खेल, ध्यान और क्रांति
हमें कोई डर हो तो उसी डर की विपरीत दिशा में चलें, हमेशा चुप रहते हों तो आज बोलें, हमेशा बोलते हों तो आज चुप रहें। हमेशा व्यवस्थित रहते हों तो आज थोड़ा बिखर जाने दें। मन को झटका चाहिए। मन को किसी ताजी हवा की जरूरत है, और यह हवा आदतों को तोड़े बिना नहीं आती। जब हम अपने नियमित कामों को अलग ढंग से करना शुरू कर देते हैं तो हमारी प्रतिक्रियाएं बदलती हैं, निर्णय बदलते हैं, मूड बदलता है और अंत में हम बदल जाते हैं। मानव व्यवहार का एक बड़ा भाग स्वचालित होता है। हम दिन भर में अनगिनत निर्णय लेते हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश सचेत नहीं होते, कांशस नहीं होते, वे अवचेतन रूप से स्थापित आदतों के अनुसार चलते हैं। यह स्वचालितता एक गहन तंत्रिका-वैज्ञानिक, न्यूरोबायलॉजिकल प्रक्रिया का परिणाम है…
हमने कभी यह नहीं समझा कि हमारी आदतें ही हमारी पहचान बन गई हैं। हमारे दैनिक कामों की रुटीन ही हमें ‘हम’ बना देती है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि जब हम जानबूझ कर प्रतिदिन के किसी काम को किसी अलग ढंग से करते हैं, तो तीन प्रभाव होते हैं। पहला, वह हमारी रूढ़ हो चुकी आदतों को तोड़ता है, दूसरा, हमें हमारी प्राथमिकताओं और प्रवृत्तियों का ज्ञान होता है। तब हमें भान होता है कि क्या हम सचमुच वही चाहते हैं जो हम करते आए हैं, या वही किया जा रहा है जो हमारे समाज या हमारी परिस्थितियों ने निर्धारित कर दिया है? और तीसरा यह कि जब हम किसी काम को नए ढंग से करते हैं तो हमारा दिमाग कुछ नई अनजानी बातें देख और सीख सकता है, जो हमारे लिए कई बार कई नई राहें खोल देता है। इस प्रक्रिया का एक व्यावहारिक और आसान तरीका यह है कि सप्ताह में एक बार हम कोई छोटा काम किसी अलग ढंग से करें और अपने भीतर की प्रतिक्रियाओं का निरीक्षण करें। यह एक साधन है, आत्म-परीक्षण का उपकरण, जो हमें बताता है कि हम किस हद तक अपनी आदतों के गुलाम हैं और इस गुलामी को हम कैसे तोड़ सकते हैं। जीवन बाहर से जितना सरल दिखता है, भीतर उतना ही जटिल, गूढ़ और गहन अनुभवों का संगीत बजता रहता है। हर मनुष्य रोज सुबह उठता है, कुछ काम करता है, भोजन करता है, सफर करता है, परिवार निभाता है, फिर रात को कुछ थका हुआ सा सो जाता है और अगला दिन फिर उसी कदमों पर चलता रहता है।
देखने में यह एक सामान्य क्रम है, लेकिन यदि मनन से देखें तो यह क्रम ही धीरे-धीरे हमारी बंदिश बन जाता है। हम सोचते नहीं, करते रहते हैं, महसूस नहीं करते, केवल चलते रहते हैं, जागते नहीं, बस जगते दिखाई देते हैं। यह सच है कि जो स्वचालित हो गया, ऑटोमेशन मोड में आ गया, वह आधा मृत हो गया क्योंकि आदतन एक ही तरह से रूटीन के सारे काम निपटाते हुए भी हमें दिमाग से कुछ सोचना नहीं पड़ता, कुछ सीखना नहीं पड़ता, बस हम काम निपटाते चले जाते हैं। इसमें आत्म विकास नहीं है, ग्रोथ नहीं है, इवॉल्यूशन नहीं है, क्योंकि जीवन वहीं बहता है जहां चेतना प्रवाहित होती है, जहां उपस्थिति है, जहां करुणा और जागरूकता मिलकर वर्तमान क्षण को नवीन बनाते हैं। जब मनुष्य हर कार्य को बिना ध्यान, बिना प्रश्न, बिना अंतर-दर्शन के करता है, तो वह धीरे-धीरे अपने ही जीवन का बोझ ढोने वाला यंत्र बनकर रह जाता है। हमारी रोजमर्रा की आदतें, वही रास्ता, वही दिनचर्या, वही प्रतिक्रिया, एक प्रकार की आंतरिक जड़ता को जन्म देती हैं। मन कहता है कि यह सब सुविधाजनक है, सहज है, और शायद यह सही भी है, लेकिन इसमें जीवंतता नहीं है। यही कारण है कि गुरुजन कहते हैं कि हम सप्ताह में एक बार, किसी एक कार्य को अलग ढंग से करके देखें। यह उपाय महज खेल नहीं है। यह मनुष्य को उसकी जड़ता से बाहर लाने का एक आंतरिक साधना-पथ है। जैसे ध्यान में हम सांसों के आने-जाने को देखते हैं, वैसे ही