अगर होगा जल, तभी होगा सुंदर कल

जन सामान्य की सहभागिता तथा जि़म्मेदारी के साथ जल के उपयोग से डिमांड को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। नई पीढ़ी को जल संरक्षण के महत्त्व से परिचित कराना होगा। संयुक्त राष्ट्र भी पानी बचाने के प्राकृतिक और स्थानीय समाधान पर जोर दे रहा है। हमें भी अब स्थानीय, प्राकृतिक, स्थायी समाधान को अपनाने की जरूरत है…

लगभग तीस साल पहले लोग पीने का पानी दूर-दूर से भरकर लाते थे। उस समय मिट्टी के घड़े उपयोग में लाए जाते थे। जैसे-जैसे समय बदलता गया, विज्ञान तरक्की करता गया, हमारा जीने का तरीका भी बदलता गया। भारत में जल का संकट जनजीवन पर गहराता नज़र आ रहा है। देश और दुनिया भर में जल संकट तेजी से गहराता जा रहा है। ऐसे में लोगों को पानी की समस्या से जूझना पड़ रहा है, जिसका सीधा असर उनकी जीवन शैली और दिनचर्या पर पड़ रहा है। ऐसे में वर्षा जल संचयन पानी की समस्या से उबरने का सबसे सरल और कारगर उपाय है। इसके माध्यम से हम वर्षा जल का संचयन और भंडारण करके उसे पुनः उपयोग में ला सकते हैं। देश के 40 फीसदी से अधिक क्षेत्रों में सूखे का संकट है। 2030 तक बढ़ती आबादी के कारण देश में पानी की मांग अभी हो रही आपूर्ति के मुकाबले दोगुनी हो जाएगी। साथ ही बढ़ता वैश्विक तापमान भारत की जल संकट की स्थिति को और कठिन बनाने में सहायक होगा। साल 2018 में नीति आयोग द्वारा किए गए एक अध्ययन में 122 देशों के जल संकट की सूची में भारत 120वें स्थान पर खड़ा था। भारत में जल संकट से जूझ रहे दुनिया के 400 शहरों में से शीर्ष 20 में 4 शहर चेन्नई पहले, कोलकाता दूसरे, मुंबई 11वें तथा दिल्ली 15वें नंबर पर है। जल संकट के मामले में चेन्नई और दिल्ली जल्द ही दक्षिण अफ्रीका का केपटाउन शहर बनने की राह पर हैं। संयुक्त जल प्रबंधन सूचकांक के अनुसार देश के 21 शहर जीरो ग्राउंड वाटर लेवल पर पहुंच जाएंगे।

 यानी इन शहरों के पास पीने का खुद का पानी भी नहीं होगा, जिसमें बंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली और हैदराबाद जैसे शहर शामिल हैं। देश के ग्रामीण इलाकों में जल अभाव शहरों की तरफ पलायन की एक बड़ी वजह है। भारत में जल प्रणाली व्यवस्थित न होने की वजह से वितरण में असमानता है। विश्व स्वाथ्य संगठन के मुताबिक एक व्यक्ति को अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए हर दिन करीब 25 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। भारत के बड़े शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई में नगर निगम द्वारा निर्धारित 150 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन से भी ज्यादा पानी दिया जाता है। दिल्ली प्रति व्यक्ति पानी की खपत के लिहाज से दुनिया में पहले स्थान पर है। यहां पानी की प्रति व्यक्ति प्रतिदिन खपत 272 लीटर है, जिसकी बड़ी वजह पानी की बर्बादी और औद्योगिक खपत है। घरों में पानी के उपयोग की कोई मानक सीमा का न होना भी एक वजह है। केंद्रीय भू-जल बोर्ड 2015 की रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व में सर्वाधिक भू-जल का उपयोग करने वाला देश है। जबकि चीन और अमरीका में भारत की तुलना में कहीं कम मात्रा में भू-जल का उपयोग किया जाता है। भारत में अनुमानतः भू-जल का 85 फीसदी कृषि में, 5 फीसदी घरेलु तथा 10 फीसदी उद्योग में इस्तेमाल किया जाता है। शहरी क्षेत्र की 50 फीसदी तथा ग्रामीण क्षेत्र की 85 फीसदी जरूरतें भू-जल से पूरी होती हैं। भयंकर भू-जल दोहन के कारण 2007-2017 के बीच देश में भू-जल स्तर में 61 फीसदी तक की कमी आई है। भीषण गर्मी की वजह से जल की वाष्पीकरण की प्रक्रिया की तीव्रता बढ़ जाती है। फलस्वरूप पानी भाप बनकर उड़ जाता है।

