एक तेज भूकंप और सब होगा खत्म, आखिर खतरे से निपटने के लिए कितनी तैयार है देवभूमि
हिमाचल में प्रलय की आहट- हिमाचल पर मंडरा रहा है बड़ा खतरा
भूकंप कभी भी मचा सकता है तबा.ही
भूकंप की दृष्टि से रेड जोन में है हिमाचल
5 से अधिक तीव्रता के भूकंप से सब होगा तहस- नहस
आपने अक्सर सुना होगा कि अगर किसी को जन्नत का दिदार करना है तो एक बार हिमाचल घूम लीजिए…ऊंचे-ऊंचे पर्वत, गहरी घाटियां और बहती नदियों के बीच बसा हिमाचल प्रदेश इतना सुंदर है कि आपको स्वर्ग का एहसास करवा दे. लेकिन यहां की खामौशी कब खौफ में बदल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता.. क्योंकि यहां प्राकृतिक आपदाए किसी भी पल जनजीवन को अस्त व्यस्त कर सकती है। बीते रोज यहां के लोगों ने कुछ ऐसा ही खौफ महसूस किया. जब रात को हिमाचल के अधिकांश इलाकों में जोरदार भूकंप के झटके महसूस किए गए। भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर लगभग पांच दर्ज की गई है। एक पल के लिए यकीनन आप भी सहम गए होंगे क्योंकि हिमाचल के लिए इतना तेज गति का भूकंप प्रकृति के अल्टीमेटम से कम नहीं है।
ऐसा इसलिए क्योंकि, हिमाचल प्रदेश देश के उन राज्यों में शामिल है जो भूकंप के लिहाज से सबसे अधिक संवेदनशील माने जाते हैं। प्रदेश का अधिकांश हिस्सा भूकंपीय जोन-4 और जोन-5 में आता है, जिन्हें उच्च और अत्यधिक जोखिम वाले क्षेत्र माना जाता है। कांगड़ा, चंबा, कुल्लू, मंडी, शिमला, किन्नौर और लाहौल-स्पीति जैसे जिले विशेष रूप से संवेदनशील हैं। यहां पर खतरा सबसे अधिक है ये एक तरह से रेड जोन है।
विशेषज्ञों के अनुसार हिमालय दुनिया की सबसे युवा पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। और हिमालयी क्षेत्र में भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के निरंतर टकराव से धरती के भीतर भारी दबाव बन रहा है। काफी समय से कोई बड़ा भूकंप न आने के कारण यह ऊर्जा भीतर ही भीतर जमा होती जा रही है, वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र में भविष्य में बड़े भूकंप आने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। यही जमा हो रही उर्जा कभी भी विनाशकारी झटकों के रूप में बाहर आ सकती है।
अगर आप हिमाचल का इतिहास भी देखेंगे तो हिमाचल ने अतीत में कई विनाशकारी भूकंपों का दर्द झेला है। वर्ष 1905 में कांगड़ा में आया भूकंप भारतीय इतिहास के सबसे भयानक भूकंपों में गिना जाता है। रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता लगभग 7.8 मापी गई थी और इसमें करीब 20 हजार लोगों की जान चली गई थी। हजारों इमारतें धराशायी हो गई थीं और पूरा क्षेत्र तबाही की तस्वीर बन गया था। आज भी कांगड़ा का ऐतिहासिक किला इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण कि उस वक्त किस तरह से भूकंप ने यहां तबाही मचाई थी। इसके बाद जनवरी, 1975 को हिमाचल प्रदेश के किन्नौर और लाहौल-स्पीति जिलों में 6.8 तीव्रता का एक विनाशकारी भूकंप आया था, जिसमें कई लोगों की जान गई थी। इसके बाद भी 4 से 5 तीव्रता के हिमाचल में कई झटके महसूस किए जा चुके हैं।
ऐेसे में विशेषज्ञ पहले ही इस बात की चेतावनी दे चुके हैं कि अगर हिमाचल में 5 के उपर या 1905 जैसा भूकंप फिर आया तो हिमाचल में सब ठप हो जाएगा. प्राकृति आपदाओं के कारण हिमाचल का नामों निशान मिट सकता है, चिंता केवल भूकंप तक सीमित नहीं है। हिमाचल में तेजी से हो रहा शहरीकरण, पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई, ढलानों पर बिना वैज्ञानिक अध्ययन के निर्माण कार्य और बढ़ती आबादी जोखिम को और बढ़ा रहे हैं। अगर भविष्य में कोई बड़ा भूकंप आता है तो कमजोर भवन, संकरी सड़कें और संवेदनशील ढलान नुकसान को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
NDMA के वर्ष 2012 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, अगर हिमाचल प्रदेश में लगभग 8.0 तीव्रता का भूकंप आता है, तो परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं, 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर, यह अनुमान लगाया गया था कि ऐसी स्थिति में लगभग 1,60,000 लोगों की मृत्यु (कुल जनसंख्या का 2.3%) और 11,00,000 लोग घायल (कुल जनसंख्या का 16%) हो सकते हैं. यकीनन इस वक्त अगर हिमाचल में कुछ भी ऐसा होता है तो परिणाम काफी भयंकर हो सकते हैं। हमारी सोच से भी ज्यादा।
हालांकि आपदा को रोका नहीं जा सकता, लेकिन इसके प्रभाव को कम जरूर किया जा सकता है। अगर हम अब भी थोड़ी समझदारी दिखाते हैं तो हिमाचल को बचाया जा सकता है. और उसके लिए सबसे पहले हमें पहाड़ों को बचाना होगा. विकास की दौड़ में कंकरीट के पहाड़ खड़े करने पर विचार करना जरूरी है. यहीं नहीं भूकंपरोधी निर्माण को बढ़ावा देना, भवन निर्माण नियमों का सख्ती से पालन, नियमित मॉक ड्रिल, लोगों में जागरूकता और आधुनिक चेतावनी तंत्र इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। यही नहीं स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक भवनों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
इस बात में कोई दो राय नहीं कि हिमाचल पर भूकंप का एक अदृश्य खतरा बना हुआ है। सवाल यह नहीं कि भूकंप आएगा या नहीं, या कितनी तेजी पर हमे डरना होगा। बल्कि सवाल यह है कि जब धरती कांपेगी तो हम कितने तैयार होंगे। समय रहते अगर वैज्ञानिक सोच, मजबूत बुनियादी ढांचे और जन-जागरूकता को गंभीरता से नहीं लिया तो परिणाम भयंकर हो सकते हैं।
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