सच को झूठ और झूठ पर पर्दा

आपदा न मानने का नुकसान  यह हुआ कि कोरोना से मरे परिवारों को बीमा कंपनियां मुआवजा नहीं दे रही हैं। कोरोना पीडि़त या जान गंवा चुके लोगों के परिजनों को आर्थिक क्षति काफी हो रही है। ऐसे में सरकार से उम्मीद करना व्यर्थ है। कोर्ट ही एकमात्र मार्ग है जिसे भी सरकार बंद करने का उपाय सोच रही है…

ऑक्सीजन सिलेंडर की आपूर्ति में ढील और भारी कमी से दिल्ली में मचे हाहाकार, चीत्कार के बीच सैकड़ों जानें जाती रहीं और सरकार-प्रशासन निर्दोष साबित करने में अब भी लगे हैं। संसद के सत्र में झूठ के पुलिंदों को पेश किया जा रहा है। दूसरी लहर में पांच लाख से ज्यादा लोगों को कोरोना ने लील लिया, पर राज्य सरकारों ने तो ऑक्सीजन की कमी से मौत नहीं होने की रिपोर्ट केंद्र को दे दी और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने भी केवल इसका वाचन कर दिया। भौंचक रह गया पूरा देश, पर पता नहीं जनप्रतिनिधियों पर इस मिथ्या का कितना असर हुआ। कोई ऐसा शहर, ग्राम नहीं जहां लाशें न बिछी हों। इस बार ऑक्सीजन की कमी से हैरत करने वाली मौतें हुईं। तमाम समाचार पत्र, न्यूज़ चैनल, सोशल मीडिया पर रुदन, कोहराम और अस्पताल से बिलखते हुए लोगों की वापसी की तस्वीरें, फुटेज देख कर लोगबाग सिहर गए थे। लोगों ने अप्रैल-मई में देखना-पढ़ना-सुनना बंद कर दिया था। मोबाइल की रिंगटोन बजते ही सिहरन हो जाती थी कि क्या पता किनके चल बस जाने की खबर मिले। इन कारुणिक दृश्यों की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए फिर कोई तैयारी तीसरी लहर की दिख नहीं रही है। हां, यह जरूर दिख रहा है कि सभी सूबों की सरकारों ने संयुक्त रूप से झूठ का सहारा लेकर ऑक्सीजन से हुई मौतों को सिरे से ख़ारिज कर दिया। इस सफेद, काले और रंगीन आदि-आदि झूठों के लिए क्या निचली, नहीं तो सर्वोच्च न्यायालय कोई सजा तय करेगा। अब देश में हर मर्ज की दवा अदालत ही है क्योंकि मीडिया को अपनी सुविधा के हिसाब से झूठा ठहराया जाता है। मिसाल के तौर पर ऑक्सीजन की किल्लत, कालाबाजारी, अस्पताल की लापरवाही की हजारों खबरों को संसद में सिरे से नकार दिया गया। केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री भारती प्रवीण पवार ने सरकार की ओर से बताया कि किसी भी राज्य ने लिख कर नहीं दिया कि ऑक्सीजन की कमी से मृत्यु हुई है। पर मंत्री तो कह सकती थीं कि  इस दृश्य को तो पूरा देश मौन होकर देख रहा था। ऐसे में इसे कैसे सत्य माना जाए।

हर परिवार ने एक-दो अपने शुभचिंतकों को खोया। कहीं-कहीं तो इस संक्रमण ने पूरे परिवार को लील लिया। यह तो एक झूठ है। दूसरे झूठ पर नजर दौड़ाते हैं तो पता चलता है कि सभी राज्यों ने कोरोना से हुई मौत के आंकड़ों को छिपाया। जब वाशिंगटन पोस्ट ने खुलासा करने के साथ यह लिखना शुरू किया कि सही जानकारी के बिना वैज्ञानिक ढंग से जांच कठिन है तो सरकार झेंपी कि इसी बीच कुछ समाचार पत्रों और चैनलों ने श्मशान घाटों में पंजीकृत दाह संस्कारों की संख्या प्रकाशित और प्रसारित करनी शुरू कर दी जो सरकारी बुलेटिन से काफी ज्यादा थी। जनता का भरोसा फिर डगमगाया। हालांकि इस पर सत्र में चर्चा न होना भी एक पहेली कम, साजिश ज्यादा है। दिलचस्प पहलू है कि इसी दौरान पेगासस कांड ने ऐसे गंभीर मुद्दे की हवा निकाल दी। दिल्ली, छतीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश समेत अधिकांश राज्यों की सरकारों ने झूठ की आड़ ली। जब राज्यों की किरकिरी होने लगी तो राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा ने फिर झूठ लिखा कि केंद्र को ऑक्सीजन के लिए 50 पत्र लिखे, पर रिपोर्ट जो भेजी उसे गोल कर दिया। उसी प्रकार दिल्ली में जयपुर गोल्डन हॉस्पिटल में 23 अप्रैल को ऑक्सीजन की कमी से 21 मरीजों की गई जानों को लेकर इसके मेडिकल अधीक्षक डा. एसके बलुजा ने मीडिया को दिए बयान में इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि कई बार दिल्ली सरकार को फोन किए गए, चिट्ठी लिखी गई। बत्रा हॉस्पिटल में एक मई को 12 रोगियों की मौत की पुष्टि इसके निदेशक डा. एसएल गुप्ता ने की। दो नहीं, कई निदेशक, अधीक्षक ऐसे बयान दे चुके हैं तो लीपापोती के लिए उनके विरुद्ध दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने चार सदस्यीय समिति गठित कर दी है जो सच का पता करेगी। लोगों ने जो दर्दनाक मंजर देखे, मीडिया के कवरेज, डाक्टरों और अस्पताल प्रबंधन के लगातार आ रहे बयान, पुष्टि सब झूठ का पुलिंदा। ऐसी झूठी रिपोर्टें संसद में तो कभी विधानमंडल के पटलों पर प्रस्तुत कर एक नहीं, अनेक झूठ की इमारत तैयार की जा रही हैं। सरकार ने बताया कि घरेलू वैक्सीन उत्पादकों के साथ कारज में कोई देरी नहीं की तो फिर एक सवाल जनता के बीच है कि हजारों लोग क्यों टीकाकरण केंद्र से घंटों इंतजार के बाद रोज वापस लौट रहे हैं।