जीवन में हम अपने कर्मों की स्वचालितता को देखते हैं। जब हम किसी छोटे से कार्य को भी अलग ढंग से करते हैं, तो अचानक भीतर झटके जैसा अनुभव होता है। चेतना पल भर के लिए चौंक जाती है। यही चौंकना ही जागरण की शुरुआत है। शायद हम सोचेंगे कि आखिर इस छोटे प्रयोग में इतना बड़ा रहस्य क्या है? रहस्य यही है कि जागृति छोटे-छोटे प्रयोगों से आती है, बड़ी क्रांतियों से नहीं। हम जीवन को एक बड़े पर्वत की तरह बदलना चाहते हैं, जबकि पर्वत हर दिन एक-एक कंकड़ से बनता है। मनुष्य की चेतना भी ऐसे ही धीरे-धीरे जागती है, एक छोटे परिवर्तन से, एक छोटे अलग किस्म के अनुभव से। जब हम प्रतिदिन की स्वचालितता को एक पल के लिए रोकते हैं, तब हम एक नए जीवन की शुरुआत करते हैं।
जो हम हमेशा करते रहे, उसे एक दिन किसी अलग ढंग से करके हम यह महसूस कर सकते हैं कि हमारी पसंद असल में हमारी नहीं थी, हमारी सीमाएं हमारी नहीं थीं, हमारी प्रतिक्रियाएं हमारी नहीं थीं, वे सब परिस्थितियों, डर, सामाजिक अपेक्षाओं और बीते अनुभवों की देन थीं। जब यह स्पष्ट होता है, तो हम भीतर से हल्के हो जाते हैं। यही हल्कापन आत्मा को आगे बढऩे की दिशा देता है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि कामों को अलग ढंग से करने का अभ्यास कोई विद्रोह नहीं है। यह असंतोष पैदा करने का उपकरण नहीं है। यह मन को संतुलित करने, जड़ता को भंग करने और आत्मा की भाषा को सुनने का एक सहज और मधुर साधन मात्र है। ऐसे में हर काम एक खेल हो जाएगा, ध्यान में बदल जाएगा और जीवन में क्रांति की शुरुआत का कारण बनेगा। हमें लगता है कि हमारी आदतें हमें सुरक्षित रखती हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि यही आदतें हमें कैदी बनाए रखती हैं। आदतें सुविधा देती हैं, पर स्वतंत्रता नहीं। स्वतंत्रता तब जन्म लेती है जब हम अपने मन को चौंकाते हैं, जब हम कुछ ऐसा करते हैं जिसकी हमारे मन को उम्मीद नहीं थी। यह कोई तकनीक नहीं, कोई विधि नहीं, यह एक खेल है, लेकिन यही खेल हमारे भीतर क्रांति लाता है। बस एक दिन के लिए एक निर्णय लें कि जो हम हमेशा करते आए हैं, आज उसके बिल्कुल उल्टा करेंगे, या कम से कम उसे अलग ढंग से करेंगे।
यह झटका आनंद का खेल है और जागरण की शुरुआत है। हमें कोई डर हो तो उसी डर की विपरीत दिशा में चलें, हमेशा चुप रहते हों तो आज बोलें, हमेशा बोलते हों तो आज चुप रहें। हमेशा व्यवस्थित रहते हों तो आज थोड़ा बिखर जाने दें। मन को झटका चाहिए। मन को किसी ताजी हवा की जरूरत है, और यह हवा आदतों को तोड़े बिना नहीं आती। जब हम अपने नियमित कामों को अलग ढंग से करना शुरू कर देते हैं तो हमारी प्रतिक्रियाएं बदलती हैं, निर्णय बदलते हैं, मूड बदलता है और अंत में हम बदल जाते हैं। मानव व्यवहार का एक बड़ा भाग स्वचालित होता है। हम दिन भर में अनगिनत निर्णय लेते हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश सचेत नहीं होते, कांशस नहीं होते, वे अवचेतन रूप से स्थापित आदतों के अनुसार चलते हैं। यह स्वचालितता एक गहन तंत्रिका-वैज्ञानिक, न्यूरोबायलॉजिकल प्रक्रिया का परिणाम है। जब कोई व्यवहार बार-बार दोहराया जाता है, तो मस्तिष्क के न्यूरॉन्स आपस में विशेष पैटर्न बनाते हैं। मनोविज्ञान में इस प्रक्रिया को हैब्बियन लर्निंग कहा जाता है। जो न्यूरॉन्स बार-बार एक साथ सक्रिय होते हैं, उनके बीच कनैक्शन मजबूत होते जाते हैं, परिणाम यह होता है कि उस काम को करने में कम ऊर्जा लगने लगती है। इस क्रम को बदलना खेल सरीखा है जो वस्तुत: ध्यान का पहला चरण है और जीवन में क्रांति की शुरुआत है।
स्पिरिचुअल हीलर, सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण
गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com
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