हम इतने लापरवाह क्यों हैं?

देश ऑक्सीजन, वेंटीलेटर, मरीजों के लिए बिस्तर और दवाइयों आदि की कमी से जूझ रहा है। दवाओं की कालाबाजारी हो रही है और निजी अस्पताल मनमाने ढंग से पैसा वसूल रहे हैं। बड़ी संख्या में लोगों को बीमारी के इलाज में अपनी जमा पूंजी से हाथ धोना पड़ रहा है। सरकार ने समय पर उचित कदम नहीं उठाए…

कोरोना महामारी से निपटने में देश ने, विशेषकर हमारी सरकार ने जिस हद दर्जे की लापरवाही बरती है उससे नागरिकों को न सिर्फ अत्यधिक शारीरिक, आर्थिक व मानसिक दबाव से गुजरना पड़ रहा है, बल्कि उनकी जान पर बन आई है। दुख की बात यह है कि सरकार यदि समय रहते ध्यान देती तो बहुत सी परेशानियों व मौतों को रोका जा सकता था। मुंशी प्रेमचंद की कहानी शतरंज के खिलाड़ी में दो जागीरदार अपने राज्य के लिए लड़ने के बजाय शतरंज की बाजी पर लड़ते हैं और अंग्रेजी फौज के आगमन पर भी लापरवाह बने रहते हैं। कोरोना के प्रति ठीक ऐसी ही आत्मसंतुष्टि व निश्चिंतता हमारी सरकार की थी। पहले दौर के बाद हमें टीकाकरण, ऑक्सीजन, वेंटीलेटर व दवाओं आदि की उपलब्धता और इसके प्रबंधन पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता थी। टीकाकरण, जो कोरोना से बचाव का फिलहाल एकमात्र उपाय है, पर सरकार की आधारहीन आत्मसंतुष्टि का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि 28 जनवरी 2021 को विश्व आर्थिक मंच पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि वैक्सीन में हम आत्मनिर्भर हैं। इतना ही नहीं, बल्कि भारत दुनिया भर के देशों को वैक्सीन दे रहा है।

जबकि सच्चाई यह है कि सिर्फ  एक ‘कोवैक्सीन’ स्वदेशी है। दूसरी, ‘कोविशील्ड’ विदेशी ऑक्सफोर्ड एस्ट्रेजेनेका कंपनी की है, जिसकी तकनीक का उपयोग एक करार के तहत निजी संस्थान सीरम इंस्टीट्यूट कर रहा है। दुनिया के देशों को गिफ्ट के तौर पर हमने लगभग एक करोड़ डोज ही दिए हैं जो हमारी घरेलू आवश्यकता (168 करोड़ डोज) का बूंद भर है। बाकी पांच करोड़ डोज इन देशों ने सीरम इंस्टीट्यूट या भारत बायोटेक से व्यावसायिक करार के तहत खरीदी हैं। 16 जनवरी 2021 को हमने कोविड-19 का टीकाकरण प्रारंभ किया था। 30 अप्रैल तक सिर्फ  9.3 प्रतिशत जनसंख्या को इस टीके का पहला डोज एवं दो प्रतिशत जनसंख्या को ही दूसरा डोज लगा है। एक अप्रैल 2021 से हमने 18 साल से अधिक उम्र की जनसंख्या को टीका लगाने की घोषणा कर दी, लेकिन टीका उपलब्ध ही नहीं था। इसने हमारी आत्मनिर्भरता के झूठे दावे की पोल खोल दी है। सरकार ने ताबड़तोड़ तरीके से रूस की स्पूतनिक वैक्सीन के आपातकालीन उपयोग की मंजूरी दी है। हमें वैक्सीन के कुल कितने डोज चाहिए, इसकी संख्या निकालने के लिए भारी-भरकम गणना की जरूरत नहीं थी। इसे एक सामान्य व्यक्ति भी बता सकता है। जनसंख्या में सामूहिक प्रतिरोध क्षमता (हर्ड इम्युनिटी) प्राप्त करने के लिए कम से कम 60 प्रतिशत जनसंख्या का टीकाकरण आवश्यक है। हमारे देश में यह संख्या लगभग 84 करोड़ आती है। प्रति व्यक्ति दो टीके यानी 168 करोड़ डोज चाहिए। इतने डोज सीमित समय में उपलब्ध कराना सीरम इंस्टीट्यूट व भारत बायोटेक की क्षमता के बाहर है। सरकार को चाहिए था कि वह समय रहते विभिन्न वैक्सीन निर्माता कंपनियों से करार करती कि वे सरकार के रोडमैप के हिसाब से समय पर टीका उपलब्ध कराते, ताकि तेजी से टीकाकरण किया जा सकता, लेकिन झूठी आत्मनिर्भरता के गर्व से फूली सरकार ने ऐसा नहीं किया। सरकार के कुप्रबंधन की एक बानगी यह भी है कि केंद्र सरकार, जो मुफ्त टीके राज्यों को उपलब्ध करा रही थी, ने अचानक 18 से 44 आयु वर्ग (जो जनसंख्या का सबसे बड़ा समूह है) को टीके उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर डाल दी है।

