किसानों की मांगों को प्राथमिकता दे सरकार : सुखदेव सिंह, लेखक नूरपुर से हैं

सुखदेव सिंह By: सुखदेव सिंह, लेखक नूरपुर से हैं Dec 2nd, 2020 12:07 am

किसानों को आशंका है कि इन कृषि बिलों के लागू होने के बाद अनाज मंडियों का अस्तित्व खत्म होकर रह जाएगा और फिर कौन उनका मददगार बनेगा? आज निजीकरण की तरफ  अकेला भारत ही नहीं बढ़ रहा है। सरकारी क्षेत्रों में काम दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है। सरकारें अपना राजस्व बचाने के लिए निजीकरण को बढ़ावा दिए जा रही हैं। प्रतियोगिता जब तक नहीं होगी, किसान को उसकी फसलों का समर्थन मूल्य कभी सही नहीं मिलेगा…

वैश्विक कोरोना महामारी के चलते पूरा विश्व सुरक्षा लिहाज से सतर्कता बरत रहा है और भारत का किसान वर्ग कृषि कानूनों के खिलाफ  विरोध प्रदर्शन करने में जुटा है। किसानों की आड़ में अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वालों के खिलाफ  कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। दिल्ली पुलिस का सुरक्षा चक्र तोड़कर उन पर पत्थर बरसाने वाले हाथ किसानों के नहीं लगते हैं। किसान और पुलिस की झड़प सच में देश का माहौल खराब करने की कोशिश है। राजधानी दिल्ली में कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों को देखकर नियम सख्त बनाए गए हैं। ऐसे में किसानों को विरोध प्रदर्शन किए जाने की अनुमति कौन देता, यह बड़ा सवाल है। नतीजतन किसान प्रदर्शनकारी पुलिस पर पत्थर बरसाते रहे और पुलिस उन पर आंसू गैस के गोलों समेत पानी फेंककर माहौल को शांत करने में लगी थी। सरकार ने आखिर किसानों की मांगें मानकर उन्हें विरोध प्रदर्शन किए जाने की अनुमति अब दे दी है। सरकार की ओर से प्रदर्शनकारियों को सभी सुविधाएं मुहैया की जाने वाली हैं।

