पुराणों का सार

By: Jun 13th, 2026 12:30 am

सनातन धर्म में कुल 18 महापुराण हैं, जिन्हें महर्षि वेदव्यास ने संकलित किया है। इनका मूल सार कर्म, धर्म, भक्ति और नैतिक मूल्यों की शिक्षा देना है। पुराणों का मुख्य उद्देश्य सृष्टि के रहस्य, ईश्वर की महिमा और सुखी जीवन के सिद्धांतों को आम जन तक पहुंचाना है। सभी पुराणों के मुख्य संदेश और उनके वर्गीकरण का सार इस प्रकार है : 1. त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) पर आधारित वर्गीकरण : पुराणों को तीन मुख्य गुणों और देवताओं के आधार पर विभाजित किया गया है : सात्विक (विष्णु केंद्रित) : इसमें भगवान विष्णु के अवतार, ब्रह्मांड विज्ञान और भक्ति पर जोर दिया गया है। प्रमुख पुराण : विष्णु पुराण, भागवत पुराण, गरुड़ पुराण। राजसिक (ब्रह्मा केंद्रित) : इसमें सृष्टि की उत्पत्ति और ऋषियों की वंशावली का वर्णन है। प्रमुख पुराण : ब्रह्म पुराण, ब्रह्मांड पुराण। तामसिक (शिव केंद्रित) : इसमें शिव की महिमा, जीवन-मृत्यु और आध्यात्मिक ज्ञान के विषय शामिल हैं।

प्रमुख पुराण : शिव पुराण, अग्नि पुराण, लिंग पुराण। 2. सभी पुराणों का सामूहिक सार : कर्म ही सर्वोपरि है : सभी पुराणों में बताया गया है कि मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है। अच्छे कर्म पुण्य और बुरे कर्म पाप कहलाते हैं। परम सत्य और माया : सृष्टि को चलाने वाली एक ही सर्वोच्च शक्ति (ईश्वर) है। भौतिक संसार और उसका मोह एक माया है। भक्ति का महत्व : ईश्वर प्राप्ति का सबसे सरल मार्ग सच्ची भक्ति, प्रेम और समर्पण है। सदाचार और धर्म : मनुष्य को हमेशा सत्य, अहिंसा, दया और परोपकार के मार्ग पर चलना चाहिए।

18 पुराणों के नाम और उनका महत्त्व

1. ब्रह्मपुराण

इसे आदिपुराण भी कहा जाता है। प्राचीन माने गए सभी पुराणों में इसका उल्लेख है। इसमें श्लोकों की संख्या अलग-अलग प्रमाणों से भिन्न-भिन्न है। इसका प्रवचन नैमिषारण्य में लोमहर्षण ऋषि ने किया था। इसमें सृष्टि, मनु की उत्पत्ति, उनके वंश का वर्णन, देवों और प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन है। इस पुराण में विभिन्न तीर्थों का विस्तार से वर्णन है।

2. पद्मपुराण

इसमें कुल 641 अध्याय और 48000 श्लोक हैं। मत्स्यपुराण के अनुसार इसमें 55000 और ब्रह्मपुराण के अनुसार इसमें 59000 श्लोक थे। इसका प्रवचन नैमिषारण्य में सूत उग्रश्रवा ने किया था। ये लोमहर्षण के पुत्र थे। इस पुराण में अनेक विषयों के साथ विष्णुभक्ति के अनेक पक्षों पर प्रकाश डाला गया है।

3. विष्णुपुराण

पुराण के पांचों लक्षण इसमें घटते हैं। इसमें विष्णु को परम देवता के रूप में निरूपित किया गया है। इसमें कुल छह खंड हैं, 126 अध्याय, श्लोक 23000 या 24000 या 6000 हैं। इस पुराण के प्रवक्ता पराशर ऋषि और श्रोता मैत्रेय हैं।

4. वायुपुराण

इसमें विशेषकर शिव का वर्णन किया गया है, अत: इस कारण इसे शिवपुराण भी कहा जाता है। एक शिवपुराण पृथक भी है। इसमें 112 अध्याय, 11000 श्लोक हैं। इस पुराण का प्रचलन मगध क्षेत्र में बहुत था। इसमें गया-माहात्म्य है।

5. भागवतपुराण

यह सर्वाधिक प्रचलित पुराण है। इस पुराण का सप्ताह-वाचन-पारायण भी होता है। इसे सभी दर्शनों का सार ‘निगमकल्पतरोर्गलितम’ और विद्वानों का परीक्षास्थल ‘विद्यावतां भागवते परीक्षा’ माना जाता है। इसमें श्रीकृष्ण की भक्ति के बारे में बताया गया है। इसमें 12 स्कन्ध, 335 अध्याय और 18000 श्लोक हैं।

