काफी युवा इस चक्रव्यूह में फंस गए। इसका नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तानियों के बहकावे में आकर वे न दीं के रहे न दुनिया के। चूंकि पाक अधिकृत कश्मीर की सीमा हमारे कश्मीर से मिलती है, बहुत से आतंकवादी यहां आते रहे हैं और पुलवामा जैसी आतंकी गतिविधियां करते रहे हैं। इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण पुलवामा हमला था जिसमें हमारे 44 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए थे।

भारत में इन जघन्य आतंकी हमलों पर फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती या गुलाम नबी आजाद ने कभी टिप्पणी नहीं की। समस्या फारूक अब्दुल्ला एंड कम्पनी में यह रही कि ये गरीब और अनपढ़ कश्मीरियों के वोट लेकर मुटियते रहे और बेचारी जनता अंधे कुएं में गिरती रही। यही नहीं, ये गद्दार राजनेता दरिद्र जनता को न केवल सत्ता हथियाने के लिए इनको बतौर वोट बैंक इस्तेमाल करते रहे, बल्कि इनको भारत के विरुद्ध वरगलाते भी रहे। शेख अब्दुल्ला, बख्शी गुलाम मुहम्मद और अब फारूक और उमर अब्दुल्ला के समय तक पूर्ण कश्मीरी जनता का मस्तिष्क इन पाकिस्तान और चीन नवाज़ नेताओं ने भारत के खिलाफ कर दिया। अब समय आ गया है कि उच्च न्यायालय भी कानून के मुताबिक सुओ मोतो नोटिस लेकर फारूक अब्दुल्ला के विरुद्ध  कार्रवाई करे वर्ना ऐसे देशद्रोहियों को बल मिलता रहेगा। समय आ गया है कि आम कश्मीरी फारूक और महबूबा के षड्यंत्र को समझें और उनके मकड़जाल से बाहर आएं।

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