 बढ़ते जल संकट से निपटने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2019 में जल शक्ति मंत्रालय बनाया। इसका गठन दो मंत्रालयों के विलय से हुआ था- जल संसाधन तथा नदी विकास, गंगा कायाकल्प और पेयजल, स्वच्छता मंत्रालय। इस मंत्रालय को पानी की समस्या के निदान के लिए ही खास तौर पर बनाया गया है। मंत्रालय ने 2024 तक सभी घरों में पाइप के जरिए वॉटर कनेक्शन देने की योजना बनाई है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 20 वर्षों में सूखे की वजह से भारत में 3 लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की तथा प्रतिवर्ष साफ पीने के पानी की कमी के कारण 2 लाख लोगों की मृत्यु हो रही है। मौजूदा दौर में भारत में जहां शहरों में गरीब इलाकों में रहने वाले 9.70 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल पाता है, वहीं ग्रामीण इलाकों में 70 फीसदी लोग प्रदूषित पानी पीने को मजबूर हैं। लगभग 33 करोड़ लोग अत्यंत सूखा ग्रसित जगहों पर रहने को मजबूर हैं। जल संकट की इस स्थिति से देश की जीडीपी में अनुमानतः 6 फीसदी का नुकसान होने की आशंका है। जल साक्षरता अभियान के तहत मानव जीवन में जल की महत्ता, देश में उपलब्ध जल स्रोत तथा देश में मौजूदा जल संकट की स्थिति से आम जनमानस को अवगत कराने की ज़रूरत है तथा स्थिति से निपटने के लिए आवश्यक उपायों को सरल और सहज तरीकों से जनता तक टीवी, रेडियो तथा सोशल मीडिया के माध्यम से पहुंचाने की ज़रूरत है। जन सामान्य की सहभागिता तथा जि़म्मेदारी के साथ जल के उपयोग से डिमांड को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। नई पीढ़ी को जल संरक्षण के महत्त्व से परिचित कराना होगा।

 संयुक्त राष्ट्र भी पानी बचाने के प्राकृतिक और स्थानीय समाधान पर जोर दे रहा है। हमें भी अब स्थानीय, प्राकृतिक, स्थायी समाधान को अपनाने की जरूरत है। प्राकृतिक जल स्रोतों पर हो रहे अतिक्रमण को रोकना होगा तथा साथ ही स्थानीय जल स्रोतों को पुनर्जीवित करना होगा। जल संरक्षण को बढ़ावा देने के साथ ग्राउंड वॉटर लेवल बढ़ाने के लिए भू-जल रिचार्ज पर भी ध्यान देने की जरूरत है। अनियोजित अंधाधुंध शहरीकरण के कारण बारिश का पानी जमीन के अंदर प्रवेश बाधित हो गया है, जिससे भू-जल का स्तर बारिश में भी नहीं बढ़ता और उस पर बढ़ती आबादी के आवश्यकता से ज्यादा पानी का इस्तेमाल और बर्बादी लगातार भू-जल स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं। पूरा विश्व आज जल संकट के प्रबंधन में प्राकृतिक और स्थानीय समाधान पर जोर दे रहा है। शायद लोगों को अब यह बात समझ आ गई है कि प्रकृति से वैमनस्य कर मानव जीवन ज्यादा समय तक इस धरती पर बचा नहीं रह सकता। इसीलिए नीदरलैंड जैसे देश ने नदियों के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए विशेष प्रावधान किए हैं। जल संकट की इस स्थिति से निपटने के लिए हमें जल उपयोग के व्यवहार में बचत, पुनः इस्तेमाल, फिर से कीमत आंकना, पुनरावृत्ति और सम्मान करना जैसे उपायों को अपनाना होगा।

जीवन धीमान

लेखक नालागढ़ से हैं

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