जिन प्रेम कियो तिन ही प्रभ पायो
मन में अगर अहंकार और ईष्र्या का भाव लाकर प्रेम करेंगे, तो वह प्रेम कभी सफल नहीं होगा क्योंकि हम उस प्रेम को कभी गहराई से महसूस ही नहीं कर पाएंगे। किसी का दुख बांटना भी प्रेम का ही रूप है। अक्सर जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब कोई हमें अपना दुख बताना चाहता है, अपनी चिंता जाहिर करना चाहता है, अपनी समस्या के बारे में बात करना चाहता है, लेकिन हम हैं कि सुनते ही नहीं, पूरी बात सुने बिना सलाह देने लग जाते हैं, या तो उसकी गलती निकालने लग जाते हैं या फिर तरह-तरह के हल सुझाने शुरू कर देते हैं। हमने पूरी स्थिति को समझा नहीं, जाना नहीं, समस्या से जुड़े बाकी तथ्यों और लोगों के बारे में कुछ भी जाने बिना सलाह देने पर उतर आते हैं। हम में सुनने का धीरज ही नहीं है। जो व्यक्ति हमें अपनी समस्या बताकर दिल की भड़ास निकालने आया था, हमारे व्यवहार से वह और भी परेशान होकर वापस चला जाता है…
यह सच है कि सत्संग करना, पूजा अर्चना करना, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि जाना, धर्म ग्रंथों का पठन-पाठन, दान देना, किसी की सहायता करना, किसी का मार्गदर्शन करना आदि सब पुण्य के काम हैं, बशर्ते कि इन सब में हमारी आत्मा जुड़ी हो। हमारे कर्मों में भक्ति तभी शामिल होती है यदि हमारे हर काम का बीज प्रेम हो। यह बहुत गहरी बात है और इसे ध्यान से समझने की आवश्यकता है। हम प्रार्थना करें और यह सोचें कि लोग हमें प्रार्थना करते हुए देखें, हमें नोटिस करें तो वह प्रार्थना नहीं है, आडंबर है। हम दान करें और उसका ढिंढोरा पीटें तो वह दान नहीं है, आत्म-प्रशंसा और आत्म-प्रचार है। हम किसी का भला करें और गर्वित महसूस करें तो यह अपने अहंकार का पोषण है। हम पूजा करें और मन्नत मांगें तो यह पूजा नहीं है, अर्चना नहीं है, भीख का कटोरा है, सौदेबाजी है और परमात्मा के सिस्टम पर अविश्वास है, बल्कि परमात्मा पर ही अविश्वास है। सभी तरह के कर्मकांड अगर ऐसे हैं जिनके मूल में समर्पण और निश्छल प्रेम नहीं है तो वे लालच अथवा डर का परिणाम हैं या फिर दुनिया में अपनी छवि गढऩे का प्रयास हैं या फिर भीड़ की नकल मात्र हैं। ये सब कारण हमारे अहंकार के पोषण के ही लिए हैं। ऐसे सभी काम कितने ही बड़े स्तर पर किए जाएं, कितनी ही धूमधाम से किए जाएं, अंतत: व्यर्थ हैं और इन सबके बावजूद भी हम खोखले ही रह जाते हैं।
इनसे अगर कोई संतुष्टि मिलती भी है तो वह अस्थायी है, क्योंकि इनसे वाहवाही तो मिल सकती है, अपने मन में हम जानते ही हैं कि इनका कोई अर्थ नहीं है। इसके विपरीत हमारी भावनाओं से निकलने वाले प्रेम से ओत-प्रोत हर काम किसी भी पूजा से कम नहीं है। प्रार्थना का मूल सिर्फ प्रेम है। परमात्मा से प्रेम तभी सार्थक है जब हम परमात्मा की रचना से प्रेम करें, ब्रह्मांड की हर जड़-चेतन वस्तु से प्रेम करें, पेड़-पौधों से प्रेम करें, पशुओं से प्रेम करें, कीट-पतंगों से प्रेम करें, नदियों, झीलों और तालाबों से प्रेम करें, लकड़ी, पत्थर, मिट्टी और लोहे से प्रेम करें। प्रेम करें, बस प्रेम करें। प्रेम का एक ही संदेश है कि न दुनिया से भागो, न दुनिया को त्यागो, बस जागो। हम गृहस्थी हों या संन्यासी, बस दुनिया में रहकर सबसे प्रेम करें, सब में प्रेम बांटें, मुस्कुराएं और मुस्कुराहटें बांटें, दूसरों को निश्छल और सात्विक प्रेम से मुस्कुराने का कारण दें तो ही हम परमात्मा को पा सकते हैं। सच ही कहा गया है- ‘कोई हमारी वजह से मुस्कुराए, दिन ऐसा जिंदगी में रोज आए।’ गुरु गोबिंद सिंह जी ने तो डंके की चोट पर कहा- ‘सांच कहौं सुन लेओ सभै, जिन प्रेम कियो तिन ही प्रभ पायो।’ जिसने प्रेम किया, उसी ने प्रभु को पाया है, जो इस विचार को दर्शाता है कि प्रेम में ही ईश्वर मिलते हैं। गुरु गोबिंद सिंह जी बाहरी कर्मकांडों की वर्जना करते थे और लोगों को अंधविश्वास की बेडिय़ों से मुक्ति पाने की सलाह देते थे।