6. नारद (बृहन्नारदीय) पुराण

इसे महापुराण भी कहा जाता है। इसमें पुराण के 5 लक्षण घटित नहीं होते हैं। इसमें वैष्णवों के उत्सवों और व्रतों का वर्णन है। इसमें 2 खंड हैं : (क) पूर्व खंड में 125 अध्याय और (ख) उत्तर-खंड में 82 अध्याय हैं। इसमें 18000 श्लोक हैं। इसके विषय मोक्ष एवं धर्म हैं।

7. मार्कण्डयपुराण

इसे प्राचीनतम पुराण माना जाता है। इसमें इन्द्र, अग्नि, सूर्य आदि वैदिक देवताओं का वर्णन किया गया है। इसके प्रवक्ता मार्कण्डय ऋषि और श्रोता क्रौष्टुकि शिष्य हैं। इसमें 138 अध्याय और 7000 श्लोक हैं। इसमें गृहस्थ-धर्म, श्राद्ध, दिनचर्या, नित्यकर्म, व्रत आदि विषयों का वर्णन है।

8. अग्निपुराण

इसके प्रवक्ता अग्नि और श्रोता वसिष्ठ हैं। इसी कारण इसे अग्निपुराण कहा जाता है। इसे भारतीय संस्कृति और विद्याओं का महाकोश माना जाता है। इसमें इस समय 383 अध्याय, 11500 श्लोक हैं। इसमें विष्णु के अवतारों का वर्णन है।

9. भविष्यपुराण

इसमें भविष्य की घटनाओं का वर्णन है। इसमें दो खंड व 15000 श्लोक हैं। इसमें मुख्यत: ब्राह्मण धर्म, आचार, वर्णाश्रम-धर्म आदि विषयों का वर्णन है।

10. ब्रह्मवैवर्तपुराण

यह वैष्णव पुराण है। इसमें श्रीकृष्ण के चरित्र का वर्णन किया गया है। इसमें कुल 18000 श्लोक हैं।

11. लिङ्गपुराण

इसमें शिव की उपासना का वर्णन है। इसमें शिव के 28 अवतारों की कथाएं दी गई हैं। इसमें 11000 श्लोक और 163 अध्याय हैं। इसे पूर्व और उत्तर नाम से दो भागों में विभाजित किया गया है।

12. वराहपुराण

इसमें विष्णु के वराह-अवतार का वर्णन है। पाताललोक से पृथिवी का उद्धार करके वराह ने इस पुराण का प्रवचन किया था। इसमें 24000 श्लोक हैं।

13. स्कन्दपुराण

यह पुराण शिव के पुत्र स्कन्द (कार्तिकेय, सुब्रह्मण्य) के नाम पर है। यह सबसे बड़ा पुराण है। इसमें कुल 81000 श्लोक हैं।

14. वामनपुराण

इसमें विष्णु के वामन-अवतार का वर्णन है। इसमें 95 अध्याय और 10000 श्लोक हैं। इसका रचनाकाल 9वीं से 10वीं शताब्दी माना जाता है।

15. कूर्मपुराण

इसमें विष्णु के कूर्म-अवतार का वर्णन किया गया है। इसमें चार संहिताएं हैं। इसमें 6000 श्लोक हैं। इस पुराण में ईश्वरगीता और व्यासगीता भी है। इसका रचनाकाल छठी शताब्दी माना गया है।

16. मत्स्यपुराण

इसमें पुराण के पांचों लक्षण घटित होते हैं। इसमें 291 अध्याय और 14000 श्लोक हैं। प्राचीन संस्करणों में 19000 श्लोक मिलते हैं। इसमें जलप्रलय का वर्णन है। इसमें कलियुग के राजाओं की सूची दी गई है। इसका रचनाकाल तीसरी शताब्दी माना जाता है।

17. गरुड़पुराण

यह वैष्णवपुराण है। इसके प्रवक्ता विष्णु और श्रोता गरुड़ हैं, गरुड़ ने कश्यप को सुनाया था। इसमें विष्णुपूजा का वर्णन है। इसके दो खंड हैं। 18000 श्लोक हैं।

18. ब्रह्माण्डपुराण

इसमें 109 अध्याय तथा 12000 श्लोक है। इसमें चार पाद हैं। इसकी रचना 400 ई.- 600 ई. मानी जाती है।


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