 उचित तो यह होता कि कि केंद्र सरकार पूरी जनसंख्या को मुफ्त कोविड टीका उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी लेती। 168 करोड़ डोज एक बड़ी संख्या है, जिसके लिए कंपनी से मोलभाव कर उचित कीमत तय की जा सकती थी। अब गफलत यह हो रही है कि जो टीका केंद्र सरकार ने 150 रुपए में खरीदा है, उसे राज्यों को 300 रुपए (कोविशील्ड) व 400 रुपए (कोवैक्सीन) में खरीदना होगा। बाजार में इसकी कीमत 600 व 1200 रुपए होगी, जबकि सीरम इंस्टीट्यूट के अदार पूनावाला ने कहा था कि 150 रुपए लेने में भी हमें मुनाफा हो रहा है। ‘वन नेशन वन टैक्स’ की बात करने वाली सरकार ने ‘एक देश, टीके की एक कीमत’ का ध्यान क्यों नहीं रखा? सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र की टीकाकरण नीति पर सवाल उठाते हुए कहा है कि कीमत और वितरण के लिए राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के मॉडल को क्यों नहीं अपनाया गया? जो वैक्सीन पुणे (भारत) में बन रही है उसे दूसरे देश हमसे भी सस्ती कीमत में खरीद रहे हैं। केंद्र सरकार सस्ती कीमत पर 45 से अधिक आयु वर्ग के लिए ही टीके खरीद रही है, हालांकि उसकी उपलब्धता में भी निरंतरता नहीं है। यह सब तो तब है जब ग्रामीण क्षेत्र की बड़ी जनसंख्या टीकाकरण से वंचित है जिसे इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। विशेषज्ञों के अनुसार कोरोना की दूसरी लहर फरवरी में ही प्रारंभ हो चुकी थी, लेकिन सात मार्च को हमारे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री कह रहे थे कि हम कोरोना की समाप्ति के अंतिम पड़ाव पर हैं। सरकार के इस मुगालते ने तैयारियों पर विराम लगा दिया। पहली लहर के समय सरकार ने 162 ऑक्सीजन प्लांट लगाने की घोषणा की थी, इनमें से सिर्फ 11 (स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार 33) लगाए गए एवं मात्र 3 प्लांट उत्पादन की स्थिति में हैं। अब प्रधानमंत्री ने 150 नए प्लांट लगाने की घोषणा की है, बिना इस स्पष्टीकरण के कि पहले घोषित प्लांट क्यों नहीं लगाए गए? इसी प्रकार पहली लहर के समय सरकार कह रही थी कि हम वेंटीलेटर बनाने में आत्मनिर्भर हो गए हैं एवं निर्यात कर रहे हैं। आज स्थिति यह है कि हमें ऑक्सीजन, वेंटीलेटर व आवश्यक सामग्री दूसरे देशों से, यहां तक कि चीन से भी ऐन मौके पर आयात करनी पड़ रही है।

ऑक्सीजन की उपलब्धता और महामारी से लड़ने में कुप्रबंधन को लेकर उच्च न्यायालयों एवं सर्वोच्च न्यायालय ने तीखी टिप्पणियां की हैं। चिकित्सा विज्ञान की प्रतिष्ठित पत्रिका लेन्सेट ने सरकार को इस कुप्रबंधन का जिम्मेदार बताया है। इस मामले में सरकार को केरल मॉडल से सीखना था। पहली लहर के समय केरल ऑक्सीजन के लिए दूसरों पर निर्भर था। आज ऑक्सीजन में वह न सिर्फ  आत्मनिर्भर है, बल्कि गोवा, कर्नाटक और तमिलनाडु को ऑक्सीजन प्रदान कर रहा है। केरल अकेला राज्य है जिसके पास उसकी आवश्यकता से अधिक ऑक्सीजन है। पहली लहर के बाद इस राज्य ने गहन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) की संख्या भी बढ़ा ली है एवं वेंटीलेटर की संख्या दुगनी कर ली है। परिणामस्वरूप केरल में कोविड से मृत्यु दर देश में सबसे कम है। देश ऑक्सीजन, वेंटीलेटर, मरीजों के लिए बिस्तर और दवाइयों आदि की कमी से जूझ रहा है। दवाओं की कालाबाजारी हो रही है और निजी अस्पताल मनमाने ढंग से पैसा वसूल रहे हैं। बड़ी संख्या में लोगों को बीमारी के इलाज में अपनी जमा पूंजी से हाथ धोना पड़ रहा है। यदि सरकार सही समय पर निर्णय लेकर उचित कदम उठाती तो ऐसी अफरातफरी न मचती। इस गंभीर लापरवाही में हम सबके हाथ अपने ही लोगों के खून में सने हैं। अब हमें कोरोना की रोकथाम के लिए गंभीरता व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तीव्र गति से कार्य करने की आवश्यकता है।   -(सप्रेस)

नरेंद्र चौधरी

स्वतंत्र लेखक

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