कृषि कानूनों के बारे में किसानों को जागरूक किए जाने के लिए जागरूकता अभियान छेड़े जाने की आज जरूरत है। भारत एक कृषि प्रधान देश होने की वजह से उसकी पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है। देश की अधिकांश जनसंख्या गांवों में रहकर खेतीबाड़ी पर निर्भर करती है। अपनी उपजाऊ ज़मीनों को बेचकर विदेशों में बसने वालों का कभी किसी ने विरोध क्यों नहीं किया? वैश्विक कोरोना महामारी में भी जो सरकार किसानों के बैंक खातों में पैसे जमा करके उनकी मदद कर रही हो, वह कितनी किसान विरोधी हो सकती है, आज सोचने की जरूरत है। किसानों की दुखती रग पर हाथ रखकर सदैव राजनीतिक रोटियां सेंकी जाती रही है, यह कोई नई बात नहीं है। मौजूदा समय में भी ठीक ऐसे ही किसानों की भावनाओं से खिलवाड़ करके राजनीति की जा रही है। नतीजतन आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी किसानों की आर्थिकी बढ़ाए जाने में कोई भी केंद्र सरकार सफल नहीं हो पाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार ने सन् 2022 तक किसानों की आय दोगुना किए जाने का लक्ष्य निर्धारित किए जाने के उद्देश्य से ही यह कृषि बिल पास किए हैं। कृषि बिलों के पास होते ही अब तक बिचौलिया बनकर अनाज मंडियों के आढ़तियों से कमीशन खाने वालों की सांसें फूलना शुरू हो चुकी हैं। जमींदारी प्रथा बेशक दशकों पहले खत्म हो जाने के बावजूद अधिकांश गरीब किसान आज भी अनाज मंडियों के आढ़तियों के कर्जदार बनकर खेतीबाड़ी कर रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है। किसान अनाज मंडियों के आढ़तियों की मदद के बिना फसल की पैदावार निकालने में असमर्थ रहते आ रहे हैं। आढ़ती किसानों को बीज, खाद, दवाइयां, कीटनाशक, खेत जुताई और नकदी रुपए देकर सदैव उन्हें अपना कर्जदार बनाकर रखना चाहते हैं। आढ़तियों की कर्जदारी के बोझ तले दबे ऐसे गरीब किसान फिर कैसे आत्मनिर्भर बन सकते हैं? क्या ऐसे किसानों की आर्थिकी में कभी सुधार हो सकता है जो आढ़तियों के रहमोकरम पर ही खेतीबाड़ी पर निर्भर हों। क्या ऐसे किसानों को अनाज मंडियों में अपनी फसलों का सही दाम कभी मिल सकता है। किसानों की आर्थिकी जब तक मजबूत नहीं होगी, तब तक वह अपनी फसलों को अन्य राज्यों में बेचने की सोच भी नहीं सकता है। किसान फसल की पैदावार तो कर लेता है, मगर उसे बेचने के लिए अनाज मंडियों में बिचौलियों के हाथ की कठपुतली बन जाता है। केंद्र सरकार ने एमएसपी बिल राज्यसभा में पास करके किसानों की आर्थिकी बढ़ाए जाने की नींव रखी है। किसान अगर अपनी मनमर्जी से फसल बेचकर मुनाफा नहीं कमा सकता तो उसकी मेहनत करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। अचानक दो कृषि बिल क्या पास किए गए, नेताओं को राजनीति चमकाने का मानो बहाना मिल गया हो। कृषि बिलों का विरोध करने वाले नेताओं की यही मंशा है कि किसान सदैव अपने राज्य की अनाज मंडियों के आढ़तियों के कर्जदार बनकर रहें। कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य, दूसरा कृषक सशक्तिकरण व संरक्षण कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार विधेयक राज्यसभा ने पारित किए हैं। दशकों से बिचौलिया बनकर किसानों की फसलों से कमीशन खाने वाले दलाल क्या राज्यसभा में इस बिल को आसानी से पास होने देते, कभी नहीं।

केवल मात्र यही एक वजह है कि केंद्र सरकार ने इन कृषि बिलों को लेकर अचानक अध्यादेश लाकर तहलका मचा दिया है। अकाली दल की कृषि मंत्री की ओर से अचानक त्यागपत्र दिए जाने की वजह से किसानों का विश्वास डगमगा सा गया है। अधिकतर किसानों को कृषि बिलों से संबंधित कोई सही जानकारी न होने की वजह से नेतागण उन्हें बड़ी आसानी से बरगलाकर विरोध करने पर मजबूर कर रहे हैं। किसानों को आशंका है कि इन कृषि बिलों के लागू होने के बाद अनाज मंडियों का अस्तित्व खत्म होकर रह जाएगा और फिर कौन उनका मददगार बनेगा? आज निजीकरण की तरफ  अकेला भारत ही नहीं बढ़ रहा है। सरकारी क्षेत्रों में काम दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है। सरकारें अपना राजस्व बचाने के लिए निजीकरण को बढ़ावा दिए जा रही हैं। प्रतियोगिता जब तक नहीं होगी, किसान को उसकी फसलों का समर्थन मूल्य कभी सही नहीं मिलेगा। नवीन कृषि बिल लागू होने से अनाज मंडियों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा। फसलों की खरीददारी किए जाने के लिए स्पर्धा बढ़ने की वजह से बाहरी लोग दस्तक देंगे। किसान की फसलों का सही दाम लगाया जाएगा जिसका उन्हें लाभ मिलेगा। कृषि बिल पास होने का सबसे अधिक विरोध पंजाब और हरियाणा राज्यों में देखने को मिल रहा है। इन राज्यों के गरीब किसान आढ़तियों के सहारे ही खेतीबाड़ी किए जाने को मजबूर हैं। खेतीबाड़ी किया जाना आज के दौर में बहुत खर्चीला बनता जा रहा है जिसकी वजह से किसान कीमती जमीनों को बेचकर विदेशों की ओर पलायन करते जा रहे हैं। किसानों की मांगों पर सरकार को प्राथमिकता से सोचना चाहिए।

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