महेश नवमी : माहेश्वरी समाज का प्रमुख उत्सव

By: Jun 20th, 2026 12:29 am

महेश नवमी ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। यह नवमी माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति का दिन है। माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति भगवान शिव के वरदान स्वरूप मानी गई है। महेश नवमी माहेश्वरी धर्म में विश्वास करने वाले लोगों का प्रमुख त्योहार है। इस पावन पर्व को हर्षोल्लास व धूमधाम से मनाना प्रत्येक माहेश्वरी का कत्र्तव्य है और समाज उत्थान व एकता के लिए अत्यंत आवश्यक भी है। ‘महेश’ स्वरूप में आराध्य ‘शिव’ पृथ्वी से भी ऊपर कोमल कमल पुष्प पर बेलपत्ती, त्रिपुंड्र, त्रिशूल, डमरू के साथ लिंग रूप में शोभायमान होते हैं। भगवान शिव के इस बोध चिह्न के प्रत्येक प्रतीक का अपना महत्व होता है।

माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति

ज्येष्ठ शुक्ल नवमी को महेश नवमी या महेश जयंती का उत्सव माहेश्वरी समाज द्वारा मनाया जाता है। यह उत्सव महेश यानी शिव और माता पार्वती की आराधना को समर्पित है। महेश यानी शंकर, जो त्रिदेवों- ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से एक हैं। ऐसी मान्यता है कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष के नवें दिन भगवान शंकर की कृपा से माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति हुई थी। धर्मग्रंथों के अनुसार माहेश्वरी समाज के पूर्वज पूर्वकाल में क्षत्रिय वंश के थे। शिकार के दौरान वह ऋषियों के शाप से ग्रसित हुए। किंतु इस दिन भगवान शंकर ने अपनी कृपा से उन्हें शाप से मुक्त कर न केवल पूर्वजों की रक्षा की, बल्कि इस समाज को अपना नाम भी दिया। इसलिए यह समुदाय माहेश्वरी नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसमें महेश यानी शंकर और वारि यानी समुदाय या वंश। भगवान शंकर की आज्ञा से ही इस समाज के पूर्वजों ने क्षत्रिय कर्म छोडक़र वैश्य या व्यापारिक कार्य को अपनाया। इसलिए आज भी माहेश्वरी समाज वैश्य या व्यापारिक समुदाय के रूप में पहचाना जाता है। माहेश्वरी समाज के 72 उपनामों या गोत्र का संबंध भी इसी प्रसंग से है।

बोध चिन्ह व प्रतीक

महेश स्वरूप में आराध्य भगवान शिव पृथ्वी से भी ऊपर कोमल कमल पुष्प पर बेलपत्ती, त्रिपुंड्र, त्रिशूल, डमरू के साथ लिंग रूप में शोभायमान होते हैं। भगवान शिव के इस बोध चिह्न के प्रत्येक प्रतीक का अपना महत्व है। पृथ्वी- पृथ्वी गोल परिधि में है, परंतु भगवान महेश ऊपर हैं, अर्थात पृथ्वी की परिधि भी जिन्हें नहीं बांध सकती, वह एक लिंग भगवान महेश संपूर्ण ब्रह्मांड में सबसे ऊपर हैं। त्रिपुंड्र- इसमें तीन आड़ी रेखाएं हैं, जो कि संपूर्ण ब्रह्मांड को समाए हुए हैं। एक खड़ी रेखा यानी भगवान शिव का ही तीसरा नेत्र, जो कि दुष्टों के दमन हेतु खुलता है। यह त्रिपुंड भस्म से ही लगाया जाता है, जो कि देवाधिदेव महादेव की वैराग्य वृत्ति के साथ ही त्यागवृत्ति की ओर इंगित करता है तथा आदेश देता है कि हम भी अपने जीवन में हमेशा त्याग व वैराग्य की भावना को समाहित कर समाज व देश का उत्थान करें। त्रिशूल- विविध तापों को नष्ट करने वाला एवं दुष्ट प्रवृत्ति का दमन कर सर्वत्र शांति की स्थापना करता है। डमरू- स्वर, संगीत की शिक्षा देकर कहता है उठो, जागो और जनमानस को जागृत कर समाज व देश की समस्याओं को दूर करो, परिवर्तन का डंका बजाओ। कमल- जिसमें नौ पंखुडिय़ां हैं, जो कि नौ दुर्गाओं का द्योतक है। नवमी ही हमारा उत्पत्ति दिवस है। कमल ही ऐसा पुष्प है, जिसे भगवान विष्णु ने अपनी नाभि से अंकुरित कर ब्रह्मा की उत्पत्ति की। महालक्ष्मी कमल पर ही विराजमान हैं व दोनों हाथ में कमल पुष्प लिए हैं। ज्ञान की देवी सरस्वती भी श्वेत कमल पर विराजमान हैं। इतना ही नहीं कमल कीचड़ में खिलता है, जल में रहता है, परंतु किसी में भी लिप्त नहीं। अत: यही भाव समाज का होना चाहिए।

धार्मिक महत्त्व

माहेश्वरी समाज के लिए यह दिन बहुत धार्मिक महत्त्व का होता है। इस उत्सव की तैयारी करीब तीन दिन पूर्व ही शुरू हो जाती है, जिनमें धार्मिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन उमंग और उत्साह के साथ होता है। ‘जय महेश’ के जयकारों की गूंज के साथ चल समारोह निकाले जाते हैं। महेश नवमी के दिन भगवान शंकर और पार्वती की विशेष आराधना की जाती है। समस्त माहेश्वरी समाज इस दिन भगवान शंकर और पार्वती के प्रति पूर्ण भक्ति और आस्था प्रकट करता है। जगत कल्याण करने वाले भगवान शंकर ने जिस तरह क्षत्रिय राजपूतों को शिकार छोडक़र व्यापार या वैश्य कर्म अपनाने की आज्ञा दी, यानी हिंसा को छोडक़र अहिंसा के साथ कर्म का मार्ग बताया, इससे महेश नवमी का यह उत्सव यही संदेश देता है कि मानव को यथासंभव हर प्रकार की हिंसा का त्याग कर जगत कल्याण, परोपकार और स्वार्थ से परे होकर कर्म करना चाहिए।


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