देवी-देवता के प्रति श्रद्धा ज्ञापित करता है पूड़ू

By: Jun 27th, 2026 12:29 am

देवभूमि हिमाचल प्रदेश में देव समाज और खेतीबाड़ी का गहरा संबंध रहा है। कुछ देवता विशेष रूप से कृषि से संबंधित कार्यों को समर्पित रहे हैं। खेत्रपाल देवता कृषि से संबंधित इन्हीं देवताओं में से एक हैं। जब भी कोई नई फसल तैयार होती है, इन देवी-देवताओं को भोग के रूप में विशेष पूजा (प्रसाद) अर्पित की जाती है। श्रद्धा एवं विधिपूर्वक अर्पित की जाने वाली किसी पूजा को स्थानीय भाषा में पूड़ू कहते हैं। कांगड़ा जिला सहित निचले हिमाचल प्रदेश में देवी-देवताओं को पूड़ू अर्पित करने को लेकर विशेष मान्यता रही है। यहां यह पूड़ू हर 6 महीने में नई फसल निकलने के बाद अर्पित किया जाता है। यह पूजा खेत्रपाल देवता, माल्ल माता आदि देवी-देवताओं को श्रद्धापूर्वक चढ़ाई जाती है। इसके पीछे का विश्वास है कि जो भी नई फसल एवं सुख-समृद्धि घर में आती है, वे इन्हीं देवी-देवताओं के आशीर्वाद से प्राप्त होती है। इसके प्रति अपनी आस्था एवं श्रद्धा ज्ञापित करते हुए यह पूड़ू देवी-देवताओं को चढ़ाने की परंपरा विकसित हुई और कई सदियों से लगातार चली आ रही है। खेत्रपाल देवता की हिमाचल के कृषि प्रधान समाज में विशेष आस्था एवं मान्यता रही है। लोगों का ऐसा विश्वास है कि खेत्रपाल देवता को पूड़ू अर्पित करने से फसल अच्छी तैयार होती है। जानवरों पर भी देवता का आशीर्वाद रहता है। ऐसा भी माना जाता है कि जब जानवरों को कुछ विशेष बीमारियां हो जाती हैं, तो पूड़ू अर्पित कर देवता से उनकी अच्छी सेहत की कामना की जाती है।

देवता के आशीर्वाद से उनकी बीमारियां ठीक भी होती हैं। पूड़ू चढ़ाने से पहले परिवार को विशेष तैयारी करनी पड़ती है। परिवार की महिला सदस्य सात्विक भाव के साथ पूड़ू के रूप में चढ़ाए जाने वाले विशेष पकवान तैयार करती हैं। इन पकवानों में घ्योर, मीठी रोटी, दाल-चावल, खीर इत्यादि शामिल होते हैं। देवी-देवताओं को भोग के रूप में चढ़ाए जाने वाला पूड़ू पीपल के साबूत, साफ एवं धुले हुए पत्तों से पत्तल बनाकर भेंट किया जाता है। महिला सदस्य जो पूजा तैयार करती हैं, उन्हें केवल पुरुष से ही ग्रहण करते हैं। पूड़ू अर्पित करते समय कुछ विशेष नियमों का भी ख्याल रखा जाता है।

देवता के स्थान पर बैठकर पूड़ू ग्रहण करने वाले सदस्य इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं कि अपनी थाली में केवल उतना ही भोजन परोसते हैं, जितना वे खा सकें। थाली में बचा हुआ भोजन छोडऩा अनुचित माना जाता है। भोजन ग्रहण करते समय कोई भी सदस्य बात नहीं करता। मौन व्रत का पूर्ण पालन किया जाता है। जब तक पूड़ू अर्पित करने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक कोई भी सदस्य बीच में अपना स्थान नहीं छोड़ सकता। पूड़ू चढ़ाने की प्रक्रिया पूरी होने के पश्चात सभी सदस्य अगले 15 मिनट के लिए शांत अवस्था में आराम करते हैं। इस दौरान कोई भी कार्य नहीं किया जाता। न ही एक-दूसरे से बातचीत की जाती है। इस प्रकार पूड़ू चढ़ाने की यह परंपरा देव समाज और नागरिक समाज के बीच संवाद एवं विश्वास का एक मजबूत सेतु विकसित करती रही है।

हालांकि पिछले कुछ समय में जिस प्रकार से हिमाचल का समाज कृषि कार्यों से विमुख हुआ है और शहरीकरण का प्रभाव निरंतर बढ़ता जा रहा है, पूड़ू चढ़ाने की परंपरा भी कुछ हद तक कमजोर पड़ी है। इस जीवंत परंपरा को निरंतरता प्रदान करने के लिए हमारे बुजुर्ग समाज को नई पीढ़ी से इस परंपरा को अवगत कराने के लिए प्रयास करने होंगे। नई पीढ़ी को अपने स्तर पर भी अपनी परंपराओं की पहचान और उनकी संभाल करने के लिए उत्साह एवं रुचि दिखानी चाहिए। तभी यह ताना-बाना सुरक्षित रह पाएगा।

-डा. रविंद्र सिंह भड़वाल


Keep watching our YouTube Channel ‘Divya Himachal TV’. Also,  Download our Android App or iOS App