हर सुबह लंबे  इंतजार और दिहाड़ी छोड़ कर जान की सुरक्षा की खातिर कड़ी धूप तो कहीं तेज बारिश में भीगते जब केंद्र में लंबी लाइन के बाद पहुंचते हैं तो अगले दिन देख लें, यही कहा जाता है। सरकार ने अग्रिम राशि का भी भुगतान कर दिया तो फिर वैक्सीन क्यों नहीं केन्द्रों में पहुंचाई जा रही है। 18 साल से अधिक उम्र के सभी लोगों के टीकाकरण को पूरा करने का कोई निश्चित समय तय न होना चिंताजनक है। तीसरी लहर शुरू हो गई, किंतु स्वास्थ्य सेवाओं में कोई सुधार नहीं दिख रहा है। विदित है कि देश में 854 पर सिर्फ एक डॉक्टर है, जबकि 559 पर एक नर्स। हालिया सिरो सर्वे ने सलाह दी है कि देश की 68 फीसदी आबादी पुनः संक्रमित हो सकती है। इस स्थिति में मास्क पहनने और हाथ धोने के नियम को पालन करते हुए शारीरिक दूरी बनाए रखना लाजिमी है। बाज़ार में रौनक लाने के लिए जिस तरह सब कुछ धड़ल्ले से खुल रहे हैं, ऐसे में इसे रोकना बड़ी चुनौती तब है जब सरकारें झूठ बोलने में माहिर हो गई हैं और लोगों का जीवन भगवान भरोसे है। विशेषज्ञों की मानें तो तीसरी लहर अगस्त और दिसंबर के बीच कभी भी आ सकती है। सरकार को स्वास्थ्य बजट में भारी बढ़ोतरी करने की जरूरत है। वर्तमान में केंद्र कुल जीडीपी का केवल एक प्रतिशत सेहत पर खर्च कर रहा है। उच्चतम न्यायालय के अतिरिक्त मुंबई, पटना, राजस्थान, इलाहाबाद समेत कई हाईकोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई। इसके बावजूद स्वास्थ्य के मामले में सरकारें उदासीन हैं। इसी कारण मौतों के आंकड़ों को छिपाया जा रहा है। प्रशासन कोविड से हुई मौत का सर्टिफिकेट देने में आनाकानी कर रहा है। जब सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना से हुई मृत्यु के कारण प्रत्येक शोक संतप्त परिवार को साढ़े छह लाख देने को कहा तो वित्तीय कमी का बहाना केंद्र बनाने लगा। कई राज्यों की सरकारें कोरोना को आपदा नहीं मान रही हैं, ताकि मुआवजा न देने पड़े। कोर्ट में गोलमोल जवाब देने के लिए अभी से प्रशासन को तैयार किया जा रहा है। आपदा न मानने का नुकसान  यह हुआ कि कोरोना से मरे परिवारों को बीमा कंपनियां मुआवजा नहीं दे रही हैं। कोरोना पीडि़त या जान गंवा चुके लोगों के परिजनों को आर्थिक क्षति काफी हो रही है। ऐसे में सरकार से उम्मीद करना व्यर्थ है। कोर्ट ही एकमात्र मार्ग है जिसे भी सरकार बंद करने का उपाय सोच रही है। कंगाल और हताश कोरोना पीडि़त परिवार आत्महत्या को विवश हैं। उल्लेखनीय है कि 2017 में नेशनल हेल्थ प्रोफाइल में जिक्र है कि राज्य सरकार द्वारा संचालित एक अस्पताल पर लगभग एक लाख आबादी निर्भर करती है। वर्तमान में बिस्तर की उपलब्धता मामले में भारत का 167 देशों में 155वां स्थान है। यह बांग्लादेश, केन्या और चिली से भी पीछे है। लोगों की मज़बूरी है कि वे प्राइवेट हॉस्पिटल की तरफ दौडें़। एक अनुमान के मुताबिक देश में अच्छे इलाज के लिए छह करोड़ लोग गरीबी की रेखा से नीचे धकेल दिए जाते हैं।

डा. अंजनी कुमार झा

स्वतंत्र लेखक

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