उनकी सीख थी कि हमें ईश्वर से सच्चे प्रेम का नाता जोडऩा चाहिए और साथ ही उसकी संतान मानवमात्र से ऊंच-नीच का भाव त्याग कर प्यार, सहृदयता, विनम्रता एवं आपसी भाईचारे का भाव लाना चाहिए। वे कहते थे कि सच्चे और शुद्ध प्रेम के माध्यम से ही परम आनंद और परमात्मा की प्राप्ति होती है। जिस किसी ने प्रेम को समझा और जिया है, वही इसे प्राप्त करने का हकदार है। प्रेम कोई पाने की चीज नहीं, बल्कि एक ऐसा अनुभव है जिसमें व्यक्ति खुद को खो देता है। यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें अहंकार और वासना समाप्त हो जाते हैं, क्योंकि प्रेम इन भावनाओं को टिकने नहीं देता। प्रेम एक ऐसी भावना है जिसके कई रूप हैं, लेकिन हर रूप में वह हमारे जीवन को मिठास से ही भरता है। इसके साथ ही गुरु जी ने यह भी कहा कि ‘रे मन ऐसो कर संन्यासा, वन से सदन सबै कर समझहु मन ही माहिं उदासा। अलप अहार, सुलप सी निद्रा दया क्षमा तन प्रीति, सील संतोष सदा निरवाहिबो हवैवो त्रिगुण अतीत।’ गुरु जी के इस कथन का भावार्थ यह है कि प्राणी मात्र को सहज मार्ग अपनाते हुए कहते हैं कि तटस्थ उदासीनता का भाव रखते हुए घर को ही जंगल समझें एवं साधुत्व की अनुभूति करें। अल्प आहार एवं अल्प निद्रा के साथ दया, विनम्रता, क्षमा और संतोष को आत्मसात करें। गुरु जी ने स्पष्ट किया कि बिना धर्म-ज्ञान एवं ईश्वर की भक्ति से जुड़े, बड़ी से बड़ी फौज भी उनकी रक्षा नहीं कर सकती। गीता में भी भगवान श्री कृष्ण ने प्रेम के इसी स्वरूप की बात की है। प्रेम किसी से कुछ हासिल करने का नाम नहीं है, न ही प्रेम केवल खुद को सुख देने के लिए है। इस प्रेम में कोई शर्त नहीं है। यह समझना आवश्यक है कि प्रेम और लगाव दो अलग स्थितियां हैं। प्रेम जब निश्छल हो, सबके लिए हो, तभी वह प्रेम है। प्रेम वो नहीं, जो छीनने से प्राप्त हो। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि किसी से ज्यादा लगाव हानिकारक हो जाता है क्योंकि अत्यधिक लगाव उम्मीद की ओर ले जाता है और उम्मीद पूरी न होने पर दु:ख का कारण बन जाता है।
मन में अगर अहंकार और ईष्र्या का भाव लाकर प्रेम करेंगे, तो वह प्रेम कभी सफल नहीं होगा क्योंकि हम उस प्रेम को कभी गहराई से महसूस ही नहीं कर पाएंगे। किसी का दुख बांटना भी प्रेम का ही रूप है। अक्सर जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब कोई हमें अपना दुख बताना चाहता है, अपनी चिंता जाहिर करना चाहता है, अपनी समस्या के बारे में बात करना चाहता है, लेकिन हम हैं कि सुनते ही नहीं, पूरी बात सुने बिना सलाह देने लग जाते हैं, या तो उसकी गलती निकालने लग जाते हैं या फिर तरह-तरह के हल सुझाने शुरू कर देते हैं। हमने पूरी स्थिति को समझा नहीं, जाना नहीं, समस्या से जुड़े बाकी तथ्यों और लोगों के बारे में कुछ भी जाने बिना सलाह देने पर उतर आते हैं। हम में सुनने का धीरज ही नहीं है। जो व्यक्ति हमें अपनी समस्या बताकर दिल की भड़ास निकालने आया था, हमारे व्यवहार से वह और भी परेशान होकर वापस चला जाता है। सच तो यह है कि बहुत से मामलों में समस्याग्रस्त व्यक्ति को हमारी सलाह की आवश्यकता ही नहीं होती, उन्हें बस धीरज से सुन पाने वाला कोई व्यक्ति चाहिए, जो सहानुभूतिपूर्वक उनकी बात सुन ले, कोई सलाह न दे, कोई सुझाव न दे, बस बात सुनता जाए। हर बात का सार यही है कि हम प्रेम करें, और बिना किसी भेदभाव के सभी के साथ सच्चे मन से प्रेम करें। इतना ही काफी है। परमात्मा तो हमसे बस इतना ही चाहते हैं। इसीलिए कहा गया है कि जिन प्रेम कियो तिन ही प्रभ पायो।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com
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